
लैटिन अमेरिकी देश ब्राजील इस समय दोहरी मार से जूझ रहा है। एक तरफ देश ने पिछले 73 वर्षों का सबसे भयावह और विनाशकारी सूखा देखा है, तो दूसरी तरफ इस सूखे की कोख से निकले घातक ‘येलो फीवर’ (पीत ज्वर) के प्रकोप ने घनी आबादी वाले शहरों को अपनी चपेट में ले लिया है। आमतौर पर अमेजन और अटलांटिक के घने वर्षावनों तक सीमित रहने वाला यह खतरनाक वायरल संक्रमण अब महानगरों और रिहायशी कॉलोनियों में तेजी से पैर पसार रहा है। जंगलों से निकलकर शहरों तक पहुंचे इस वायरस और सदी के सबसे बड़े सूखे के बीच के सीधे वैज्ञानिक कनेक्शन ने दुनिया भर के वायरोलॉजिस्ट और महामारी विशेषज्ञों की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
73 साल के सूखे ने अमेजन और नदियों को किया बेहाल
ब्राजील की राष्ट्रीय जल और पर्यावरण एजेंसियों के अनुसार, अल नीनो और रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचे वैश्विक तापमान के चलते देश की प्रमुख नदियां—अमेजन, रियो नीग्रो और मदीरा ऐतिहासिक रूप से सूख चुकी हैं। कई विशाल जलमार्ग सूखी रेत के मैदानों में बदल गए, जिससे न केवल जैव विविधता नष्ट हुई बल्कि लाखों लोगों के सामने पीने के पानी का गंभीर संकट खड़ा हो गया। इस ऐतिहासिक सूखे के कारण जंगलों की प्राकृतिक पारिस्थितिकी (Ecosystem) पूरी तरह चरमरा गई, जिसने वन्यजीवों और कीट-पतंगों को जीवित रहने के लिए अपने प्राकृतिक आवास छोड़कर इंसानी बस्तियों की ओर भागने पर मजबूर कर दिया।
जंगल से शहरों तक कैसे पहुंचा खौफनाक वायरस
येलो फीवर का वायरस आमतौर पर ‘सिल्वैटिक’ (जंगली) चक्र में घूमता है, जहां मुख्य रूप से पेड़ों के ऊपरी हिस्सों में रहने वाले हीमागोगास (Haemagogus) और सेबेथेस (Sabethes) प्रजाति के मच्छर बंदरों को काटकर इसे फैलाते हैं। अत्यधिक सूखे के चलते जब जंगल के जल स्रोत सूख गए और पेड़ों की कैनोपी नष्ट होने लगी, तो संक्रमित बंदर और मच्छर भोजन व पानी की तलाश में जंगलों की सीमाओं को पार कर कृषि क्षेत्रों और शहरी परिधियों में आ पहुंचे। यहां इस वायरस का सामना शहरी मच्छरों—विशेष रूप से एडीज एजिप्टी (Aedes aegypti) से हुआ, जो डेंगू और जीका फैलाने के लिए भी कुख्यात हैं। जैसे ही एडीज मच्छरों ने संक्रमित इंसानों को काटना शुरू किया, यह बीमारी ‘शहरी येलो फीवर चक्र’ में बदल गई और बस्तियों में बारूद की तरह फैलने लगी।
जल संकट और पानी जमा करने की मजबूरी बनी मुसीबत
सूखे के कारण शहरों में नल सूखे पड़े हैं, जिससे लोग बाल्टियों, ड्रमों और खुले टैंकों में हफ्तों तक पानी जमा करने को मजबूर हो गए। उचित रूप से ढके न होने के कारण ये घरेलू जल स्रोत एडीज एजिप्टी मच्छरों के लिए मुफीद ब्रीडिंग ग्राउंड (प्रजनन स्थल) बन गए। अत्यधिक गर्मी के कारण मच्छरों का जीवन चक्र तेज हो गया और उनके भीतर वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड भी घट गया। नतीजतन, जिस बीमारी को घने जंगलों तक सीमित माना जाता था, वह हर घर के आंगन तक पहुंच गई।
येलो फीवर के लक्षण और जानलेवा जटिलताएं
येलो फीवर एक फ्लेविवायरस (Flavivirus) जनित तीव्र रक्तस्रावी (Hemorrhagic) बीमारी है। संक्रमण के शुरुआती चरण में मरीज को अचानक तेज बुखार, मांसपेशियों में असहनीय दर्द, पीठ दर्द, सिरदर्द, कंपकंपी, भूख न लगना और जी मिचलाने की शिकायत होती है। लगभग 15 से 20 प्रतिशत मामलों में यह बीमारी कुछ ही दिनों में ‘टॉक्सिक फेज’ (विषाक्त चरण) में प्रवेश कर जाती है। इस गंभीर स्थिति में मरीज का लिवर और किडनी तेजी से डैमेज होने लगते हैं। लिवर खराब होने से त्वचा और आंखें पीली पड़ जाती हैं (जिससे इसे ‘येलो’ फीवर नाम मिला), मुंह, नाक, आंख या पेट से आंतरिक रक्तस्राव शुरू हो जाता है और मरीज की उल्टी में गहरा खून आने लगता है। समय पर सही इलाज और निगरानी न मिलने पर गंभीर चरण वाले मरीजों में मृत्यु दर 50 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
महामारी विशेषज्ञों की चेतावनी और वैश्विक चिंता
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और पैन अमेरिकन हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (PAHO) के विशेषज्ञों का कहना है कि ब्राजील का यह संकट इस बात का जीता-जागता सबूत है कि जलवायु परिवर्तन कैसे जानलेवा बीमारियों के प्रसार के भूगोल को बदल रहा है। वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि अगर सूखे और वनों की कटाई की यही गति रही, तो उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के अन्य देश भी इस प्रकार के ‘वायरल स्पिलओवर’ की चपेट में आ सकते हैं। ब्राजील सरकार ने प्रभावित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर येलो फीवर टीकाकरण (Vaccination Drive), कीटनाशकों के छिड़काव और आपातकालीन जल आपूर्ति के निर्देश दिए हैं ताकि वायरस को पूरे दक्षिण अमेरिका में फैलने से रोका जा सके।
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