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धनतेरस पर धन्वंतरि पूजा और बर्तन खरीदने की परंपरा का रहस्य

हिंदू धर्म में पांच दिवसीय दीपोत्सव पर्व की शुरुआत कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि यानी ‘धनतेरस’ (धन्वंतरि जयंती) से होती है। इस पावन अवसर पर देश भर के बाजारों में अद्भुत रौनक देखने को मिलती है और लोग सोने-चांदी के आभूषणों के साथ-साथ विशेष रूप से नए बर्तन और धातु की वस्तुएं खरीदकर अपने घर लाते हैं। अमूमन लोग धनतेरस को केवल धन-संपदा, सोने-चांदी और मां लक्ष्मी-कुबेर देव की पूजा से जोड़कर देखते हैं, लेकिन सनातन परंपरा में इस पर्व का मूल आधार आरोग्य के देवता ‘भगवान धन्वंतरि’ के प्राकट्य और मानव स्वास्थ्य की रक्षा से जुड़ा हुआ है। आइए विस्तार से समझते हैं कि समुद्र मंथन की पौराणिक कथा के अनुसार धनतेरस का धार्मिक महत्व क्या है और इस दिन धातु के बर्तन खरीदने की परंपरा कैसे अस्तित्व में आई।

#1. समुद्र मंथन की कथा और आरोग्य के देवता भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य

श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण के अनुसार, सतयुग में जब देवों और दानवों के बीच समुद्र मंथन (Samudra Manthan) हुआ, तो उसमें से चौदह दिव्य रत्न निकले थे। इसी मंथन के दौरान कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी तिथि के दिन भगवान विष्णु के अंशावतार माने जाने वाले भगवान धन्वंतरि अपने चार हाथों में जड़ी-बूटियां, आयुर्वेद शास्त्र और अमृत से भरा कलश लेकर प्रकट हुए थे। भगवान धन्वंतरि को देवताओं का वैद्य (चिकित्सक) और संपूर्ण आयुर्वेद विज्ञान का जनक माना जाता है। चूंकि वे हाथों में ‘अमृत कलश’ लेकर प्रकट हुए थे, इसीलिए उनके प्राकट्य दिवस को ‘धनत्रयोदशी’ या ‘धनतेरस’ के रूप में मनाया जाने लगा। इस दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा-अर्चना करने का मुख्य उद्देश्य धन-दौलत के साथ-साथ निरोगी काया, लंबी उम्र और स्वस्थ जीवन का आशीर्वाद प्राप्त करना है।

#1. धनतेरस पर क्यों खरीदे जाते हैं बर्तन? जानिए ‘कलश’ और पीतल-तांबे का महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, धनतेरस पर बर्तन खरीदने की परंपरा सीधे तौर पर भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य दृश्य से जुड़ी हुई है। जब भगवान धन्वंतरि समुद्र मंथन से प्रकट हुए थे, तो उनके हाथों में पीतल का एक विशाल कलश (अमृत कलश) था। यही कारण है कि इस दिन पीतल, तांबे और चांदी के बर्तन या कलश खरीदकर घर लाना अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना जाता है। माना जाता है कि धनतेरस पर खरीदे गए बर्तन घर में सुख-समृद्धि, खुशहाली और आरोग्य लेकर आते हैं। धातु विज्ञान और शास्त्र परंपरा के अनुसार, पीतल और तांबे में जल व भोजन रखने से स्वास्थ्य उत्तम रहता है, जिससे यह परंपरा केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी प्रासंगिक साबित होती है।

#1. धनतेरस पर खाली बर्तन घर लाना क्यों माना जाता है अशुभ? जानिए क्या भर कर लाएं

शास्त्रीय विधान और लोक मान्यताओं के अनुसार, धनतेरस के दिन बाजार से खरीदे गए नए बर्तन को कभी भी खाली घर नहीं लाना चाहिए। खाली बर्तन को शून्यता, अभाव या दरिद्रता का प्रतीक माना जाता है। इसलिए घर में प्रवेश करने से पहले नए बर्तन में कोई शुभ वस्तु—जैसे शुद्ध जल, चावल (अक्षत), गेहूं, बताशे, खील या साबुत धनिया—भर लेना चाहिए। मान्यता है कि नए बर्तन में अन्न या जल भरकर घर लाने से परिवार में पूरे वर्ष अन्नपूर्णा और मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है तथा धन-धान्य की कभी कोई कमी नहीं होती।

#1. मां लक्ष्मी, भगवान कुबेर और यमदीप दान की त्रिवेणी पूजा का महत्व

धनतेरस का दिन केवल भगवान धन्वंतरि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह त्रि-देविय और यम पूजन की पावन त्रिवेणी है। इस दिन आरोग्य के लिए भगवान धन्वंतरि, धन व समृद्धि के लिए धन की देवी मां लक्ष्मी और धन के कोषाध्यक्ष भगवान कुबेर की संयुक्त पूजा की जाती है। इसके साथ ही, धनतेरस की शाम को घर के मुख्य द्वार पर यमराज के नाम का चार मुख वाला दीपक (यमदीप दान) प्रज्वलित करने का विधान है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यमराज के निमित्त दीपदान करने से परिवार के सदस्यों को अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है और घर की नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है।