
वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों और व्यापारिक नीतियों के बदलते दौर में भारत एक बहुत बड़ी आर्थिक छलांग लगाने की दहलीज पर खड़ा है। ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड जैसी अग्रणी विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ व्यापक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) सफलतापूर्वक लागू करने के बाद, अब नई दिल्ली यूरोपीय संघ (EU) और कनाडा के साथ अपने सबसे महत्वाकांक्षी आर्थिक संधियों को औपचारिक रूप देने के बेहद करीब पहुंच चुकी है। वाणिज्यिक व राजनयिक गलियारों से छनकर आ रही जानकारियों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी दिसंबर 2026 में बेल्जियम और कनाडा के आधिकारिक दौरे पर जा रहे हैं। इसी ऐतिहासिक विदेश यात्रा के दौरान लंबे समय से लंबित इन दोनों अत्यंत महत्वपूर्ण बहुपक्षीय व द्विपक्षीय व्यापार संधियों पर अंतिम हस्ताक्षर किए जाने की प्रबल संभावना है। यह रणनीतिक कदम न केवल भारतीय विनिर्माण और सेवा क्षेत्र के लिए पश्चिमी बाजारों के दरवाजे पूरी तरह खोल देगा, बल्कि भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (ग्लोबल सप्लाई चेन) का एक अपरिहार्य केंद्र भी बनाएगा।
भारत और कनाडा के द्विपक्षीय संबंधों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान आए उतार-चढ़ाव के बाद अब कूटनीतिक और आर्थिक रिश्ते अभूतपूर्व गति से सामान्य और मजबूत हो रहे हैं। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने स्वयं सार्वजनिक रूप से यह घोषणा की है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिसंबर 2026 में कनाडा का आधिकारिक दौरा करेंगे। किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री का लगातार दूसरे वर्ष कनाडा का दौरा करना दोनों संप्रभु राष्ट्रों के बीच पुनर्जीवित हो रहे प्रगाढ़ आर्थिक व व्यापारिक विश्वास का जीवंत प्रमाण है। दोनों देशों के बीच वर्ष 2010 से 2017 तक समग्र आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) पर कई दौर की गहन बातचीत चली थी, लेकिन राजनीतिक गतिरोधों और प्राथमिकताओं में भिन्नता के कारण यह प्रक्रिया लगभग एक दशक तक ठंडे बस्ते में चली गई थी।
रिश्तों में आई नई गर्माहट के बाद इसी वर्ष 2 मार्च 2026 को कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की नई दिल्ली यात्रा के दौरान इस वार्ता के औपचारिक संदर्भ नियमों (टर्म्स ऑफ रेफरेंस) पर दोबारा हस्ताक्षर किए गए थे। इसके बाद से दोनों पक्षों के वार्ताकारों ने असाधारण तत्परता दिखाई है। महज सात महीनों के संक्षिप्त अंतराल में चार दौर की उच्चस्तरीय मैराथन वार्ताएं पूरी की जा चुकी हैं। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में संकेत दिया था कि आगामी तीन महीने भारत-कनाडा व्यापार संबंधों के लिए ऐतिहासिक रूप से निर्णायक सिद्ध होंगे। समझौते के शेष तकनीकी पहलुओं को अंतिम रूप देने के लिए अक्टूबर के पहले सप्ताह में कनाडा की धरती पर पांचवें दौर की वार्ता आयोजित की जा रही है, जो दिसंबर में शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर हस्ताक्षर का मार्ग प्रशस्त करेगी।
दूसरी तरफ, यूरोपीय संघ के साथ प्रस्तावित भारत का मुक्त व्यापार समझौता आधुनिक वैश्विक व्यापार के सबसे विशाल समझौतों में से एक बनने जा रहा है। ब्रुसेल्स से प्राप्त ताज़ा रणनीतिक इनपुट के अनुसार, यूरोपीय आयोग ने व्यापक विचार-विमर्श के बाद मसौदा समझौते को हस्ताक्षर और औपचारिक अनुमोदन के लिए यूरोपीय परिषद के समक्ष पेश कर दिया है। सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि यह रही कि यूरोपीय संघ के सभी 27 सदस्य देशों ने भारत के साथ इस ऐतिहासिक संधि को अपना सर्वसम्मत समर्थन प्रदान कर दिया है। बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डे वेवर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिसंबर 2026 में ब्रुसेल्स आने का औपचारिक राजकीय निमंत्रण भेजा है, जहां दोनों पक्षों के शीर्ष नेतृत्व की उपस्थिति में इस विशाल संधि पर दस्तखत किए जाएंगे।
भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार वार्ता का इतिहास काफी जटिल और उतार-चढ़ाव भरा रहा है। दोनों पक्षों ने सर्वप्रथम वर्ष 2007 में व्यापार और निवेश पर द्विपक्षीय वार्ता शुरू की थी, किंतु बाजार पहुंच, बौद्धिक संपदा अधिकार और कृषि सब्सिडी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर गंभीर मतभेदों के चलते वर्ष 2013 में बातचीत पूरी तरह टूट गई थी। लगभग एक दशक के ठहराव के बाद जुलाई 2022 में नए भू-आर्थिक परिप्रेक्ष्य में यह वार्ता दोबारा शुरू की गई। अंततः जनवरी 2026 में दोनों पक्षों ने सभी प्रमुख गतिरोधों को दूर करते हुए संधि की रूपरेखा तैयार करने की औपचारिक घोषणा की। अब संधि के सभी अध्यायों (चैप्टर्स) पर पूर्ण तकनीकी और कानूनी सहमति बन चुकी है। दिसंबर में होने वाले इस हस्ताक्षर के बाद यूरोपीय संसद की मंजूरी और भारत की आंतरिक वैधानिक प्रक्रियाएं पूरी की जाएंगी, जिससे यह महा-समझौता वर्ष 2027 की शुरुआत में पूर्ण रूप से लागू हो जाएगा।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा साझा किए गए आर्थिक आंकड़ों के अनुसार, भारत-ईयू एफटीए विश्व की कुल आबादी के करीब 200 करोड़ नागरिकों और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 25 प्रतिशत से अधिक का प्रतिनिधित्व करने वाले साझा बाजार का निर्माण करेगा। इस समझौते की सबसे क्रांतिकारी विशेषता यह है कि यूरोपीय संघ भारतीय वस्तुओं के लगभग 99 प्रतिशत कुल व्यापार मूल्य पर सीमा शुल्क को या तो पूरी तरह समाप्त (ज़ीरो ड्यूटी) कर देगा या अत्यंत न्यूनतम स्तर पर ला देगा।
भारत के श्रम प्रधान क्षेत्रों (लेबर-इंटेसिव सेक्टर्स) जैसे वस्त्र और परिधान (टेक्सटाइल व गारमेंट्स), चमड़ा और फुटवियर उद्योग, रत्न एवं आभूषण, प्रसंस्कृत समुद्री खाद्य उत्पाद (सी-फूड), फार्मास्युटिकल्स, ऑर्गेनिक रसायन और खिलौना निर्माण उद्योग को समझौते के प्रभावी होने के पहले ही दिन से शून्य या नगण्य शुल्क का सीधा लाभ मिलेगा। वर्तमान में इन भारतीय उत्पादों को यूरोपीय बाजारों में वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता था, जिन्हें वहां शुल्क-मुक्त तरजीह हासिल थी। इस ऐतिहासिक संधि के बाद भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त कई गुना बढ़ जाएगी, जिससे देश के विनिर्माण क्षेत्र में लाखों नए रोजगार सृजित होंगे।
द्विपक्षीय व्यापार के संतुलन को साधते हुए भारत ने भी यूरोपीय संघ के निर्यातकों के लिए अपने विशाल उपभोक्ता बाजार को चरणबद्ध तरीके से खोलने पर सहमति व्यक्त की है। समझौते के प्रावधानों के अंतर्गत भारत यूरोपीय संघ की लगभग 96 से 97 प्रतिशत औद्योगिक और तकनीकी वस्तुओं पर चरणबद्ध तरीके से शुल्क कटौती (टैरिफ रिडक्शन) लागू करेगा। यह कटौती एक तय समय-सीमा के भीतर धीरे-धीरे की जाएगी ताकि भारतीय घरेलू विनिर्माताओं और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) को किसी भी प्रकार के अचानक झटके या असमान प्रतिस्पर्धा से सुरक्षित रखा जा सके।
इस व्यवस्था से भारत को उच्च स्तरीय यूरोपीय विनिर्माण मशीनरी, अत्याधुनिक तकनीक, सटीक चिकित्सा उपकरण और हरित ऊर्जा समाधान किफायती दरों पर उपलब्ध होंगे, जो घरेलू स्तर पर ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को गति देने में मददगार साबित होंगे। रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यूरोपीय संघ और कनाडा के साथ यह दोहरा व्यापार समझौता भारत की वैश्विक व्यापार नीति को एक नई ऊंचाई पर स्थापित करेगा और देश को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के राष्ट्रीय लक्ष्य को तीव्र गति प्रदान करेगा।
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