पारंपरिक शादियों के दौर में तेजी से बदल रही सोच: प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे में हुआ बड़ा खुलासा, देश की एक बड़ी आबादी ने माना ‘लिव-इन’ ट्रेंड का सच

भारतीय समाज में विवाह को केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का एक पवित्र और सात जन्मों का बंधन माना जाता रहा है। पिछले कुछ वर्षों में देश की महानगर संस्कृति, पश्चिमी प्रभावों, आर्थिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के चलते पारिवारिक और सामाजिक ताने-बाने में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। वैश्विक रिसर्च फर्म ‘प्यू रिसर्च सेंटर’ (Pew Research Center) द्वारा भारत के सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों पर किए गए एक व्यापक अध्ययन (Survey) में कई चौकाने वाले और दिलचस्प तथ्य सामने आए हैं। सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, पारंपरिक शादियों से पहले ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ (Live-in Relationship) में रहने का चलन अब देश के शहरी और अर्ध-शहरी युवाओं के बीच तेजी से सिर चढ़कर बोल रहा है। एक बड़े वर्ग का मानना है कि शादी जैसे अहम फैसले से पहले एक-दूसरे को मानसिक और व्यावहारिक रूप से ‘परखना’ (Compatibility Test) जरूरी हो गया है।

प्यू रिसर्च के आंकड़े: क्या कहते हैं भारत के लोग?

प्यू रिसर्च सेंटर के इस सामाजिक अध्ययन में देश के विभिन्न हिस्सों और आयु वर्ग के हजारों लोगों से उनके पारिवारिक जीवन, विवाह और आधुनिक रिश्तों पर राय ली गई थी।

सर्वे के मुताबिक, पारंपरिक मूल्यों का सम्मान करने वाले भारत जैसे देश में भी अब शादी से पहले पार्टनर के साथ कुछ समय बिताने या लिव-इन में रहने के विचार को लेकर लोगों की सोच में वैचारिक बदलाव आ रहा है। अध्ययन में शामिल लगभग 75% से अधिक लोगों ने स्वीकार किया कि आधुनिक दौर में शादी की सफलता दर बढ़ाने और भविष्य के तलाक या वैवाहिक कलह से बचने के लिए पार्टनर की आदतों, स्वभाव और वित्तीय समझ को पहले से परखना व्यावहारिक रूप से बेहद जरूरी हो गया है। हालांकि, सामाजिक और ग्रामीण परिवेश में आज भी इसे लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं हैं, लेकिन महानगरों (जैसे दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, पुणे) के युवाओं में इसे लेकर खुलापन तेजी से बढ़ रहा है।

‘परख’ का दौर: क्यों बढ़ रहा है लिव-इन का क्रेज?

मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों के अनुसार, लिव-इन रिलेशनशिप के प्रति युवाओं के झुकाव के पीछे कई बड़े मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण हैं:

  • तलाक की बढ़ती दरों से बचाव: आज की पीढ़ी अपने माता-पिता या आसपास के समाज में असफल शादियों और कानूनी अदालतों के चक्कर काटते जोड़ों को बहुत करीब से देख रही है। वे शादी के बाद होने वाले मानसिक आघात और सामाजिक दबाव से बचने के लिए पहले ही पूरी तरह आश्वस्त होना चाहते हैं।

  • वित्तीय और घरेलू जिम्मेदारियों की समझ: एक ही छत के नीचे रहने से पार्टनर के छोटे-छोटे स्वभाव, गुस्से को संभालने के तरीके, वित्तीय प्रबंधन और घरेलू कामकाज में सहभागिता का वास्तविक आकलन हो जाता है, जो केवल डेटिंग के दौरान पता नहीं चल पाता।

  • पारिवारिक दबाव से मुक्ति: कई युवा पारंपरिक विवाह व्यवस्था में थोपी गई रूढ़ियों और पारिवारिक हस्तक्षेप से दूर अपनी शर्तों पर एक स्वतंत्र जीवन जीना पसंद करते हैं।

कानूनी स्थिति और सामाजिक स्वीकृति के बीच का संघर्ष

भले ही सुप्रीम कोर्ट और देश की न्यायपालिका ने बालिग स्त्री-पुरुष के अपनी मर्जी से साथ रहने (लिव-इन रिलेशनशिप) को कानूनी रूप से वैध और उनके मौलिक अधिकारों का हिस्सा माना है, लेकिन सामाजिक धरातल पर आज भी इसे लेकर एक बड़ा वैचारिक संघर्ष जारी है। बुजुर्ग पीढ़ी और पारंपरिक मूल्यों को मानने वाले लोग इसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताते हैं, जबकि नई पीढ़ी इसे आधुनिक जीवनशैली की व्यावहारिक जरूरत मानती है।

बदलता हुआ यह दौर इस बात का प्रमाण है कि भारत का समाज अब एक संक्रमण काल से गुजर रहा है, जहां परंपरा और आधुनिकता के बीच एक नया संतुलन तलाशने की कोशिश की जा रही है।