
भारत में किसी गंभीर बीमारी या दुर्घटना की स्थिति में निजी अस्पतालों का रुख करना आम नागरिक और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए केवल शारीरिक कष्ट का नहीं, बल्कि भारी-भरकम वित्तीय बर्बादी का सबब बनता जा रहा है। देश में 14 प्रतिशत की दर से बढ़ रही मेडिकल महंगाई (Medical Inflation) और निजी अस्पतालों द्वारा वसूले जाने वाले अनियंत्रित शुल्कों ने आउट-ऑफ-पॉकेट हेल्थकेयर खर्च (Out-of-Pocket Expenditure) को असहनीय स्तर पर पहुंचा दिया है। आज भी देश में लाखों परिवार केवल किसी एक परिजन के अस्पताल में भर्ती होने और उसके इलाज का बिल चुकाने के चलते गरीबी रेखा से नीचे खिसक जाते हैं या जीवन भर के लिए कर्ज के दलदल में फंस जाते हैं।
इस गंभीर संकट को लेकर भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) और संसद की स्वास्थ्य संबंधी स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee on Health) दोनों बेहद कड़े रुख में आ चुके हैं। जहां सुप्रीम कोर्ट ने ‘क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स (रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) एक्ट 2010’ के नियम 9(2) के तहत केंद्र और राज्य सरकारों को इलाज और प्रक्रियाओं के लिए एक मानक ‘प्राइस रेंज’ (मानक दरें) तय करने की दिशा में ठोस कदम उठाने को कहा है, वहीं संसद की स्थायी समिति ने हाल ही में अपनी 176वीं रिपोर्ट में सिफारिश की है कि महानगरों में निजी अस्पतालों के बेसिक रूम का किराया नजदीकी 3-स्टार होटल के औसत किराए से अधिक नहीं होना चाहिए।
रूम रेंट पर 3-स्टार होटल कैपिंग की सिफारिश: संसदीय समिति का बड़ा प्रहार
संसद की स्वास्थ्य संबंधी स्थायी समिति की 176वीं रिपोर्ट—”सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं की सामर्थ्य और सुलभता”—ने निजी अस्पतालों के बिलिंग ढांचे की खामियों को सीधे उजागर किया है। समिति ने रेखांकित किया कि कई कॉरपोरेट और सुपर-स्पेशियलिटी अस्पतालों में एक साधारण सिंगल रूम का दैनिक किराया ₹10,000 से ₹25,000 प्रतिदिन तक वसूला जा रहा है, जो किसी लक्जरी 5-स्टार होटल से भी अधिक है।
समिति ने स्पष्ट सिफारिश की है कि बड़े महानगरीय क्षेत्रों में अस्पतालों के बेसिक रूम के किराए को आसपास के 3-स्टार होटलों के औसत टैरिफ के आधार पर तय किया जाना चाहिए। रूम रेंट इसलिए सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि अधिकांश अस्पताल डॉक्टर विजिट फीस, नर्सिंग चार्ज, मॉनिटरिंग फीस और यहां तक कि सर्जरी पैकेज की लागत को मरीज द्वारा चुने गए ‘रूम कैटेगरी’ के अनुसार 2 से 3 गुना तक बढ़ा देते हैं। हालांकि, निजी अस्पताल संगठनों (जैसे AHPI) का तर्क है कि अस्पताल के कमरों में 24 घंटे नर्सिंग, ऑक्सीजन लाइन, इन्फेक्शन कंट्रोल और आपातकालीन मेडिकल बैकअप होता है, इसलिए उनकी तुलना केवल होटल के कमरों से नहीं की जा सकती। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इलाज की लागत को कमरे के प्रकार से जोड़ना पूरी तरह अनैतिक और भ्रामक है।
कंस्यूमेबल्स, दवाओं और जांचों में भारी मुनाफाखोरी: कैसे फूलता है मेडिकल बिल?
निजी अस्पतालों के बिल में सबसे बड़ी लूट उन मदों (Items) में होती है जिन पर सामान्यतः कोई सरकारी नियंत्रण नहीं है:
-
कंस्यूमेबल्स और डिस्पोजेबल्स पर 500% से 1000% मार्जिन: ग्लव्स, सिरिंज, कॉटन, गॉज, पीपीई किट, कैथेटर, कैनुला और सैनिटाइजर जैसी बुनियादी चीजों पर अस्पताल प्रिंटेड एमआरपी (MRP) वसूलते हैं, जबकि थोक बाजार से वे इन्हें 80 से 90 प्रतिशत तक की भारी छूट पर खरीदते हैं। प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) की जांच में भी पाया गया था कि कई बड़े अस्पतालों का आधा मुनाफा अकेले इन गैर-दवा उपभोग्य सामग्रियों से आता है।
-
अस्पताल के अंदरूनी फार्मेसी से ही दवा खरीदने की बाध्यता: मरीजों के परिजनों को अस्पताल के बाहर की सस्ती या जेनेरिक दवाओं की दुकानों से दवाइयां और सर्जिकल सामान खरीदने की अनुमति नहीं दी जाती। अस्पताल की अपनी फार्मेसी में ब्रांडेड और महंगी दवाएं ही थमाई जाती हैं।
-
अनावश्यक जांच और प्रोसीजर बंडलिंग: अस्पताल में भर्ती होते ही कई ऐसे महंगे ब्लड टेस्ट्स, एमआरआई, सीटी स्कैन और दैनिक रूटीन टेस्ट लिख दिए जाते हैं जिनकी मरीज की मुख्य बीमारी में कोई सीधी आवश्यकता नहीं होती।
-
छिपे हुए शुल्क (Hidden Line Items): बायोमेडिकल वेस्ट डिस्पोजल फीस, आरएमओ (रेजिडेंट मेडिकल ऑफिसर) चार्ज, डाइटीशियन चार्ज, एडमिनिस्ट्रेटिव प्रोसेसिंग फीस और एसी चार्ज जैसे अनगिनत छोटे-छोटे मद जोड़कर अंतिम बिल को 40 से 50 प्रतिशत तक बढ़ा दिया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का हलफनामा: ‘रेट रेंज’ तय करना संवैधानिक रूप से वैध
सुप्रीम कोर्ट में ‘वेटेरन्स फोरम फॉर ट्रांसपेरेंसी इन पब्लिक लाइफ’ द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने निजी अस्पतालों की दरों को विनियमित करने के अपने अधिकार का पुरजोर बचाव किया है। ऑल इंडिया ऑप्थल्मोलॉजिकल सोसायटी द्वारा नियम 9(ii) को दी गई चुनौती के जवाब में केंद्र ने शीर्ष अदालत को बताया कि क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट नियमों के तहत निजी अस्पतालों के लिए एक निर्धारित दर दायरा (Range of Rates) तय करना संविधान के अनुच्छेद 21 (Right to Health / जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार) और अनुच्छेद 47 के तहत पूरी तरह वैध है।
केंद्र ने स्पष्ट किया कि सरकार किसी एक कठोर दर (Uniform Single Price) को थोपने के बजाय एक ऐसी लचीली ‘रेट रेंज’ बनाना चाहती है जो अस्पताल के बुनियादी ढांचे, शहर की श्रेणी (Tier-1, 2, 3), और सेवा की गुणवत्ता को ध्यान में रखे। यदि अस्पताल मनमाना चार्ज वसूलते रहेंगे, तो इससे बीमा कंपनियों के प्रीमियम भी बेतहाशा बढ़ेंगे और आम नागरिक इलाज के अधिकार से पूरी तरह वंचित हो जाएगा।
हेल्थ इंश्योरेंस और ‘कैशलेस एवरीवेयर’: दावों के बावजूद डिस्चार्ज पर घंटों का इंतजार
देश में स्वास्थ्य बीमा धारकों की संख्या बढ़ने के बावजूद बीमाधारक अस्पतालों के बिलिंग काउंटरों पर खुद को असहाय महसूस करते हैं। भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) ने ‘कैशलेस एवरीवेयर’ (Cashless Everywhere) व्यवस्था लागू की है, जिसके तहत मरीज किसी भी गैर-नेटवर्क पंजीकृत अस्पताल में भी कैशलेस इलाज की मांग कर सकता है।
इसके साथ ही IRDAI ने सख्त नियम बनाए हैं कि मरीज के डिस्चार्ज समरी मिलने के 3 घंटे के भीतर टीपीए (TPA) और बीमा कंपनी को अंतिम क्लेम अप्रूवल देना होगा। लेकिन जमीनी हकीकत में, अस्पताल और बीमा कंपनियों के बीच टैरिफ विवादों के चलते मरीजों को डिस्चार्ज होने के लिए 8 से 10 घंटे तक अस्पताल के लॉबी में इंतजार करना पड़ता है। कई अस्पताल जानबूझकर कैशलेस से मना कर मरीज को ‘रिइंबर्समेंट मोड’ (Reimbursement Track) पर धकेल देते हैं ताकि वे बिना किसी बीमा कटौती के पूरा बिल सीधे मरीज से वसूल सकें। इसके अलावा, बीमा पॉलिसियों में मौजूद को-पेमेंट, रूम रेंट सब-लिमिट्स और नॉन-मेडिकल आइटम्स की लंबी कटौती सूची के कारण 5 लाख के बिल में से मरीज को अपनी जेब से ₹1.5 से ₹2 लाख तक भरने पड़ते हैं।
निजी अस्पतालों का पक्ष: उच्च निवेश, विशेषज्ञ डॉक्टरों की लागत और व्यावहारिक चुनौतियां
निजी स्वास्थ्य क्षेत्र के दिग्गजों और हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स का कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं की लागत बढ़ने के पीछे केवल मुनाफाखोरी ही एकमात्र कारण नहीं है। अस्पतालों का तर्क है कि:
-
भारी पूंजीगत व्यय (Capex): अत्याधुनिक एमआरआई, पीईटी-सीटी, रोबोटिक सर्जरी सिस्टम और उच्च स्तरीय वेंटिलेटर्स को करोड़ों रुपये के विदेशी मुद्रा खर्च पर आयात किया जाता है, जिनका रखरखाव और सॉफ्टवेयर अपग्रेडेशन बेहद खर्चीला होता है।
-
कुशल मानव संसाधन का वेतन: सुपर-स्पेशलिस्ट सर्जन्स, एनेस्थेटिस्ट्स, प्रशिक्षित आईसीयू नर्सों और पैरामेडिकल स्टाफ का वेतन पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ा है।
-
सरकारी योजनाओं की बकाया राशि: आयुष्मान भारत (PM-JAY) और सीजीएचएस (CGHS) के तहत सरकारी पैकेज दरों पर इलाज करने के बावजूद राज्यों द्वारा समय पर भुगतान न किए जाने से अस्पतालों के कैश फ्लो पर गहरा असर पड़ता है, जिसकी भरपाई वे निजी भुगतान वाले मरीजों से करने की कोशिश करते हैं।
समाधान की रूपरेखा: कैसे बनेगी पारदर्शी और किफायती स्वास्थ्य व्यवस्था?
भारत में स्वास्थ्य सुरक्षा को नागरिकों के मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित करने के लिए विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं ने निम्नलिखित ठोस कदम उठाने पर बल दिया है:
-
पारदर्शी और मानकीकृत बिलिंग (Standardized Itemized Billing): सभी अस्पतालों के लिए अनिवार्य किया जाए कि वे रिसेप्शन और वेबसाइट पर प्रमुख 50 से 100 सर्जिकल प्रक्रियाओं, रूम रेंट और जांचों की न्यूनतम व अधिकतम दरों की स्पष्ट सूची सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करें।
-
कंस्यूमेबल्स और इम्प्लांट्स पर ट्रेड मार्जिन युक्तिकरण (TMR): जिस तरह केंद्र सरकार ने कार्डियक स्टेंट्स और नी-इम्प्लांट्स की कीमतों पर सीमा (Price Capping) लगाई थी, उसी तर्ज पर सिरिंज, ग्लव्स और कैंसर की दवाओं के ट्रेड मार्जिन को अधिकतम 30% तक सीमित किया जाना चाहिए।
-
स्वतंत्र हेल्थकेयर रेगुलेटर का गठन: ट्राई (TRAI) या आईआरडीएआई (IRDAI) की तर्ज पर एक स्वतंत्र ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा विनियामक प्राधिकरण’ (Healthcare Regulatory Authority) बनाया जाए, जो मरीजों के बिलिंग विवादों, अत्यधिक वसूली और मेडिकल लापरवाही की शिकायतों का 30 दिनों में निपटारा कर सके।
-
सार्वजनिक स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार: एम्स, जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों की गुणवत्ता और क्षमता को इतना सुदृढ़ किया जाए कि आम जनता को मजबूरी में निजी अस्पतालों की शरण में न जाना पड़े।
-
आयुष्मान भारत का सार्वभौमिकरण: 70 वर्ष से अधिक आयु के सभी वरिष्ठ नागरिकों को हाल ही में आयुष्मान भारत के दायरे में लाया गया है; इसी तरह मध्यम वर्ग के लिए किफायती प्रीमियम पर ‘कंट्रीब्यूटरी पब्लिक हेल्थ इंश्योरेंस’ का विकल्प तैयार किया जाना चाहिए।
स्वास्थ्य सेवा किसी भी सभ्य समाज में केवल एक व्यावसायिक वस्तु (Commodity) नहीं हो सकती। जब तक सरकारें, न्यायपालिका और निजी अस्पताल मिलकर एक पारदर्शी, जवाबदेह और नैतिक मूल्य निर्धारण तंत्र तैयार नहीं करते, तब तक ‘राइट टू हेल्थ’ का संवैधानिक सपना करोड़ों भारतीय नागरिकों के लिए अधूरा ही बना रहेगा।
girls globe