
सनातन धर्म में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को अत्यंत पवित्र और फलदायी माना जाता है। इस एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी, पद्मा एकादशी, जलझूलनी एकादशी या डोल ग्यारस के नाम से जाना जाता है। इस दिन का सबसे बड़ा आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व यह है कि क्षीरसागर में चार महीने के लिए योगनिद्रा में लीन भगवान श्रीहरि विष्णु इसी तिथि को अपनी शयन मुद्रा में परिवर्तन करते हैं, यानी एक करवट से दूसरी करवट लेते हैं। ‘परिवर्तन’ (करवट बदलने) के कारण ही इस पावन तिथि का नाम परिवर्तिनी एकादशी पड़ा।
यह सवाल अक्सर श्रद्धालुओं के मन में आता है कि आखिर भगवान विष्णु इसी विशेष दिन ही करवट क्यों बदलते हैं और इसके पीछे का गहरा पौराणिक और दार्शनिक आधार क्या है।
धार्मिक ग्रंथों और पुराणों (विशेषकर भविष्योत्तर पुराण) में भगवान विष्णु के करवट लेने का संबंध दैत्यराज बलि और भगवान के वामन अवतार से जुड़ा हुआ है।
पौराणिक कथा के अनुसार, जब तीनों लोकों पर दानवीर असुरराज बलि का आधिपत्य स्थापित हो गया और देवराज इंद्र सहित सभी देवता भयभीत होकर भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे, तब श्रीहरि ने देवमाता अदिति के गर्भ से बौने ब्राह्मण ‘वामन’ के रूप में पांचवां अवतार लिया। भगवान वामन राजा बलि के यज्ञ में पहुंचे और उनसे दान स्वरूप मात्र तीन पग भूमि की मांग की। असुर गुरु शुक्राचार्य की चेतावनी के बावजूद बलि ने वामन को तीन पग भूमि देने का संकल्प ले लिया।
भगवान वामन ने अपना विराट त्रिविक्रम रूप धारण किया। उन्होंने एक पग में पूरी पृथ्वी और पाताल लोक नाप लिया तथा दूसरे पग में संपूर्ण स्वर्ग लोक को अपने अधिकार में कर लिया। जब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा, तो धर्मनिष्ठ राजा बलि ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपना सिर आगे कर दिया और कहा कि वे तीसरा पग उनके मस्तक पर रखें। बलि की इस अद्वितीय भक्ति और सत्यनिष्ठा से भगवान अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने बलि को पाताल लोक (सुतल लोक) का राजा बना दिया।
जब बलि पाताल जाने लगे, तो उन्होंने भगवान विष्णु से एक वरदान मांगा कि प्रभु दिन-रात उनके सामने पाताल लोक में निवास करें। भक्तवत्सल भगवान ने बलि के इस आग्रह को स्वीकार कर लिया और उनके द्वारपाल बन गए।
आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) के दिन भगवान विष्णु राजा बलि को दिए वचन का मान रखने और ब्रह्मांड के संतुलन के लिए क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं। यह काल चतुर्मास (चार महीने की अवधि) कहलाता है, जिसमें सृष्टि के संचालन का कार्यभार भगवान शिव संभालते हैं।
देवशयनी एकादशी से ठीक दो महीने बाद भाद्रपद शुक्ल एकादशी आती है। यह चतुर्मास का ठीक मध्य पड़ाव (Midpoint) होता है। दो महीने तक एक ही करवट में विश्राम करने के बाद भगवान अपनी मुद्रा बदलते हैं और दाईं से बाईं ओर करवट लेते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब भगवान एक ही मुद्रा में शयन करते हैं, तो उनका ध्यान एक ही दिशा में केंद्रित रहता है। मध्य काल में करवट बदलने के जरिए वे संपूर्ण ब्रह्मांड, पाताल लोक और अपने सभी भक्तों पर अपनी कृपा दृष्टि का संतुलन साधते हैं। इसके ठीक दो महीने बाद यानी कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) को भगवान योगनिद्रा से पूरी तरह जागते हैं।
भगवान विष्णु का शयन और करवट बदलना केवल एक बाह्य घटना नहीं, बल्कि प्रकृति और मानवीय चेतना में होने वाले गहरे बदलावों का प्रतीक है:
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प्रकृति और ऋतु परिवर्तन: भाद्रपद मास का यह समय वर्षा ऋतु के शिखर से शरद ऋतु के आगमन की ओर संक्रमण का काल होता है। प्रकृति में तापमान, वातावरण और नमी का संतुलन बदलता है। सनातन परंपरा में भगवान के करवट लेने को प्रकृति के इस चक्रवाती और मौसमी बदलाव से जोड़ा गया है।
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साधना और अंतर्मुखी ऊर्जा का प्रवाह: चातुर्मास के दो महीने साधकों के आत्म-चिंतन और तपस्या के होते हैं। करवट बदलने का अर्थ आध्यात्मिक रूप से यह है कि व्यक्ति को अपनी साधना और जीवनशैली में स्थिरता के बाद नवचेतना और आंतरिक परिवर्तन लाना चाहिए, ताकि मन में जड़ता (Stagnation) न आए।
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भगवान वामन का पूजन: इस दिन भगवान विष्णु के वामन रूप की विशेष पूजा की जाती है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु इस दिन चावल, दही, चांदी या पीली वस्तुओं का दान करता है और भगवान वामन की आराधना करता है, उसे तीनों लोकों की पूजा का फल प्राप्त होता है और उसके जीवन की समस्त नकारात्मक दिशाएं सकारात्मकता में बदल जाती हैं।
संक्षेप में, परिवर्तिनी एकादशी का यह विधान हमें सिखाता है कि जिस प्रकार भगवान योगनिद्रा में भी करवट लेकर ब्रह्मांडीय संतुलन बनाए रखते हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने जीवन में समय के अनुसार उचित परिवर्तन और संतुलन स्वीकार करना चाहिए।
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