
दोस्ती, रिश्तेदारी या सामाजिक शिष्टाचार के दबाव में आकर अक्सर लोग बिना सोचे-समझे किसी जानने वाले के लोन दस्तावेजों पर ‘गारंटर’ (Loan Guarantor) के तौर पर हस्ताक्षर कर देते हैं। ज्यादातर लोगों को यह गलतफहमी होती है कि गारंटर बनना केवल एक औपचारिकता है, जिसमें वे बैंक को यह भरोसा दिला रहे हैं कि वे उस व्यक्ति को जानते हैं। बैंकिंग नियम और भारतीय कानून की हकीकत इससे बिल्कुल उलट और बेहद कठोर है। जब आप किसी के लोन एग्रीमेंट पर गारंटर के रूप में दस्तखत करते हैं, तो आप केवल एक गवाह नहीं बनते, बल्कि उस पूरे कर्ज की वित्तीय और कानूनी जिम्मेदारी अपने सिर ले लेते हैं। यदि आपका दोस्त किसी भी कारण से ईएमआई (EMI) चुकाने में विफल रहता है, तो बैंक की पहली गाज आपके सिबिल स्कोर, आपकी बचत और आपकी निजी संपत्तियों पर गिरती है।
कानूनी रूप से सिर्फ ‘गवाह’ नहीं, बल्कि ‘सह-कर्जदार’ होते हैं आप
भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 (Indian Contract Act, 1872) की धारा 128 के अनुसार, गारंटर की देनदारी मुख्य कर्जदार (Principal Borrower) के बिल्कुल ‘सह-विस्तृत’ (Co-extensive) होती है। इसका सीधा कानूनी अर्थ यह है कि जिस क्षण मूल कर्जदार अपनी ईएमआई देने में चूक करता है, उसी क्षण से बैंक उस पूरे कर्ज की वसूली के लिए गारंटर को कानूनी रूप से उतना ही जिम्मेदार मान लेता है जितना कि लोन लेने वाले को।
बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) को यह पूरा अधिकार होता है कि वे मुख्य कर्जदार के खिलाफ कोई लंबी कानूनी प्रक्रिया शुरू किए बिना भी सीधे गारंटर से पूरे बकाया पैसे की मांग कर सकते हैं। लोन के कागजों पर हस्ताक्षर करते ही आप बैंक को यह कानूनी वचन दे चुके होते हैं कि अगर कर्जदार ने पैसा नहीं लौटाया, तो आप पाई-पाई चुकाएंगे।
CIBIL स्कोर और क्रेडिट प्रोफाइल पर सीधा और जानलेवा हमला
लोन गारंटर बनने का सबसे पहला और तत्काल नुकसान आपके क्रेडिट स्कोर (CIBIL Score) को होता है। क्रेडिट इंफॉर्मेशन ब्यूरो (जैसे TransUnion CIBIL, Experian, Equifax, CRIF High Mark) के सिस्टम में आपके द्वारा गारंटी दिया गया लोन आपकी खुद की क्रेडिट रिपोर्ट के साथ सीधे जुड़ जाता है।
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ईएमआई बाउंस होने पर सिबिल में गिरावट: यदि आपका दोस्त किसी महीने की ईएमआई 30 दिन या 90 दिन तक नहीं चुकाता है, तो बैंक उस डिफॉल्ट की रिपोर्ट क्रेडिट ब्यूरो को भेजता है। इसके चलते मुख्य कर्जदार के साथ-साथ आपके सिबिल स्कोर में भी 50 से 100 अंकों की भारी गिरावट दर्ज हो जाती है, भले ही आपने अपने बाकी सभी पर्सनल लोन या क्रेडिट कार्ड बिल समय पर भरे हों।
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‘डिफॉल्टर’ या ‘राइट-ऑफ’ का धब्बा: यदि वह लोन लंबे समय तक नहीं चुकाया जाता और नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) बन जाता है, तो आपकी क्रेडिट रिपोर्ट पर ‘Settled’, ‘Written Off’ या ‘Default’ का स्थायी टैग लग जाता है, जो अगले 7 वर्षों तक आपकी साख को खराब बनाए रखता है।
आपकी खुद की लोन पात्रता (Borrowing Capacity) हो जाती है ब्लॉक
जब भी आप भविष्य में अपने लिए होम लोन, कार लोन, बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए एजुकेशन लोन या किसी मेडिकल इमरजेंसी के लिए पर्सनल लोन लेने बैंक जाएंगे, तो बैंक आपका ‘फिक्स्ड ऑब्लिगेशन टू इनकम रेशियो’ (FOIR) जांचेगा।
बैंक आपके द्वारा गारंटी दिए गए लोन के कुल बकाया अमाउंट को आपकी ‘संभावित देनदारी’ (Contingent Liability) मानते हैं। मान लीजिए आपकी मासिक आय ₹1 लाख है और आपने अपने दोस्त के ₹30 लाख के होम लोन की गारंटी दी है, तो बैंक यह मानेगा कि आप पर पहले से ही एक बड़ा वित्तीय बोझ है। इसके परिणामस्वरूप, बैंक या तो आपके खुद के लोन आवेदन को सीधे खारिज कर देगा, या फिर आपको मिलने वाले लोन की स्वीकृत राशि में भारी कटौती कर देगा और उस पर ऊंची ब्याज दरें लागू करेगा।
रिकवरी एजेंटों की कॉल, लीगल नोटिस और संपत्ति की जब्ती का खतरा
जब कोई लोन एनपीए घोषित हो जाता है, तो बैंक केवल फोन कॉल तक सीमित नहीं रहते। वसूली की पूरी आक्रामक मशीनरी सक्रिय हो जाती है:
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रिकवरी एजेंटों का मानसिक दबाव: बैंक और उसकी अधिकृत रिकवरी एजेंसियां गारंटर के घर और दफ्तर के पते पर तकादा करना शुरू कर देती हैं, जिससे सामाजिक प्रतिष्ठा को गहरा धक्का लगता है।
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सरफेसी एक्ट और कानूनी मुकदमे: सिक्योर्ड लोन (जैसे होम लोन या मॉर्गेज लोन) के मामले में बैंक ‘सरफेसी एक्ट’ (SARFAESI Act, 2002) के तहत बिना अदालत जाए संपत्ति कुर्क करने की प्रक्रिया शुरू कर सकता है। अनसिक्योर्ड पर्सनल या बिजनेस लोन के मामलों में बैंक ‘ऋण वसूली न्यायाधिकरण’ (DRT) या सिविल कोर्ट में गारंटर के खिलाफ मुकदमा दायर कर सकता है।
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बैंक खातों और सैलरी अटैचमेंट का जोखिम: अदालत के आदेश के बाद बैंक गारंटर के बचत खातों को फ्रीज कर सकता है और गारंटर की नौकरी की सैलरी से मासिक कटौती (Salary Attachment) करवा सकता है। यदि गारंटर की कोई अचल संपत्ति है, तो कर्ज की भरपाई के लिए उसे नीलाम करने की नौबत भी आ सकती है।
अगर मजबूरी में बनना ही पड़े गारंटर, तो इन 5 सावधानियों का रखें ध्यान
यदि परिवार के किसी बेहद करीबी सदस्य (जैसे सगे भाई-बहन या जीवनसाथी) के लिए गारंटर बनना अपरिहार्य हो, तो आंख मूंदकर कागजों पर हस्ताक्षर करने के बजाय इन सख्त नियमों का पालन करें:
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कर्जदार की वित्तीय क्षमता की निष्पक्ष जांच: केवल भावनात्मक बातों में न आएं। यह देखें कि लोन लेने वाले के पास आय का स्थिर स्रोत क्या है, उसका खुद का पुराना सिबिल रिकॉर्ड कैसा है और क्या वह हर महीने समय पर ईएमआई चुकाने में सक्षम है।
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लोन प्रोटेक्शन / टर्म इंश्योरेंस अनिवार्य कराएं: मुख्य कर्जदार से कहें कि वह लोन राशि के बराबर का एक ‘लोन टर्म इंश्योरेंस’ (Loan Cover Policy) जरूर ले। इससे दुर्भाग्यवश कर्जदार की मृत्यु या गंभीर दुर्घटना की स्थिति में बीमा कंपनी बैंक का पूरा कर्ज चुका देती है और गारंटर पर कोई वित्तीय बोझ नहीं आता।
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त्रैमासिक स्टेटमेंट की मांग: कर्जदार से हर तीन महीने में बैंक का ‘लोन रीपेमेंट स्टेटमेंट’ मांगें ताकि आपको यह जानकारी रहे कि ईएमआई समय पर कट रही है या कोई बकाया बाकी है।
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लिमिटेड गारंटी एग्रीमेंट: जहां तक संभव हो, बैंक से ‘अनलिमिटेड कंटिन्यूइंग गारंटी’ के बजाय ‘लिमिटेड गारंटी’ (Limited Liability Guarantee) की मांग करें, जिसमें आपकी कानूनी जिम्मेदारी केवल एक निश्चित राशि या सीमित अवधि तक ही तय हो।
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लोन गारंटर रिप्लेसमेंट का प्रावधान: यदि भविष्य में आपकी वित्तीय स्थिति बदलती है या आप खुद बड़ा लोन लेना चाहते हैं, तो बैंक से बातचीत करके मुख्य कर्जदार की तरफ से कोई दूसरा को-ऐप्लिकेंट या दूसरा गारंटर जमा करवाकर खुद को उस गारंटी से बाहर (Release) करवाने की प्रक्रिया शुरू करें।
गारंटर बनने से विनम्रतापूर्वक कैसे करें इनकार?
दोस्ती या रिश्तेदारी में किसी को ‘ना’ कहना असहज हो सकता है, लेकिन भविष्य की वित्तीय बर्बादी और कानूनी मुकदमों से बचने के लिए एक पल की हिचकिचाहट को तोड़ना बेहद जरूरी है। आप सामने वाले को स्पष्ट और तार्किक रूप से समझा सकते हैं कि आप खुद निकट भविष्य में एक बड़ा होम लोन या बिजनेस लोन लेने की प्रक्रिया में हैं और आपके सीए/वित्तीय सलाहकार ने सख्त निर्देश दिए हैं कि किसी अन्य लोन में गारंटर बनने से आपकी खुद की लोन फाइल निरस्त हो जाएगी।
वित्तीय समझदारी का सबसे बुनियादी नियम यही है कि कभी भी किसी ऐसे कर्ज की जिम्मेदारी अपने सिर न लें जिसका पैसा आपने खुद इस्तेमाल नहीं किया है। समझदारी और सतर्कता ही आपकी गाढ़ी कमाई और क्रेडिट स्कोर की असली सुरक्षा है।
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