
पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय एक बेहद संवेदनशील और निर्णायक मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सुप्रीमो और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सियासी रसूख, सांगठनिक कौशल और राजनीतिक ताकत का अब तक का सबसे बड़ा इम्तिहान होने जा रहा है। राज्य में होने जा रहे आगामी राजनीतिक घटनाक्रमों और महत्वपूर्ण चुनावों से यह पूरी तरह साफ हो जाएगा कि दीदी के हाथ में बंगाल की सत्ता की कमान कितनी मजबूत बची है। इस बड़े सियासी दंगल पर न केवल टीएमसी के अंदरूनी बागियों की नजरें टिकी हुई हैं, बल्कि मुख्य विपक्षी दल बीजेपी और कांग्रेस भी अपनी रणनीतिक गोटियां सेट करने के लिए पूरी ताकत से टकटकी लगाए बैठे हैं।
बागियों के तेवर और टीएमसी का अंदरूनी संकट: क्या दरक रहा है दीदी का कुनबा?
कोलकाता के सियासी गलियारों में चल रही फुसफुसाहटों की मानें तो पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। पिछले कुछ समय से स्थानीय स्तर के नेताओं से लेकर कई बड़े चेहरों के बागी सुर सामने आने लगे हैं। ये बागी गुट केवल सही मौके के इंतजार में हैं कि कब ममता बनर्जी की पकड़ कमजोर हो और वे अपनी नई राजनीतिक राह चुन सकें। ऐसे में दीदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती न सिर्फ बाहरी विरोधियों से लड़ना है, बल्कि अपनी पार्टी के भीतर पनप रहे इस असंतोष को दबाकर पूरे संगठन को एकजुट रखना है। इस अग्निपरीक्षा के नतीजों से ही तय होगा कि बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का भविष्य किस दिशा में जाएगा।
बीजेपी की आक्रामक घेराबंदी और कांग्रेस का गेम प्लान: विपक्ष को दिखा बड़ा मौका
पश्चिम बंगाल के स्थानीय मैदान (Local Politics of Bengal) पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने ममता सरकार के खिलाफ अपनी घेराबंदी को दोगुना कर दिया है। भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था के मुद्दों पर बीजेपी लगातार सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक दीदी को बैकफुट पर धकेलने की कोशिश में जुटी है। वहीं दूसरी तरफ, कांग्रेस भी बंगाल की इस बदलती सियासी हवा को भांपते हुए अपने खोए हुए जनाधार को वापस पाने की जुगत में है। विपक्ष के दोनों ही खेमों को लगता है कि अगर इस बार ममता बनर्जी की ताकत थोड़ी भी कम साबित हुई, तो आगामी विधानसभा और स्थानीय चुनावों में बंगाल की सत्ता का समीकरण पूरी तरह बदल जाएगा।
क्या जनसमर्थन के दम पर फिर से करिश्मा कर पाएंगी ममता बनर्जी?
इन तमाम चुनौतियों और चौतरफा हमलों के बीच ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत आज भी उनका सीधा जनसंपर्क और बंगाल की महिलाओं व ग्रामीण मतदाताओं के बीच उनकी मजबूत पकड़ है। ‘मां-माटी-मानुष’ के नारे के साथ दशकों से बंगाल पर राज कर रहीं दीदी इस समय राज्य के कोने-कोने में स्थानीय रैलियों और सरकारी योजनाओं के जरिए जनता के बीच अपनी पैनी पैठ को और मजबूत करने में जुटी हैं। अब देखना यह होगा कि क्या दीदी अपने पुराने आक्रामक अंदाज और अचूक राजनीतिक कूटनीति के दम पर विरोधियों के इस चक्रव्यूह को भेदकर एक बार फिर अपनी ताकत का लोहा मनवा पाती हैं या बंगाल की सियासत में कोई नया उलटफेर देखने को मिलेगा।
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