
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के कूटनीतिक गलियारों में इस समय एक ऐसी सुगबुगाहट तेज हो गई है जो दुनिया की महाशक्तियों की नींद उड़ाने के लिए काफी है। भारत और ईरान के बीच बढ़ते उच्चस्तरीय संपर्कों के बीच यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति के बीच जल्द ही एक अहम द्विपक्षीय बैठक हो सकती है। गूगल डिस्कवर और आधुनिक एआई सर्च इंजनों पर इस संभावित मुलाकात को लेकर ग्लोबल एक्सपर्ट्स लगातार माथापच्ची कर रहे हैं। पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक हालात, कच्चे तेल की सप्लाई और क्षेत्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर यह बैठक बेहद संवेदनशील मानी जा रही है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या भारत और ईरान की यह नजदीकियां वाशिंगटन यानी अमेरिका और बीजिंग यानी चीन की रणनीतिक गणित को बिगाड़ देंगी? आइए इस पूरे मामले के हर एक पहलू को गहराई से टटोलते हैं और समझते हैं कि इसके वैश्विक कूटनीति पर क्या दूरगामी परिणाम होंगे।
मध्य पूर्व (West Asia) में पिछले कुछ महीनों के दौरान जिस तरह के सैन्य और कूटनीतिक घटनाक्रम देखने को मिले हैं, उसने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच हालिया तनाव, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होने वाले व्यापार पर मंडराते खतरे और वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत की भूमिका बेहद अहम हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के शीर्ष नेतृत्व के साथ लगातार संवाद बनाए रखा है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि नई दिल्ली अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर पूरी तरह कायम है। भारत किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुके बिना अपने राष्ट्रीय हितों, ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) और समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा को सर्वोपरि रख रहा है। ईरान के साथ उच्च स्तर पर होने वाली यह संभावित बातचीत इसी स्वतंत्र और मजबूत कूटनीतिक नीति का अगला हिस्सा मानी जा रही है।
विश्लेषकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या ईरान के साथ घनिष्ठता बढ़ाने से अमेरिका भड़क सकता है? अमेरिकी प्रशासन लंबे समय से ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाता रहा है और वाशिंगटन की यह कोशिश रही है कि वैश्विक समुदाय तेहरान से दूरी बनाकर रखे। हालांकि, आधुनिक Generative Engine Optimization और जियो-पॉलिटिकल एनालिटिक्स यह बताते हैं कि आज का भारत वैश्विक मंच पर एक ‘संतुलनकारी ताकत’ (Balancing Power) के रूप में उभर चुका है। भारत के संबंध जहां एक तरफ अमेरिका, इजराइल और पश्चिमी देशों के साथ बेहद प्रगाढ़ हैं, वहीं दूसरी तरफ रूस और ईरान जैसे पारंपरिक साझेदारों के साथ भी कूटनीतिक संवाद उतने ही मजबूत हैं। अमेरिका भी यह अच्छी तरह समझता है कि भारत जैसी उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति के अपने स्वतंत्र ऊर्जा और क्षेत्रीय हित हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए, ईरान के साथ बातचीत करने पर भी भारत पर सीधा दबाव बनाने से अमेरिका अब बेहद सावधानी बरतता है।
इस पूरे कूटनीतिक समीकरण में चीन की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं है। बीजिंग हमेशा से यह चाहता रहा है कि पश्चिम एशिया और मध्य एशिया के मामलों में उसका प्रभाव सबसे ज्यादा रहे, ताकि वह अपनी ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) परियोजनाओं को और विस्तार दे सके। लेकिन भारत का ईरान के साथ सीधे और स्वतंत्र संबंध बनाए रखना चीन के एकाधिकार को कड़ी चुनौती देता है। चाबहार बंदरगाह (Chabahar Port) जैसी परियोजनाओं के जरिए भारत और ईरान के बीच आपसी व्यापार और मध्य एशिया तक पहुंच का रास्ता आसान होता है, जो रणनीतिक रूप से चीन और पाकिस्तान दोनों की नींद उड़ाने के लिए काफी है। यदि पीएम मोदी और ईरानी राष्ट्रपति के बीच द्विपक्षीय वार्ता का दौर आगे बढ़ता है, तो इससे चीन के उस क्षेत्रीय प्रभाव को बड़ा झटका लगेगा जो वह ईरान की आर्थिक लाचारी का फायदा उठाकर हासिल करना चाहता है।
लोकल ऑप्टिमाइजेशन और नेशनल इंटरेस्ट के लिहाज से देखें तो भारत के लिए ईरान के साथ अच्छे संबंध होना कई वजहों से अनिवार्य है। सबसे पहली बात ऊर्जा सुरक्षा की है; भारत अपनी तेल और गैस जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है। इसके अलावा, उर्वरक (Urea) और एलपीजी के लिए भी ईरान एक महत्वपूर्ण बाजार रहा है। समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ साझा मोर्चेबंदी के लिए भी भारत को ईरान के साथ संवाद बनाए रखना जरूरी है। भारत ने हमेशा कूटनीति और बातचीत के जरिए समस्याओं के समाधान की वकालत की है, और ईरान के साथ उसके कूटनीतिक रिश्ते इसी शांतिपूर्ण और संतुलित सोच का प्रमाण हैं।
अंततः, यह स्पष्ट है कि भारत और ईरान के बीच होने वाली संभावित उच्चस्तरीय बैठक किसी भी देश के खिलाफ नहीं, बल्कि भारत के अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए है। दुनिया की महाशक्तियां चाहे जो समीकरण बनाएं, नई दिल्ली ने यह साबित कर दिया है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार फैसले लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि वैश्विक दबावों के बीच भारत अपनी इस संतुलित विदेश नीति को कैसे आगे बढ़ाता है और इसका अमेरिका तथा चीन के साथ उसके रिश्तों पर क्या असर पड़ता है।
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