दुनिया भर में मंदी की आहट, पर भारत की जमीनों पर बरसे 5.9 अरब डॉलर; जानें क्यों प्रॉपर्टी में टूट पड़े निवेशक

वैश्विक अर्थव्यवस्था में भू-राजनीतिक तनाव, ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव और पश्चिमी देशों के प्रॉपर्टी बाजारों में छाई सुस्ती के बीच भारतीय रियल एस्टेट बाजार ने दुनिया भर के बड़े फंड हाउसों और देशी निवेशकों को हैरान कर दिया है। जहां अमेरिका और यूरोपीय देशों में मंदी की आहट से निवेशक अपनी पूंजी बचाने में लगे हैं, वहीं भारत की अचल संपत्ति पर भरोसा इस कदर बढ़ा है कि चालू वर्ष 2026 के शुरुआती नौ महीनों (जनवरी से सितंबर) में ही संस्थागत निवेशकों ने रिकॉर्ड 5.9 अरब डॉलर (करीब 50 हजार करोड़ रुपये) झोंक दिए हैं। यह पूंजी प्रवाह पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 39 फीसदी की भारी छलांग दर्शाता है। रियल एस्टेट कंसल्टेंसी फर्म कोलियर्स की ताजा रिपोर्ट से यह साफ हो गया है कि दुनिया भर में जारी अनिश्चितता के दौर में भी भारत एक सुरक्षित, टिकाऊ और आकर्षक निवेश डेस्टिनेशन के रूप में उभरा है। इस पूरे निवेश चक्र में सबसे दिलचस्प और निर्णायक मोड़ यह रहा है कि इस बार विदेशी फंड्स के मुकाबले भारतीय घरेलू संस्थागत निवेशकों ने बाजार की कमान अपने हाथों में ले ली है, जिससे देश के प्रॉपर्टी सेक्टर को अभूतपूर्व तरलता और मजबूती मिली है।

वैश्विक स्तर पर जब भी वित्तीय उथल-पुथल मचती है, तो अंतरराष्ट्रीय निवेशक ऐसे बाजारों की तलाश करते हैं जहां घरेलू उपभोग मजबूत हो, नीतिगत स्थिरता हो और बुनियादी ढांचे पर बड़े पैमाने पर काम चल रहा हो। भारत की मजबूत जीडीपी ग्रोथ, केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा इंफ्रास्ट्रक्चर पर रिकॉर्ड पूंजीगत खर्च और रेरा (RERA) जैसे कड़े नियामकीय सुधारों ने विदेशी और देशी दोनों तरह के निवेशकों को आश्वस्त किया है। इस 5.9 अरब डॉलर के कुल निवेश में घरेलू निवेशकों का दबदबा देखते ही बनता है, जिन्होंने अकेले 3.5 अरब डॉलर यानी कुल निवेश का लगभग 60 फीसदी हिस्सा सीधे बाजार में लगाया है। घरेलू संस्थागत पूंजी में सालाना आधार पर 59 फीसदी की ऐतिहासिक वृद्धि दर्ज की गई है, जो यह साबित करती है कि भारतीय फैमिली ऑफिस, घरेलू प्राइवेट इक्विटी फंड, पेंशन फंड और बैंक अब अपनी ही सरजमीं के विकास पर बड़ा दांव खेल रहे हैं। वहीं, वैश्विक चिंताओं के बावजूद विदेशी निवेशकों ने भी भारत से मुंह नहीं मोड़ा और उनका निवेश भी सालाना आधार पर 17 फीसदी बढ़कर 2.4 अरब डॉलर पर पहुंच गया। विदेशी फंड्स का मुख्य रुझान लॉन्ग-टर्म वैल्यू क्रिएशन वाली परियोजनाओं और विकासशील संपत्तियों की तरफ रहा, जो भारत के प्रति उनके अटूट भरोसे को दर्शाता है।

निवेशकों की प्राथमिकताओं का बारीकी से विश्लेषण करें तो देश का कमर्शियल ऑफिस स्पेस सेगमेंट अब भी सबसे पसंदीदा ठिकाना बना हुआ है। नौ महीनों के दौरान कुल निवेश का 37 फीसदी यानी लगभग 2.2 अरब डॉलर अकेले ऑफिस एसेट्स में गया है, जो पिछले साल के मुकाबले 46 फीसदी अधिक है। ऑफिस स्पेस में आए कुल निवेश में 90 फीसदी से अधिक योगदान घरेलू निवेशकों का रहा है। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत तेजी से दुनिया का ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) हब बन चुका है, जहां बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने तकनीकी व रणनीतिक ऑपरेशंस के लिए ग्रेड-ए ऑफिस स्पेस धड़ल्ले से लीज पर ले रही हैं। ऑफिस स्पेस के बाद मिक्स्ड-यूज प्रोजेक्ट्स (मिश्रित उपयोग परियोजनाएं) और अल्टरनेटिव एसेट्स (डेटा सेंटर, वेयरहाउसिंग और लॉजिस्टिक्स) ने निवेशकों को सबसे ज्यादा आकर्षित किया, जिनकी कुल हिस्सेदारी 16 से 17 फीसदी के बीच रही। इस साल का सबसे चौंकाने वाला ट्रेंड हॉस्पिटैलिटी (होटल एवं रिजॉर्ट) और अल्टरनेटिव रियल एस्टेट में देखने को मिला, जहां निवेश में पिछले साल के मुकाबले 6 से 7 गुना का भारी उछाल आया है। घरेलू पर्यटन में रिकॉर्ड तेजी, धार्मिक व बिजनेस यात्राओं में बढ़ोतरी और टेक क्रांति के चलते डेटा सेंटरों की बढ़ती मांग ने इन क्षेत्रों में पूंजी की बाढ़ ला दी है।

अगर भौगोलिक और क्षेत्रीय दृष्टिकोण से देखें, तो भारत के टियर-1 और तेजी से उभरते टियर-2 शहर निवेश का मुख्य केंद्र बनकर उभरे हैं। देश की कुल संस्थागत पूंजी का लगभग एक-तिहाई हिस्सा तीन प्रमुख महानगरों—बेंगलुरु, चेन्नई और दिल्ली-एनसीआर ने अपनी झोली में डाला है। बेंगलुरु जहां अपने आईटी और टेक ऑफिस स्पेस के चलते विदेशी पूंजी का गढ़ बना हुआ है, वहीं दिल्ली-एनसीआर के गुरुग्राम, नोएडा और फरीदाबाद एक्सप्रेसवे कॉरिडोर पर कमर्शियल व प्रीमियम रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट्स में जमकर डील्स हुई हैं। इसके साथ ही, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ, महाराष्ट्र का पुणे और गुजरात का अहमदाबाद जैसे उभरते हुए शहर भी अब संस्थागत निवेशकों के रडार पर आ चुके हैं। लखनऊ के सुल्तानपुर रोड, शहीद पथ, गोमती नगर विस्तार और अयोध्या हाइवे कॉरिडोर पर कनेक्टिविटी सुधरने और आउटर रिंग रोड के विस्तार से लॉजिस्टिक्स और बड़े इंटीग्रेटेड टाउनशिप प्रोजेक्ट्स में निजी इक्विटी निवेश की रफ्तार तेज हुई है। निवेशकों का मानना है कि बड़े महानगरों में जमीन की कीमतें सैचुरेशन पर पहुंचने के बाद अब हाई-ग्रोथ वाले सेमी-मेट्रो शहर अगले 5 से 10 वर्षों में सबसे बेहतर रिटर्न देंगे।

आने वाले महीनों और साल 2027 की शुरुआत को लेकर उद्योग जगत का मिजाज बेहद आशावादी और आक्रामक नजर आ रहा है। तीसरी तिमाही में घरेलू निवेशकों ने 0.9 अरब डॉलर का निवेश करके यह संकेत दे दिया है कि बाजार में लिक्विडिटी की कोई कमी नहीं है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि त्योहारी सीजन की मजबूत शुरुआत और आगामी तिमाहियों में बड़े विदेशी पेंशन फंड्स की नई पाइपलाइन के चलते साल के अंत तक कुल रियल एस्टेट निवेश 8 से 9 अरब डॉलर के ऐतिहासिक स्तर को छू सकता है। आम होमबायर्स और छोटे निवेशकों के लिए यह स्थिति दोतरफा संकेत देती है। एक तरफ जहां बड़े फंड्स के आने से अटके हुए प्रोजेक्ट्स पूरे होंगे, ग्रेड-ए डेवलपर्स की वित्तीय स्थिति सुधरेगी और निर्माण की गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय स्तर की होगी, वहीं दूसरी तरफ प्राइम लोकेशंस पर जमीन और तैयार मकानों के दाम में 10 से 15 फीसदी तक की सालाना बढ़ोतरी तय मानी जा रही है। मजबूत संस्थागत निवेश का यह प्रवाह साफ कर रहा है कि भारत का रियल एस्टेट बाजार अब सिर्फ सट्टेबाजी या अनऑर्गनाइज्ड सौदों का अखाड़ा नहीं रहा, बल्कि यह एक पारदर्शी, मैच्योर और ग्लोबल एसेट क्लास बनकर दुनिया का नेतृत्व करने के लिए पूरी तरह तैयार है।