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पैकेटबंद फूड खरीदने से पहले 10 बार सोचें! क्या आप भी खाते हैं छिपकर बैठा जहर

आज के इस भागदौड़ भरे आधुनिक दौर में हम सभी की जीवनशैली इतनी बदल चुकी है कि रसोईघर से लेकर ऑफिस की डेस्क तक पैकेटबंद और प्रोसेस्ड फूड्स ने हमारी जिंदगी में गहरी जगह बना ली है। बाजार में मिलने वाले रेडी-टू-ईट स्नैक्स, इंस्टेंट नूडल्स, फ्रूट जूस, बिस्कुट और एनर्जी ड्रिंक्स के आकर्षक विज्ञापनों और पैकेटों पर लिखे ‘शुद्ध’, ‘हेल्दी’, ‘नेचुरल’ और ‘जीरो शुगर’ जैसे लुभावने दावों को देखकर अक्सर हम बिना सोचे-समझे इन्हें खरीद लेते हैं और अपने परिवार को परोस देते हैं। लेकिन क्या आपने कभी यह जानने की कोशिश की है कि जो सामान आप बड़े चाव से खरीद रहे हैं, उसके अंदर असल में क्या-क्या मिला हुआ है? पैकेट के पीछे छोटे अक्षरों में छपा फूड लेबल सिर्फ एक औपचारिकता नहीं बल्कि आपकी सेहत का सबसे बड़ा राजदार होता है। प्रसिद्ध न्यूट्रिशनिस्ट अस्मिता का कहना है कि अगर हम खरीदारी करने से पहले सिर्फ पांच मिनट निकालकर सही तरीके से फूड लेबल पढ़ना सीख जाएं, तो कई गंभीर बीमारियों और मोटापे से आसानी से बचा जा सकता है। आइए विस्तार से जानते हैं कि फूड लेबल को डिकोड करने का सही तरीका क्या है और किन बातों का ध्यान रखना सबसे ज्यादा जरूरी है।

जब भी हम सुपरमार्केट या किसी ग्रोसरी स्टोर से कोई पैकेटबंद खाद्य सामग्री खरीदते हैं, तो उसके पिछले हिस्से पर एक न्यूट्रिशन फैक्ट्स टेबल और इंग्रीडिएंट्स की सूची दी होती है। इसे ही फूड लेबल कहा जाता है। कानूनन हर फूड मैन्युफैक्चरिंग कंपनी के लिए यह अनिवार्य होता है कि वे अपने उत्पाद में इस्तेमाल की गई सामग्री की पूरी जानकारी ग्राहकों को दें। हालांकि कंपनियां इस जानकारी को इस तरह से छिपाकर या बहुत छोटे फॉन्ट में लिखती हैं कि आम आदमी की नजर उस पर आसानी से नहीं जाती। न्यूट्रिशनिस्ट अस्मिता बताती हैं कि लोग अक्सर फ्रंट पैकेजिंग पर लिखे ‘शुद्ध मक्खन’ या ‘कम कैलोरी’ जैसे विज्ञापनों पर भरोसा कर लेते हैं, जबकि असली सच्चाई पीछे लिखे लेबल में छिपी होती है। लेबल पढ़ने की आदत न होने के कारण जाने-अनजाने हम शरीर में अत्यधिक मात्रा में सोडियम, रिफाइंड शुगर, मैदा और अनहेल्दी फैट यानी ट्रांस फैट की खपत कर रहे होते हैं, जो धीरे-धीरे हमारे मेटाबॉलिज्म को कमजोर कर देता है और डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर व मोटापे जैसी समस्याओं को न्योता देता है।

फूड लेबल को पढ़ने की शुरुआत हमेशा सामग्री की सूची यानी इंग्रीडिएंट्स लिस्ट से करनी चाहिए। यह किसी भी पैकेटबंद खाद्य पदार्थ की असल कुंडली होती है। न्यूट्रिशनिस्ट अस्मिता के अनुसार, नियमों के मुताबिक पैकेट पर सामग्री का जिक्र हमेशा घटते हुए क्रम (Descending Order) में किया जाता है। इसका सीधा मतलब यह है कि सूची में जिस चीज का नाम सबसे पहले लिखा होगा, उस उत्पाद में उस घटक की मात्रा सबसे अधिक होगी और जिसका नाम सबसे अंत में होगा, उसकी मात्रा सबसे कम होगी। उदाहरण के तौर पर, यदि आप कोई ‘हेल्दी होल व्हीट ब्रेड’ या ‘मल्टीग्रेन कुकीज’ खरीद रहे हैं और उसके इंग्रीडिएंट्स में सबसे पहले ‘मैदा’ (Refined Flour) या ‘चीनी’ (Sugar) लिखा है, तो समझ लीजिए कि वह उत्पाद उतना स्वास्थ्यवर्धक नहीं है जितना विज्ञापन में दावा किया जा रहा है। इसलिए खरीदारी करते समय हमेशा यह देखें कि मुख्य सामग्री वही होनी चाहिए जिसके नाम पर वह उत्पाद बेचा जा रहा है, जैसे ओट्स वाले पैकेट में ओट्स का प्रतिशत सबसे ऊपर होना चाहिए।

बाजार में मिलने वाले अधिकांश पैकेटबंद खाद्य पदार्थों में स्वाद बढ़ाने और उनकी शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए चीनी और नमक (सोडियम) का भारी मात्रा में इस्तेमाल किया जाता है। हैरान करने वाली बात यह है कि कंपनियां ग्राहकों को भ्रमित करने के लिए चीनी को सीधे ‘शुगर’ लिखने के बजाय कई अलग-अलग और जटिल नामों से छुपाती हैं। न्यूट्रिशनिस्ट अस्मिता बताती हैं कि फ्रुक्टोज सिरप, कॉर्न सिरप, माल्टोज, सुक्रोज, डेक्सट्रोज, केन शुगर और इनवर्ट शुगर असल में चीनी के ही अलग-अलग रूप हैं जो शरीर में जाकर तेजी से चर्बी और शुगर लेवल बढ़ाते हैं। इसी तरह, पैकेज्ड सूप, चिप्स और सॉस में सोडियम की मात्रा बहुत अधिक होती है जो ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए घातक साबित हो सकती है। इसके अलावा, पैकेट पर लिखे ‘हाइड्रोजनीकृत तेल’ (Hydrogenated Oil) या ‘वनस्पति फैट’ का मतलब सीधा ट्रांस फैट से होता है, जो हमारे दिल की सेहत के लिए बेहद नुकसानदायक माना जाता है। इसलिए लेबल पर इन छिपे हुए तत्वों की पहचान करना बेहद जरूरी है।

फूड लेबल को गलत तरीके से पढ़ने की सबसे बड़ी भूल लोग ‘सर्विंग साइज’ को नजरअंदाज करके करते हैं। जब हम कोई नमकीन, चिप्स या जूस का बड़ा पैकेट खरीदते हैं, तो उस पर लिखी कैलोरी और शुगर की मात्रा को पूरे पैकेट की मान लेते हैं, जबकि वह डेटा अक्सर प्रति सर्विंग (Per Serving) यानी एक बार खाने या पीने की तय मात्रा का होता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी चिप्स के पैकेट पर लिखा है कि एक सर्विंग में 150 कैलोरी है, और पूरे पैकेट में ऐसी चार सर्विंग्स हैं, तो पूरा पैकेट खत्म करने पर आप एक साथ 600 कैलोरी ग्रहण कर रहे होते हैं। न्यूट्रिशनिस्ट अस्मिता सलाह देती हैं कि हमेशा सर्विंग साइज को ध्यान से देखें और यह कैलकुलेट करें कि आप एक बार में उस उत्पाद का कितना हिस्सा खा रहे हैं। कैलोरी और कार्बोहाइड्रेट के इस गणित को समझकर ही आप अपने वजन को नियंत्रित रख सकते हैं और अनावश्यक वजन बढ़ने से बच सकते हैं।

अंत में न्यूट्रिशनिस्ट अस्मिता का यही संदेश है कि हर उपभोक्ता को अपनी सेहत के प्रति खुद जागरूक होना पड़ेगा। किसी भी विज्ञापन के बहकावे में आने के बजाय अपने चश्मे या फोन की टॉर्च का इस्तेमाल करके पैकेट के पीछे लिखे छोटे अक्षरों को पढ़ने की आदत डालें। कोशिश करें कि अपनी डाइट में प्रोसेस्ड और पैकेज्ड फूड्स की बजाय ताजे फल, सब्जियां, दालें और घर का बना सात्विक भोजन शामिल करें। यदि कभी मजबूरी में कोई पैकेटबंद सामान खरीदना पड़े भी, तो उसके लेबल पर लिखे इंग्रीडिएंट्स, शुगर और ट्रांस फैट की जांच जरूर करें। जब आप सोच-समझकर सही चीजों का चयन करेंगे, तो न केवल आपका शरीर स्वस्थ रहेगा बल्कि आप कई प्रकार की गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से भी सुरक्षित रह सकेंगे।