
बिहार की राजनीति और राज्य विधान परिषद के गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी और धमाकेदार खबर सामने आ रही है। हाल ही में ‘जन सुराज’ पार्टी का दामन थामने वाले दो चर्चित निर्दलीय एमएलसी (MLC) राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी की विधान परिषद सदस्यता पर गहरा कानूनी और संवैधानिक संकट मंडराने लगा है। जन सुराज पार्टी के इस राजनीतिक कदम के खिलाफ अब खुद विधान परिषद के प्रशासनिक और कानूनी नियमों का हवाला देते हुए सभापति के समक्ष आधिकारिक याचिका दाखिल कर दी गई है। भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के कड़े प्रावधानों के तहत इन दोनों जनप्रतिनिधियों की सदस्यता रद्द करने की मांग उठाई गई है, जिससे बिहार के राजनीतिक तापमान में अचानक भारी उछाल आ गया है।
बिहार में आगामी राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए प्रशांत किशोर की पार्टी ‘जन सुराज’ का दामन थामने वाले निर्दलीय विधान परिषद सदस्यों (MLC) राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी के खिलाफ यह कानूनी घेराबंदी बेहद गंभीर मोड़ ले चुकी है। भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची और विधान परिषद की नियमावली के अनुसार, यदि कोई जनप्रतिनिधि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतकर सदन का सदस्य बनता है, तो वह अपने कार्यकाल के दौरान किसी भी पंजीकृत राजनीतिक दल की औपचारिक सदस्यता ग्रहण नहीं कर सकता। यदि कोई निर्दलीय सदस्य ऐसा करता है, तो उसकी सदन की सदस्यता स्वतः ही अयोग्य ठहराए जाने योग्य हो जाती है। इसी संवैधानिक नियम को आधार बनाकर दोनों एमएलसी की सदस्यता समाप्त करने के लिए विधान परिषद सभापति के पास औपचारिक दस्तावेज और साक्ष्य सौंपे गए हैं।
बिहार के शिक्षक और स्नातक क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले एमएलसी बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज ने कुछ समय पूर्व ही बड़े धूमधाम के साथ जन सुराज पार्टी की सदस्यता ग्रहण की थी। दोनों नेताओं का दावा था कि वे राज्य में शिक्षा, रोजगार और व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई को मजबूती देने के लिए इस नए राजनीतिक विकल्प के साथ जुड़े हैं। हालांकि, उनके इस कदम के तुरंत बाद विपक्षी खेमे और कानूनी विशेषज्ञों ने दलबदल विरोधी कानून की याद दिलाते हुए उनकी विधायकी पर सवाल खड़े कर दिए थे। अब यह मामला सीधे विधान परिषद के सभापति की टेबल पर पहुंच चुका है, जहां से दोनों नेताओं को औपचारिक कारण बताओ नोटिस जारी होने की पूरी संभावना है।
संविधान विशेषज्ञों और प्रशासनिक जानकारों का स्पष्ट मानना है कि निर्दलीय जनप्रतिनिधियों के लिए दलबदल कानून बेहद कड़ा और स्पष्ट है। यदि विधान परिषद के सभापति जांच में यह पाते हैं कि राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी ने अपनी निर्दलीय स्थिति को छोड़कर आधिकारिक रूप से किसी राजनीतिक दल का झंडा थामा है या उसकी सदस्यता ली है, तो सभापति के पास उनकी सदस्यता रद्द करने का पूरा संवैधानिक अधिकार सुरक्षित है। इससे पूर्व भी देश की विभिन्न विधानसभाओं और विधान परिषदों में निर्दलीय विधायकों व एमएलसी द्वारा किसी दल में शामिल होने पर उनकी सदस्यता गंवाने के कई ऐतिहासिक उदाहरण मौजूद रहे हैं।
इस हाई-प्रोफाइल कानूनी और राजनीतिक लड़ाई के बाद अब सभी की निगाहें बिहार विधान परिषद के सभापति द्वारा लिए जाने वाले फैसले पर टिक गई हैं। यदि दोनों निर्दलीय एमएलसी की सदस्यता रद्द होती है, तो यह जन सुराज पार्टी और उन दोनों नेताओं के लिए एक बहुत बड़ा झटका साबित होगा। वहीं दूसरी ओर, राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी की कानूनी टीम भी इस याचिका के खिलाफ अपना बचाव तैयार करने में जुट गई है। माना जा रहा है कि दोनों एमएलसी यह तर्क देने की कोशिश कर सकते हैं कि वे केवल वैचारिक रूप से समर्थन दे रहे हैं न कि तकनीकी रूप से दल की सदस्यता ली है। बहरहाल, इस पूरे घटनाक्रम ने बिहार की राजनीति में एक नया संवैधानिक संग्राम छेड़ दिया है।
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