
सनातन धर्म और हिंदू पंचांग के अनुसार पितृ पक्ष (Shraddh 2026) का पावन काल अपने पूर्वजों, दिवंगत माता-पिता और कुल के पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे बड़ा अवसर माना जाता है। इन सोलह दिनों के दौरान विभिन्न तिथियों पर अलग-अलग विधियों से श्राद्ध और तर्पण किए जाते हैं, जिनका विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व होता है। पितृ पक्ष के दौरान आने वाले विशेष श्राद्धों में ‘भरणी श्राद्ध’ (Bharani Shraddha 2026) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भरणी नक्षत्र के अधिष्ठात्री देवता मृत्यु के देवता यमराज हैं, इसलिए इस विशेष नक्षत्र और तिथि पर पितरों का पिंडदान और तर्पण करने से न केवल उनकी आत्मा को तृप्ति मिलती है, बल्कि उन्हें वैतरणी नदी पार करने में भी सुगमता प्राप्त होती है। इस साल भरणी श्राद्ध की सही तिथि और मुहूर्त को लेकर श्रद्धालुओं के मन में संशय बना हुआ है, आइए जानते हैं इससे जुड़ी सभी जरूरी बातें।
भरणी श्राद्ध 2026 की सही तिथि और नक्षत्र का शुभ मुहूर्त
पंचांगीय गणना के अनुसार, वर्ष 2026 में महा भरणी श्राद्ध 29 सितंबर, मंगलवार को मनाया जाएगा। पंचांग के मुताबिक, भरणी नक्षत्र की शुरुआत 29 सितंबर की सुबह लगभग 9 बजकर 3 मिनट पर होगी और इसका समापन अगले दिन यानी 30 सितंबर की सुबह 7 बजकर 36 मिनट पर होगा। चूंकि पितृ पक्ष के दौरान दोपहर के समय यानी अपराह्न काल में भरणी नक्षत्र का होना श्राद्ध कर्म के लिए सबसे उत्तम माना जाता है, इसलिए 29 सितंबर को ही भरणी श्राद्ध करना पूरी तरह शास्त्रसम्मत और फलदायी रहेगा। इस दिन देश भर के तमाम तीर्थस्थलों और घरों में लोग अपने पितरों की शांति के लिए विशेष अनुष्ठान करेंगे।
क्या है भरणी श्राद्ध का धार्मिक महत्व और गया श्राद्ध के समान फल?
सनातन ग्रंथों के अनुसार, पितृ पक्ष में आने वाले भरणी नक्षत्र का महत्व गया तीर्थ में जाकर किए जाने वाले पिंडदान के बराबर माना गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति किसी कारणवश बिहार के गया धाम जाकर अपने पितरों का श्राद्ध या पिंडदान नहीं कर पाता है, यदि वह अपने घर पर ही महा भरणी श्राद्ध के दिन पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से तर्पण और दान-पुण्य करता है, तो उसे गया श्राद्ध के समान ही अक्षय पुण्य फल की प्राप्ति होती है। चूंकि भरणी नक्षत्र के स्वामी यमराज हैं, इसलिए इस दिन यमराज का स्मरण करते हुए पितरों के नाम से अन्न, वस्त्र और जल का दान करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है और परिवार पर पितृ कृपा बनी रहती है।
श्राद्ध कर्म के लिए सबसे उत्तम माना गया है कुतुप और रोहिणी मुहूर्त
हि हिंदू परंपराओं में किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या श्राद्ध कार्य के लिए सही समय (मुहूर्त) का होना बहुत जरूरी है। भरणी श्राद्ध के दिन यानी 29 सितंबर 2026 को श्राद्ध विधि संपन्न करने के लिए ‘कुतुप मुहूर्त’ (Kutup Muhurat) को सबसे अधिक शुभ और पवित्र माना गया है। पंचांग के अनुसार, 29 सितंबर को कुतुप मुहूर्त सुबह 11 बजकर 47 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 35 मिनट तक रहेगा। हिंदू काल गणना के अनुसार कुतुप मुहूर्त दिन का आठवां मुहूर्त होता है, जो पितरों की पूजा और पिंडदान के लिए सर्वोपरि माना गया है। इसके अलावा दोपहर के समय अभिजीत मुहूर्त में भी पितरों का ध्यान करके तर्पण किया जा सकता है।
भरणी श्राद्ध के दिन यमराज की कृपा पाने के लिए जरूर करें ये काम
भरणी श्राद्ध के पावन अवसर पर सुबह जल्दी स्नानादि से निवृत्त होकर साफ वस्त्र धारण करें। इसके बाद अपने घर के ईशान कोण या पवित्र स्थान पर कुश और तर्पणे की व्यवस्था करें। पितरों के निमित्त बनाए गए सात्विक भोजन (खीर, पूरी, सब्जी आदि) का भोग तैयार करें। ब्राह्मण को भोजन कराने से पहले गाय, कुत्ते, कौवे और चींटी के लिए ग्रास जरूर निकालें। इसके बाद यमराज का स्मरण करते हुए दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल, काले तिल, कुश और जौ लेकर अपने पितरों का तर्पण करें। गरीबों और जरूरतमंदों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न और वस्त्र का दान करें, क्योंकि ऐसा करने से पितृ प्रसन्न होकर वंशजों को आरोग्यता, सुख और अखंड समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
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