देश के 4,133 स्कूलों में एक भी छात्र नहीं, इसके बावजूद तैनात हैं 19,000 से ज्यादा शिक्षक; सिस्टम की बड़ी पोल खुली

भारतीय शिक्षा व्यवस्था और सरकारी प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली को लेकर एक ऐसी चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है, जिसने देश भर के नीति निर्धारकों और आम नागरिकों को हैरान कर दिया है। शिक्षा मंत्रालय और सरकारी आंकड़ों पर आधारित एक हालिया रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि देश भर के विभिन्न राज्यों में 4,133 स्कूल ऐसे संचालित हो रहे हैं जहां एक भी छात्र नामांकित नहीं है, यानी वहां छात्रों का नामांकन शून्य है। इसके बावजूद इन ताले लटके या वीरान पड़े स्कूलों में कागजों पर 19,000 से अधिक शिक्षकों और प्रशासनिक कर्मचारियों की तैनाती दिखाई गई है और उन्हें नियमित रूप से सरकारी खजाने से वेतन का भुगतान भी किया जा रहा है। करदाताओं के गाढ़े पसीने की कमाई का इस तरह से हो रहा दुरुपयोग और सरकारी मशीनरी की यह भारी लापरवाही यह सवाल खड़ा करती है कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर संसाधनों की बर्बादी कैसे और क्यों हो रही है। इस सनसनीखेज रिपोर्ट के सामने आने के बाद से शिक्षा जगत और राजनीतिक गलियारों में भूचाल आ गया है, और लोग प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं।

शून्य नामांकन वाले स्कूलों का कड़वा सच और प्रशासनिक लापरवाही

देश के दूरदराज ग्रामीण इलाकों और कई शहरी क्षेत्रों में भी ऐसे सरकारी स्कूलों की लंबी सूची सामने आई है जहां छात्रों के शून्य नामांकन के बावजूद पढ़ाई का ढोंग जारी है। जब कभी देश में शिक्षा की गुणवत्ता और बजट के सही इस्तेमाल की समीक्षा की जाती है, तो जमीनी स्तर की ये तस्वीरें पोल खोल देती हैं। एक तरफ जहां देश के कई इलाकों में बच्चों के बैठने के लिए ढंग की बेंच और कक्षाओं की कमी है, वहीं दूसरी तरफ हजारों ऐसे संस्थान हैं जहां शिक्षक बिना एक भी छात्र को पढ़ाए अपनी नौकरी के दिन काट रहे हैं। स्थानीय स्तर पर शिक्षा विभाग के अधिकारियों की उदासीनता और मॉनिटरिंग की कमी के कारण यह स्थिति वर्षों से बनी हुई है। इन स्कूलों में न तो ब्लैकबोर्ड पर कुछ लिखा जाता है और न ही मैदान में बच्चों की किलकारी सुनाई देती है, फिर भी हाजिरी रजिस्टरों में शिक्षकों की मौजूदगी दर्ज होती रहती है।

सरकारी खजाने से वेतन का भुगतान और संसाधनों की बर्बादी

इन 4,133 शून्य छात्र वाले स्कूलों में तैनात 19,000 से ज्यादा शिक्षकों पर हर महीने करोड़ों रुपये का सरकारी वेतन खर्च किया जा रहा है। भारत जैसे विकासशील देश में जहां शिक्षा के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए धन की कमी हमेशा रोड़ा बनती है, वहां इस तरह से टैक्स के पैसों का पानी की तरह बहना बेहद चिंताजनक है। यदि इन अतिरिक्त और सरप्लस शिक्षकों को उन स्कूलों में ट्रांसफर कर दिया जाए जहां एक-एक शिक्षक के भरोसे सैकड़ों बच्चे पढ़ रहे हैं, तो शिक्षा की तस्वीर काफी हद तक सुधर सकती है। लेकिन लचर प्रशासनिक इच्छाशक्ति और विभागों के बीच आपसी तालमेल की कमी के कारण यह विसंगति लगातार बनी हुई है। बिना छात्रों के चल रहे इन विद्यालयों के रखरखाव, मिड-डे मील और अन्य प्रशासनिक खर्चों पर भी अनावश्यक बजट बर्बाद हो रहा है, जिसकी जिम्मेदारी तय होना अब बेहद जरूरी हो गया है।

शिक्षकों की भारी कमी वाले स्कूलों से है गहरा विरोधाभास

इस पूरी रिपोर्ट का सबसे बड़ा और चिंताजनक पहलू यह है कि एक तरफ जहां हजारों शिक्षक बिना छात्रों के स्कूलों में खाली बैठे हैं, वहीं दूसरी तरफ देश के हजारों सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की इतनी भारी कमी है कि एक ही शिक्षक पांचों कक्षाओं को एक साथ पढ़ाने के लिए मजबूर है। आदिवासी और ग्रामीण अंचल के कई प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक न होने के कारण पढ़ाई ठप पड़ी है और बच्चों का भविष्य अधर में लटका हुआ है। सरकारें लगातार यह दावा करती हैं कि वे शिक्षा के स्तर को ऊपर उठाने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि संसाधनों का सही और न्यायसंगत वितरण (Rationalization of Teachers) न होने के कारण यह विसंगति पैदा हो रही है। जब तक सरप्लस शिक्षकों का सही समायोजन नहीं किया जाएगा, तब तक शिक्षा व्यवस्था की यह बीमारी दूर नहीं हो सकती।

भविष्य की चुनौतियां और नीतिगत सुधार की सख्त जरूरत

शिक्षा विशेषज्ञों और विचारकों का मानना है कि इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद अब केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर एक ठोस नीति बनानी चाहिए। सबसे पहले उन सभी स्कूलों की भौतिक और वास्तविक स्थिति की स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए जहां छात्रों की संख्या शून्य या नगण्य है। जिन स्कूलों में बच्चों के आने की कोई संभावना नहीं बची है, उन्हें या तो बंद कर देना चाहिए या फिर आसपास के दूसरे स्कूलों के साथ मर्ज (Merge) कर देना चाहिए। इसके साथ ही वहां तैनात शिक्षकों को तुरंत उन स्कूलों में भेजा जाना चाहिए जहां शिक्षकों की सख्त जरूरत है। इस तरह के कठोर और पारदर्शी प्रशासनिक सुधारों के बिना देश की सरकारी शिक्षा प्रणाली को पटरी पर लाना असंभव होगा, और यह समय की मांग है कि सरकार इस दिशा में तुरंत सख्त कदम उठाए।