
दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों और कूटनीतिक समीकरणों के बीच भारत के पड़ोसी देशों से लगातार ऐसी खबरें सामने आ रही हैं, जो नई दिल्ली की राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक हितों के लिए गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही हैं। हाल ही में बांग्लादेश के राजनीतिक बदलाव और वहां की अंतरिम सरकार के फैसलों को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला और संवेदनशील खुलासा हुआ है, जिसने भारतीय रक्षा प्रतिष्ठानों की धड़कनें तेज कर दी हैं। प्राप्त खुफिया रिपोर्ट्स और रणनीतिक विश्लेषणों के अनुसार, बांग्लादेश के बोगुरा (Bogra) क्षेत्र में एक हाई-टेक ‘लड़ाकू ड्रोन’ फैक्ट्री (Combat Drone Factory) स्थापित करने की तैयारी चल रही है, और इस प्रोजेक्ट की कमान परोक्ष रूप से उन ताकतों के हाथ में जाती दिख रही है जो भारत की सुरक्षा के लिहाज से बिल्कुल भी अनुकूल नहीं हैं। सबसे अधिक खतरनाक पहलू यह है कि यह पूरा बोगुरा प्रोजेक्ट भारत के बेहद संवेदनशील और सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण ‘चिकन नेक’ यानी सिलीगुड़ी कॉरिडोर (Siliguri Corridor) के ठीक करीब स्थित है। पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाले इस संकीर्ण भू-भाग के पास इस प्रकार की सैन्य और ड्रोन निर्माण इकाई का विकसित होना भारत के लिए एक बड़ा सामरिक खतरा माना जा रहा है। इस घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों और बाहरी ताकतों के प्रभाव को बढ़ाने के लिए किस हद तक किया जा रहा है, जिस पर अब भारतीय रक्षा रणनीतिकारों की पैनी नजर टिकी हुई है।
बांग्लादेश के उत्तरी भाग में स्थित बोगुरा जिला हमेशा से रणनीतिक गतिविधियों और सैन्य छावनी के रूप में जाना जाता रहा है, लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने इसे एक अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक अखाड़े में बदल दिया है। जब से बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन हुआ है और वहां की आंतरिक राजनीति में भारत विरोधी और कट्टरपंथी तत्वों को बढ़ावा मिला है, तब से देश की भू-राजनीतिक प्राथमिकताएं तेजी से बदलती नजर आ रही हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, बोगुरा में स्थापित होने जा रहे इस रक्षा और ड्रोन प्रोजेक्ट के पीछे बाहरी देशों की फंडिंग और तकनीक का बड़ा हाथ है, जो गुप्त रूप से इस क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हैं। इस फैक्ट्री में आधुनिक कमर्शियल और मिलिट्री ड्रोन, सर्विलांस सिस्टम तथा सुसाइड ड्रोन बनाने की योजना पर काम चल रहा है, जिनका इस्तेमाल भविष्य में सामरिक निगरानी और आक्रामक अभियानों के लिए किया जा सकता है। भारत के रक्षा विशेषज्ञों का यह मानना है कि किसी भी मित्र देश के बजाय ऐसी ताकतों को अपनी सीमा के पास इस प्रकार की संवेदनशील रक्षा तकनीक सौंपना, जो भारत की सीमाओं पर हमेशा से तनाव पैदा करती आई हैं, एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा है। इस प्रकार, बोगुरा का यह प्रोजेक्ट केवल एक औद्योगिक विकास का मामला नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया के शक्ति संतुलन को बिगाड़ने वाला एक खतरनाक कदम है।
भारत के भूगोल और सुरक्षा ढांचे का अध्ययन करने वाले हर रणनीतिकार को यह अच्छी तरह मालूम है कि ‘चिकन नेक’ या सिलीगुड़ी कॉरिडोर देश की भौगोलिक अखंडता के लिए कितना अधिक संवेदनशील और महत्वपूर्ण क्षेत्र है। पश्चिम बंगाल के उत्तर में स्थित यह महज लगभग 22 किलोमीटर चौड़ा संकीर्ण गलियारा पूर्वोत्तर के सात राज्यों (सेवन सिस्टर्स) को मुख्य भारतीय भूमि से जोड़ता है, और यदि किसी संकट के समय इस रास्ते को बाधित कर दिया जाए, तो पूर्वोत्तर भारत का संपर्क देश के बाकी हिस्सों से कट सकता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र के आसपास किसी भी प्रकार की विदेशी सैन्य गतिविधि, हथियार निर्माण इकाई या संभावित ड्रोन बेस का होना भारतीय सेना के लिए सबसे बड़ी लाल झंडी (Red Flag) के समान है। बोगुरा से सिलीगुड़ी कॉरिडोर की भौगोलिक दूरी बहुत अधिक नहीं है, और इस छोटे से दायरे में अत्याधुनिक लड़ाकू और मारक ड्रोन का निर्माण होना सीधे तौर पर भारत की पूर्वोत्तर सीमाओं की सुरक्षा के लिए एक खुला चैलेंज है। यदि भविष्य में कभी भी भारत और उसके पड़ोसियों के बीच सामरिक गतिरोध बढ़ता है, तो इस ड्रोन फैक्ट्री का उपयोग भारत के मुख्य रसद मार्गों, रेलवे नेटवर्क और सैन्य ठिकानों पर निगरानी रखने या उन्हें बाधित करने के लिए किया जा सकता है। इसी आशंका ने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को अत्यधिक सतर्क कर दिया है और वे इस प्रोजेक्ट से जुड़ी हर एक गतिविधि की बारीकी से मॉनिटरिंग कर रही हैं।
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार और वहां के नीति निर्माताओं द्वारा पिछले कुछ समय में उठाए गए कदम इस बात की गवाही दे रहे हैं कि वे पारंपरिक रूप से भारत के साथ रहे गहरे और मैत्रीपूर्ण संबंधों को ताक पर रखकर बाहरी ताकतों के पाले में जाते दिख रहे हैं। पाकिस्तान और चीन जैसे देश इस स्थिति का पूरा फायदा उठाकर बांग्लादेश के भीतर अपनी रणनीतिक जड़ें मजबूत करने में लगे हुए हैं, और बोगुरा का यह ड्रोन प्रोजेक्ट उसी व्यापक गेमप्लान का एक हिस्सा प्रतीत होता है। भारत ने हमेशा से एक अच्छे पड़ोसी का फर्ज निभाते हुए बांग्लादेश के आर्थिक विकास, आपदा प्रबंधन और बुनियादी ढांचे में खुलकर सहयोग किया है, लेकिन इसके बदले में इस तरह की भारत-विरोधी गतिविधियां और सामरिक खतरे पैदा करना नई दिल्ली के लिए अस्वीकार्य है। कूटनीतिक गलियारों में इस बात पर भी चर्चा हो रही है कि भारत सरकार राजनयिक चैनलों के माध्यम से ढाका के समक्ष इस सुरक्षा चिंता को कड़े शब्दों में उठा सकती है। किसी भी देश को यह समझना होगा कि उसके पड़ोसी की सुरक्षा कीमत पर अपनी जमीन पर संदिग्ध सैन्य प्रोजेक्ट्स को अनुमति देना उसके अपने दीर्घकालिक आर्थिक और राजनीतिक हितों के लिए भी घातक साबित हो सकता है। भारत के रणनीतिकार अब इस बात पर विचार कर रहे हैं कि पूर्वी मोर्चे पर अपनी सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक impenetrable (अभेद्य) कैसे बनाया जाए ताकि किसी भी संभावित खतरे से समय रहते निपटा जा सके।
बोगुरा प्रोजेक्ट और चिकन नेक के पास उभरते इन नए खतरों के मद्देनजर भारतीय सशस्त्र बलों और खुफिया एजेंसियों ने अपनी पूर्वोत्तर सीमा पर सुरक्षा ग्रिड को पूरी तरह से चाक-चौबंद कर दिया है। भारतीय वायुसेना और थलसेना ने सीमावर्ती इलाकों में आधुनिक एंटी-ड्रोन सिस्टम, रडार नेटवर्क और त्वरित प्रतिक्रिया देने वाली यूनिटों की तैनाती को और अधिक मजबूत कर दिया है, ताकि किसी भी अप्रत्याशित हवाई या ड्रोन घुसपैठ को हवा में ही नाकाम किया जा सके। इसके अलावा, कूटनीतिक और खुफिया स्तर पर यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि इस प्रोजेक्ट से जुड़ी हर तकनीकी और सामरिक जानकारी समय रहते जुटाई जाए, ताकि भारत के राष्ट्रीय हितों पर कोई आंच न आ सके। देश की जनता और रक्षा विश्लेषक भी इस बात को लेकर मुखर हैं कि भारत को अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए किसी भी प्रकार की कोताही नहीं बरतनी चाहिए। आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण होगा कि भारत सरकार इस भू-राजनीतिक चुनौती का सामना करने के लिए क्या कड़े कूटनीतिक और सैन्य कदम उठाती है, ताकि पूर्वी मोर्चे पर देश की संप्रभुता और शांति पूरी तरह से सुरक्षित बनी रहे।
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