
आज की आधुनिक और रफ्तार भरी भागदौड़ वाली जीवनशैली में माता-पिता बनना हर विवाहित जोड़े के जीवन का एक सबसे खूबसूरत और भावनात्मक सपना होता है। शादी के कुछ साल बीत जाने के बाद जब घर में किलकारियां नहीं गूंजती हैं, तो समाज का दबाव और खुद की भीतर की कसक किसी भी इंसान को अंदर से झकझोर कर रख देती है। कई बार यह निराशा इतनी गहरी हो जाती है कि व्यक्ति मानसिक संतुलन और हकीकत की दुनिया से कटकर एक ऐसी काल्पनिक दुनिया में जीने लगता है, जहां उसके सारे दुख जैसे जादू से गायब हो जाते हैं। हाल ही में चिकित्सा जगत और काउंसलिंग के दायरे से एक ऐसा ही बेहद अजीबोगरीब, हैरान करने वाला और भावुक कर देने वाला मामला सामने आया है, जिसने यह साबित कर दिया है कि मानसिक तनाव और सामाजिक उम्मीदों का बोझ इंसानी दिमाग पर कितना गहरा और खतरनाक असर डाल सकता है। इस घटना ने एक बार फिर से इस बात पर बहस छेड़ दी है कि बांझपन या संतान न होने के दर्द से जूझ रहे दंपतियों को न केवल चिकित्सीय मदद, बल्कि गहरी मनोवैज्ञानिक और पारिवारिक सहायता की कितनी ज्यादा जरूरत होती है, ताकि वे इस तरह के मानसिक अंधकार में जाने से बच सकें।
कहानी की शुरुआत एक ऐसे सामान्य शादीशुदा जोड़े से होती है जो विवाह के कई वर्ष बीत जाने के बाद भी प्राकृतिक रूप से माता-पिता बनने के सुख से वंचित था। शुरुआत में सब कुछ आम था, डॉक्टरों के चक्कर काटे गए, कई तरह के छोटे-बड़े टेस्ट हुए और पारंपरिक उपचारों का सहारा भी लिया गया। लेकिन जब लगातार असफलता हाथ लगी और परिवार तथा समाज के ताने या बार-बार पूछे जाने वाले चुभते हुए सवाल हद से ज्यादा बढ़ने लगे, तो इस जोड़े के मानसिक स्वास्थ्य पर इसका बेहद बुरा असर पड़ने लगा। पत्नी जहां अंदर ही अंदर एक गहरी और भयानक अवसाद (डिफ्रेशन) की खाई में उतरती चली गई, वहीं पति भी अपनी पत्नी के इस टूटते हुए मानसिक संतुलन को संभाल नहीं पाया। समाज के सामने कमजोर दिखने का डर और खुद को एक ‘पूर्ण परिवार’ के रूप में साबित करने की जिद ने उन दोनों के भीतर एक अजीब सा रक्षात्मक कवच बना लिया। वे इस कदर हताश हो चुके थे कि उन्होंने अपनी इस हकीकत को स्वीकार करने के बजाय इससे आंखें मूंद लेना ही बेहतर समझा और यहीं से उस बड़े और खतरनाक फरेब की नींव पड़ी, जिसने आगे चलकर पूरे परिवार को हिला कर रख दिया।
इंसानी दिमाग की यह फितरत होती है कि जब वह कड़वी सच्चाई का सामना नहीं कर पाता, तो वह अपने इर्द-गिर्द एक ऐसा झूठ का साम्राज्य खड़ा कर लेता है जिसे वह खुद भी धीरे-धीरे सच मानने लगता है। इस जोड़े ने भी कुछ ऐसा ही किया। प्रेग्नेंसी न होने की हताश पीड़ा से बचने के लिए उन्होंने अपने ही घर और परिवार के सदस्यों के सामने एक बहुत बड़ा और विस्तृत झूठ बोलना शुरू कर दिया। शुरुआत में यह बात सिर्फ आपस की बातचीत तक सीमित थी, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने इस झूठ को इस प्रकार से गढ़ा और पेश किया कि उनके माता-पिता, रिश्तेदार और पड़ोसी भी उनकी इस काल्पनिक दुनिया पर पूरी तरह से यकीन करने लगे। वे इस बात से पूरी तरह बेखबर थे कि यह अस्थायी मानसिक राहत आगे चलकर उनके लिए एक ऐसी कानूनी और चिकित्सीय मुसीबत बन जाएगी जिससे निकलना नामुमकिन हो जाएगा। झूठ बोलने की यह आदत इस हद तक बढ़ गई कि उन्होंने अपने दैनिक जीवन और व्यवहार में भी उन तमाम बदलावों का दिखावा करना शुरू कर दिया जो आमतौर पर एक होने वाली मां के जीवन में देखे जाते हैं, ताकि किसी को भी उनके इस गुप्त षड्यंत्र पर ज़रा सा भी शक न हो सके।
हर झूठ की एक मियाद होती है और वह चाहकर भी हमेशा के लिए सच्चाई को नहीं छिपा सकता, ऐसा ही कुछ इस हाई-प्रोफाइल और संवेदनशील मामले में भी देखने को मिला। समय बीतने के साथ जब तथाकथित प्रेग्नेंसी के नौ महीने पूरे होने का दावा किया जाने लगा और डिलीवरी का समय नजदीक आया, तो परिवार में खुशियों का माहौल बन गया और अस्पताल जाने की तैयारियां शुरू होने लगीं। लेकिन एक झूठ को छुपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं और मेडिकल साइंस के आगे किसी भी तरह का फरेब ज्यादा देर तक नहीं टिक सकता। जब परिवार के दबाव और वास्तविकता को परखने के लिए एक बेहद सामान्य और रूटीन मेडिकल जांच कराई गई, तो उस जांच की रिपोर्ट ने इस पूरे जोड़े के होश उड़ा कर रख दिए। डॉक्टर ने जब अल्ट्रासाउंड और अन्य चिकित्सीय परीक्षणों के आंकड़े सामने रखे, तो यह साफ हो गया कि गर्भ में कोई बच्चा पल ही नहीं रहा था और यह पूरी कहानी केवल एक मानसिक कल्पना या कहें कि एक बड़ा झूठ था। उस एक सिंगल मेडिकल रिपोर्ट ने बरसों से बुने गए इस ताने-बाने को पलभर में तास के पत्तों की तरह बिखेर कर रख दिया और सच्चाई दूध के दूध और पानी के पानी की तरह सबके सामने आ गई।
जब इस सच्चाई का खुलासा हुआ तो पूरा परिवार स्तब्ध रह गया कि आखिर कैसे उनका अपना बेटा और बहू उनसे इतना बड़ा झूठ इतने लंबे समय तक बोल सकते थे। शुरुआत में परिवार के सदस्यों को उन पर बहुत गुस्सा आया और अविश्वास की स्थिति पैदा हो गई, लेकिन जब मामले की गहराई में जाकर मनोवैज्ञानिकों और काउंसलर्स से बात की गई, तो एक बेहद डरावनी और संवेदनशील तस्वीर सामने आई। डॉक्टरों ने स्पष्ट किया कि यह कोई साधारण धोखाधड़ी या अपराध नहीं था, बल्कि यह एक गंभीर मनोवैज्ञानिक स्थिति यानी ‘स्यूडोसाइसी’ (Pseudocyesis) या अत्यधिक मानसिक तनाव के कारण उपजी मानसिक विकृति का परिणाम था, जिसमें व्यक्ति हताशा के चलते अपनी कल्पना को ही सच मान बैठता है। इस घटना ने समाज के सामने एक बहुत बड़ा आईना रख दिया है कि हमें अपने आसपास के लोगों, विशेषकर उन दंपतियों पर अनावश्यक दबाव नहीं डालना चाहिए जो कंसीव करने में असफल हो रहे हैं, क्योंकि सामाजिक ताने और पारिवारिक अपेक्षाएं किसी भी इंसान के मानसिक संतुलन को पूरी तरह से तहस-नहस कर सकती हैं। सही समय पर मानसिक स्वास्थ्य की काउंसलिंग और अपनों का संबल ही इस तरह के भयानक हादसों और मानसिक भंवर से किसी को बाहर निकाल सकता है।
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