
बिहार के नालंदा जिले से प्रशासनिक लापरवाही और जेल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा करने वाला ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने हर किसी को अवाक कर दिया है। राज्य के ऐतिहासिक और चर्चित शहर बिहारशरीफ स्थित मंडल कारा यानी जेल के भीतर एक ऐसा गजब का खेल खेला गया जिसके बारे में सुनकर अदालत से लेकर पुलिस प्रशासन तक के होश उड़ गए। जेल के अंदर बंद दो अलग-अलग मामलों के विचाराधीन या सजायाफ्ता कैदियों के कागजातों और उनकी पहचान के मिलान में इतनी बड़ी चूक हुई कि अदालत से जमानत किसी और कैदी के नाम पर मंजूर होकर आई थी, लेकिन जेल से बाहर निकलने वाला शख्स कोई और ही निकला। इस प्रकार की गंभीर प्रशासनिक लापरवाही यह साबित करती है कि जेल के भीतर सुरक्षा और दस्तावेजों के रखरखाव के नियमों को ताक पर रखकर किस हद तक मनमानी या उदासीनता बरती जा रही है। जब इस बात का खुलासा हुआ कि असली हकदार कैदी अंदर ही बंद रह गया और दूसरा कैदी जेल के गेट से बाहर हवा में सांस लेने लगा, तो पूरे प्रशासनिक अमले में भूचाल आ गया और आनन-फानन में उच्च स्तरीय जांच के आदेश दे दिए गए।
अदालत के जमानत आदेश और कागजात की जांच में हुई गंभीर अनदेखी
इस पूरे प्रकरण की तह तक जाने पर यह पता चलता है कि न्यायपालिका द्वारा जारी किए जाने वाले जमानत आदेशों (Bail Orders) और जेल के रिकॉर्ड रूम में होने वाली प्रविष्टियों के दौरान किस स्तर पर घोर लापरवाही बरती गई थी। नियम के अनुसार, जब भी किसी कैदी की जमानत अदालत से मंजूर होती है, तो जेल प्रशासन को उसके नाम, पिता के नाम, मुकदमे के नंबर और उसकी बायोमेट्रिक या शारीरिक पहचान का बारीकी से मिलान करने के बाद ही उसे रिहाई के परवाने पर हस्ताक्षर करके छोड़ना होता है। लेकिन बिहारशरीफ जेल के इस मामले में लगता है कि जेल के मुंशी और जिम्मेदार अधिकारियों ने बिना किसी औपचारिकता को पूरा किए सिर्फ फाइलों के ऊपर आंख मूंदकर हस्ताक्षर कर दिए, जिसके चलते एक बहुत बड़ी चूक हो गई। जब संबंधित अदालत के रिकॉर्ड का मिलान जेल से छूटे हुए कैदी के दस्तावेजों के साथ किया गया, तो यह साफ हो गया कि कागजों पर नाम किसी और का दर्ज था और जेल से बाहर निकलने वाला व्यक्ति कोई और ही था। इस तरह की तकनीकी और मानवीय भूल न्यायिक प्रक्रिया पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है, क्योंकि यदि समय रहते इस गलती को नहीं सुधारा जाता, तो यह न्याय व्यवस्था के साथ एक बहुत बड़ा खिलवाड़ साबित हो सकता था।
जेल प्रशासन में मचा हड़कंप, आनन-फानन में कैदियों की तलाश और ताबड़तोड़ छापेमारी
जैसे ही इस बात की भनक जेल अधीक्षक और जिला प्रशासन के बड़े अधिकारियों को लगी कि एक गलत कैदी को जेल से रिहा कर दिया गया है, वैसे ही पूरे महकमे में हड़कंप मच गया। अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए क्योंकि कानून और अदालत की नजरों में यह बहुत बड़ा गंभीर अपराध माना जाता है, जिसमें कैदी के भागने या न्याय प्रक्रिया को चकमा देने का सीधा खतरा पैदा हो जाता है। तुरंत प्रभाव से पुलिस टीमों को सक्रिय किया गया और उस कैदी की तलाश में ताबड़तोड़ छापेमारी शुरू कर दी गई जो गलती से जेल से बाहर निकल भागा था, साथ ही उस कैदी को भी उसकी सही स्थिति से अवगत कराया गया जिसकी जमानत वास्तव में मंजूर हुई थी। पुलिस ने रातों-रात कई ठिकानों पर दबिश देकर उस व्यक्ति को दोबारा अपने कब्जे में लिया और कानूनी औपचारिकताएं पूरी करते हुए वापस जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाया, तब जाकर अधिकारियों ने राहत की सांस ली। इस पूरी घटना के सामने आने के बाद जेल के अंदर की सुरक्षा व्यवस्था, कर्मचारियों की कार्यप्रणाली और रजिस्टर में एंट्री करने के तौर-तरीकों की गहन समीक्षा की जा रही है ताकि भविष्य में इस तरह की शर्मनाक गलती दोबारा कभी न दोहराई जा सके।
लापरवाही बरतने वाले कर्मचारियों पर गाज गिरने की पूरी संभावना, विभाग ने बैठाई जांच
इस सनसनीखेज लापरवाही के बाद राज्य के गृह विभाग और कारा महानिरीक्षक (IG Prison) ने भी इस पूरे मामले को बेहद गंभीरता से लिया है और बिहारशरीफ जेल प्रशासन से पूरी रिपोर्ट तलब कर ली है। प्राथमिक जांच के आधार पर उन सभी जेल कर्मियों, संतरियों और रिकॉर्ड कीपरों की पहचान की जा रही है जिनकी ड्यूटी उस दिन रिहाई के दस्तावेजों की जांच करने और कैदी का मिलान करने के लिए लगाई गई थी। सूत्रों के अनुसार, इस गंभीर चूक के लिए दोषी पाए जाने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों के खिलाफ सख्त विभागीय कार्रवाई, निलंबन और यहां तक कि आपराधिक मुकदमे दर्ज करने की तैयारी भी की जा रही है ताकि अन्य कर्मियों के लिए एक कड़ा संदेश जा सके। जेल जैसे संवेदनशील और सुरक्षित परिसरों में इस प्रकार की लापरवाही किसी भी कीमत पर माफ करने योग्य नहीं है, क्योंकि इससे समाज की सुरक्षा और कानून का इकबाल दोनों दांव पर लग जाते हैं। अंततः, बिहारशरीफ जेल का यह ‘गजब खेल’ प्रशासनिक सुस्ती का एक ऐसा काला अध्याय बन गया है जो यह याद दिलाता है कि यदि सरकारी तंत्र में जरा सी भी ढिलाई बरती जाए, तो न्याय व्यवस्था कैसे मज़ाक बनकर रह जाती है।
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