
बिहार की राजनीति और जल संसाधनों के प्रबंधन को लेकर एक बार फिर से केंद्र और राज्य के बीच तल्खियां बढ़ती हुई नजर आ रही हैं। जनता दल यूनाइटेड (JDU) के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय झा ने दशकों पुरानी फरक्का बराज संधि (Farakka Barrage Treaty) को लेकर केंद्र सरकार पर बेहद तीखा और आक्रामक हमला बोला है। कुछ समय पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य के बाढ़ प्रभावित गंगा बेसिन और कटाव वाले क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण (Aerial Survey) किया था, जिसके बाद से पार्टी का नेतृत्व इस मुद्दे पर पूरी तरह आक्रामक मुद्रा में आ गया है। संजय झा ने दो टूक शब्दों में कहा कि फरक्का संधि के गलत प्रावधानों और कुप्रबंधन के कारण आज बिहार को हर साल भीषण बाढ़, भयंकर नदी कटाव और गाद (Silt Accumulation) की विकराल समस्या झेलनी पड़ रही है, जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था और उपजाऊ जमीन तबाह हो रही है। जेडीयू के इस कड़े रुख के बाद राष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर से अंतरराज्यीय जल बंटवारे और बराज नीतियों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है।
क्या है फरक्का संधि का इतिहास और क्यों बिहार के लिए यह बना जी का जंजाल?
फरक्का बराज का निर्माण पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में गंगा नदी पर किया गया था, जिसका मुख्य उद्देश्य कलकत्ता बंदरगाह (वर्तमान में श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट) में नौवहन और जल प्रवाह को बनाए रखना था। इसके लिए वर्ष 1996 में भारत और बांग्लादेश के बीच फरक्का जल संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे। हालांकि, इस संधि और बराज के संचालन के शुरुआती दिनों से ही बिहार के नेता और जल विशेषज्ञ यह चेतावनी देते आ रहे हैं कि इसके कारण गंगा नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो रहा है। नदी में भारी मात्रा में सिल्ट (गाद) जमा होने के कारण तलहटी उथली हो गई है, जिसकी वजह से मानसून के मौसम में जरा सी बारिश या पानी छोड़े जाने पर गंगा का पानी अपने किनारों को तोड़कर रिहायशी इलाकों और उपजाऊ खेतों में तबाही मचा देता है। जेडीयू नेताओं का यह कहना है कि फरक्का बराज ने बिहार के लिए वरदान बनने के बजाय एक स्थायी अभिशाप का रूप ले लिया है, जिसका खामियाजा यहां के करोड़ों किसानों और आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हवाई सर्वे और जमीनी हकीकत का आकलन
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हमेशा से गंगा नदी की गाद (Silt Management) और बाढ़ नियंत्रण को लेकर गंभीर रहे हैं। उनका यह स्पष्ट मानना है कि जब तक केंद्र सरकार गंगा नदी के मैदानी इलाकों में गाद के प्रबंधन और फरक्का बराज की तकनीकी कमियों को दूर करने के लिए कोई राष्ट्रीय नीति नहीं बनाती, तब तक बिहार को बाढ़ और कटाव से पूरी तरह सुरक्षित नहीं किया जा सकता। इसी विजन के तहत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल ही में गंगा नदी के तटीय इलाकों और कटाव से प्रभावित संवेदनशील क्षेत्रों का खुद हवाई सर्वे किया था। इस दौरान उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए थे कि जिन इलाकों में नदियां तेजी से जमीन काट रही हैं, वहां सुरक्षात्मक कार्य युद्ध स्तर पर किए जाएं। हवाई सर्वे के दौरान सामने आई इस भयानक तसवीर ने राज्य सरकार और जेडीयू नेतृत्व को झकझोर कर रख दिया, जिसके बाद संजय झा ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर पूरी ताकत से उठाते हुए केंद्र सरकार से इस संधि पर पुनर्विचार करने की मांग कर दी है।
संजय झा का केंद्र पर बड़ा प्रहार: ‘बिहार की उपेक्षा और आर्थिक नुकसान अब बर्दाश्त नहीं’
प्रेस कांफ्रेंस और राजनीतिक मंचों के माध्यम से केंद्र सरकार को घेरते हुए संजय झा ने कहा कि बिहार ने हमेशा देश के विकास में अपना योगदान दिया है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से जल प्रबंधन की गलत नीतियों के कारण इस राज्य को हमेशा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। उन्होंने कहा कि फरक्का बराज की वजह से गंगा के इकोसिस्टम को जो भारी नुकसान पहुंचा है, उसकी भरपाई की जानी चाहिए। जेडीयू नेता ने दो टूक कहा कि केवल बराज बना देने से समस्याओं का समाधान नहीं होता, बल्कि यदि उससे किसी दूसरे राज्य की जनता तबाह हो रही है, तो सरकार को उस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। इस बयान के बाद से राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या एनडीए गठबंधन के भीतर जल और नीतिगत मामलों को लेकर आने वाले दिनों में और अधिक राजनीतिक खींचतान देखने को मिल सकती है।
भविष्य की चुनौतियां और राष्ट्रीय जल नीति पर उठ रहे बड़े सवाल
फरक्का संधि को लेकर जेडीयू का यह मुखर विरोध इस बात का संकेत है कि क्षेत्रीय दल अब अपने राज्य के संसाधनों और भौगोलिक सुरक्षा को लेकर किसी भी प्रकार का समझौता करने के मूड में नहीं हैं। बिहार जैसे राज्य के लिए जहां हर साल बाढ़ और कटाव से हजारों परिवार बेघर हो जाते हैं, यह जीवन और मरण का प्रश्न बन चुका है। विशेषज्ञों का भी यह मानना है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को मिलकर एक ऐसी वैज्ञानिक और दीर्घकालिक राष्ट्रीय जल नीति (National Water Policy) बनानी चाहिए जिसमें सिल्ट मैनेजमेंट को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। आने वाले समय में जब यह मामला संसद से लेकर राजनीतिक मंचों तक गूंजेगा, तो केंद्र सरकार पर भी इस पुरानी संधि के प्रभावों की समीक्षा करने का भारी दबाव बनेगा। बिहार की जनता और किसान अब यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि उनके इस दर्द को राष्ट्रीय स्तर पर सुना जाएगा और स्थायी समाधान निकाला जाएगा।
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