न्यायपालिका पर जस्टिस अभय एस. ओका का बड़ा बयान ,आम आदमी की उम्मीदों पर खरा उतरने में विफल रहा सिस्टम

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News India Live, Digital Desk: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अभय एस. ओका (Justice Abhay S. Oka) ने भारतीय न्यायपालिका की वर्तमान स्थिति को लेकर एक अत्यंत गंभीर और आत्ममंथन करने वाला बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया कि न्यायपालिका आम आदमी की उम्मीदों को पूरा करने में विफल रही है। जस्टिस ओका का यह बयान ऐसे समय में आया है जब अदालतों में लंबित मामलों (Pending Cases) की संख्या और न्याय मिलने में होने वाली देरी पर देश भर में बहस छिड़ी हुई है।

‘तारीख पर तारीख’ और न्याय में देरी पर चिंता

जस्टिस ओका ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि न्याय प्रणाली का सबसे बड़ा दोष ‘अत्यधिक विलंब’ है। उन्होंने कहा कि एक आम नागरिक जब अदालत का दरवाजा खटखटाता है, तो वह शीघ्र न्याय की उम्मीद करता है, लेकिन मौजूदा ढांचा उसे वर्षों तक कानूनी प्रक्रियाओं में उलझाए रखता है। उनके अनुसार, “न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है” (Justice delayed is justice denied) और यह स्थिति न्यायपालिका के प्रति जनता के विश्वास को कमजोर कर रही है।

जस्टिस ओका के संबोधन के मुख्य बिंदु:

आम आदमी की पहुंच: उन्होंने जोर दिया कि कानूनी प्रक्रिया इतनी जटिल और महंगी हो गई है कि एक साधारण व्यक्ति के लिए न्याय पाना एक बड़ी चुनौती बन गया है।

संसाधनों की कमी: पूर्व जस्टिस ने अदालतों में न्यायाधीशों के रिक्त पदों और बुनियादी ढांचे (Infrastructure) की कमी को भी इस विफलता का एक मुख्य कारण बताया।

आत्म-सुधार की आवश्यकता: उन्होंने न्यायिक बिरादरी से आह्वान किया कि वे केवल प्रणाली की कमियों को न गिनाएं, बल्कि इसे सुधारने के लिए ठोस कदम उठाएं।

टेक्नोलॉजी का उपयोग: उन्होंने न्याय वितरण प्रणाली को तेज और पारदर्शी बनाने के लिए आधुनिक तकनीक और ई-कोर्ट्स (e-Courts) को बढ़ावा देने की वकालत की।

न्यायिक जवाबदेही पर जोर

जस्टिस अभय एस. ओका, जो अपने कार्यकाल के दौरान मानवाधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता के मुखर समर्थक रहे हैं, ने कहा कि न्यायपालिका को अपनी जवाबदेही तय करनी होगी। उन्होंने सुझाव दिया कि निचली अदालतों से लेकर शीर्ष अदालत तक, एक ऐसी कार्यप्रणाली विकसित की जानी चाहिए जिससे गरीब और वंचित वर्ग के लोगों को समय पर राहत मिल सके। उनके इस बयान को कानूनी विशेषज्ञों द्वारा न्यायपालिका के भीतर “सकारात्मक सुधार” (Reform) की दिशा में एक बड़ी चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।

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