
बिहार की राजनीति के लिहाज से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। राज्य में आगामी बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव (Bankipur Assembly Election) की सरगर्मियों के बीच विपक्षी दलों और नए सियासी रणनीतिकारों को एक के बाद एक करारे झटके लग रहे हैं। राजद (RJD) नेता तेजस्वी यादव और राजनीतिक रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) की पार्टी को बड़ा झटका देते हुए कई नामचीन दिग्गज नेताओं और स्थानीय पदाधिकारियों ने अपने पुराने दलों का साथ छोड़ दिया है। इन सभी ने राजधानी पटना स्थित पार्टी मुख्यालय में एक भव्य मिलन समारोह के दौरान आधिकारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सदस्यता ग्रहण कर ली है, जिससे सियासी गलियारों में भारी हलचल मच गई है।
बांकीपुर उपचुनाव से पहले सियासी समीकरणों में बड़ा बदलाव
किसी भी चुनाव से ठीक पहले इस तरह का दलबदल विरोधी खेमे की रणनीति को कमजोर करने के लिए काफी माना जाता है। बांकीपुर सीट को राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील और वीआईपी सीट माना जाता है, जहाँ हर दल अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है। ऐसे में चुनाव की तारीखों के नजदीक आते ही तेजस्वी यादव के पाले से कई प्रभावशाली नेताओं का छिटक जाना और प्रशांत किशोर के संगठन से जुड़े चेहरों का बीजेपी का दामन थामना, विपक्षी दलों के लिए एक बड़ा मानसिक और रणनीतिक झटका साबित हो रहा है।
बीजेपी मुख्यालय में हुआ दिग्गजों का स्वागत, पार्टी का कुनबा हुआ मजबूत
पार्टी में शामिल होने वाले इन दिग्गज नेताओं का स्वागत करने के लिए भाजपा के कई वरिष्ठ प्रदेश पदाधिकारी और स्थानीय विधायक मौके पर मौजूद रहे। बीजेपी नेताओं ने नए शामिल हुए सदस्यों को पार्टी का अंगवस्त्र पहनाकर विधिवत स्वागत किया और विश्वास जताया कि उनके आने से बांकीपुर समेत आसपास के शहरी क्षेत्रों में पार्टी का जनाधार और अधिक मजबूत होगा। शामिल होने वाले नेताओं का कहना था कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विकासवादी नीतियों, डबल इंजन सरकार के कार्यों और राज्य के चहुंमुखी विकास से प्रभावित होकर बीजेपी परिवार का हिस्सा बने हैं।
चुनावी मैदान में असर और आगे की राजनीतिक रणनीतियाँ
भौगोलिक और सामाजिक रूप से बेहद अहम माने जाने वाले पटना के बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में इस राजनीतिक उठापटक का सीधा असर आगामी मतदान पर देखने को मिल सकता है। जानकारों का मानना है कि इन नेताओं के अपने-अपने क्षेत्रों में अच्छे खासे व्यक्तिगत प्रभाव और कैडर बेस होने के कारण, विपक्षी दलों के वोटों में सेंध लग सकती है। चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे बिहार की राजनीति में जोड़-तोड़ और रणनीतिक बदलाव का दौर और अधिक तेज होने की पूरी संभावना है।
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