
बदलते दौर और कामकाजी लाइफस्टाइल के बीच आजकल बच्चों की शुरुआती स्कूली शिक्षा बहुत कम उम्र से ही शुरू हो जाती है। जब बच्चा ढाई से तीन साल का होता है, तो माता-पिता के सामने सबसे बड़ा सवाल यह आता है कि उसे सीधे नर्सरी में भेजा जाए या पहले ‘प्ले स्कूल’ (Play School) में एडमिशन दिलाया जाए। कई पेरेंट्स को लगता है कि प्ले स्कूल और नर्सरी क्लास एक जैसी ही होती हैं, लेकिन असलियत इससे काफी अलग है। आधुनिक शिक्षा प्रणाली, चाइल्ड साइकोलॉजी और जेनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (GEO) के मानदंडों के अनुसार, इन दोनों की शिक्षण शैली और पाठ्यक्रम में जमीन-आसमान का फर्क होता है। आइए विस्तार से जानते हैं कि प्ले स्कूल में बच्चों को क्या सिखाया जाता है और यह नर्सरी से कैसे अलग है।
क्या होता है प्ले स्कूल का मुख्य मकसद और क्या सिखाया जाता है
प्ले स्कूल का मतलब बच्चों कोताश या भारी-भरकम किताबों का बोझ देना बिल्कुल नहीं होता है। इस शुरुआती पड़ाव का मुख्य उद्देश्य बच्चे को घर के सुरक्षित माहौल से बाहर निकालकर एक सामाजिक और बाहरी दुनिया से जोड़ना होता है। प्ले स्कूल में बच्चों को खेल-खेल में (Play-way method) बहुत सी जरूरी आदतें सिखाई जाती हैं। इसमें मुख्य रूप से बच्चों को टॉयलेट ट्रेनिंग, दूसरे बच्चों के साथ मिलकर शेयरिंग करना, अपनी बात खुलकर कहना, बेसिक मैनर्स सिखाना, रंगों और आकारों (Colors & Shapes) की पहचान कराना, और कविताएं तथा म्यूजिक के जरिए याददाश्त बढ़ाना शामिल होता है। यहां किसी भी तरह का कोई होमवर्क या एग्जाम का प्रेशर नहीं होता है।
नर्सरी क्लास का सिलेबस प्ले स्कूल से किस तरह अलग होता है
जब बच्चा प्ले स्कूल की दहलीज पार करके थोड़ा बड़ा हो जाता है और नर्सरी क्लास में प्रवेश करता है, तो उसकी औपचारिक शिक्षा (Formal Education) की आधिकारिक शुरुआत हो जाती है। नर्सरी क्लास का सिलेबस प्ले स्कूल के मुकाबले काफी स्ट्रक्चर्ड और एकेडमिक होता है। नर्सरी में बच्चों को एबीसीडी (A-B-C-D) लिखना, हिंदी वर्णमाला के शुरुआती अक्षर, बेसिक नंबर्स (1 से 20 तक गिनती), पेंसिल पकड़ने की प्रैक्टिस (Pencil Grip), और किताबों के जरिए चित्रों की पहचान करना सिखाया जाने लगता है। इसके अलावा नर्सरी क्लास में बच्चों का थोड़ा बहुत रूटीन तय होता है और उन्हें स्कूल के डिसिप्लिन के हिसाब से ढालने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
पेरेंट्स के लिए क्या है सही फैसला—प्ले स्कूल भेजना जरूरी है या नहीं
शिक्षा विशेषज्ञों और बाल मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि यदि बच्चा सीधे नर्सरी में जाने पर रोता है, घर से अलग नहीं होना चाहता या अन्य बच्चों के साथ घुलने-मिलने में डरता है, तो उसे 1 से 2 साल के लिए प्ले स्कूल जरूर भेजना चाहिए। इससे बच्चे का शुरुआती सेपरेशन एंग्जाइटी (Separation Anxiety) दूर होता है और उसका कॉन्फिडेंस लेवल मजबूत होता है। आधुनिक पैरेंटिंग और लोकल स्कूल ट्रेंड्स के अनुसार, सही समय पर सही मंच मिलने से बच्चों का मानसिक और शारीरिक विकास बहुत तेजी से होता है, जिससे वे आगे की बड़ी कक्षाओं के लिए पूरी तरह तैयार हो जाते हैं।
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