
भागदौड़ भरी जिंदगी, तनाव और रात की अधूरी नींद के बाद दोपहर में एक छोटी सी झपकी (पावर नैप) लेना अमूमन हर किसी को तरोताजा कर देता है। चिकित्सा विज्ञान भी मानता है कि दिन के समय कुछ मिनटों की नींद कार्यक्षमता और मानसिक फोकस को बढ़ाने में बेहद मददगार साबित होती है। हालांकि, अगर आपको हर दिन 30 मिनट से अधिक लंबी झपकी लेने की तीव्र इच्छा होती है या रात में 7-8 घंटे की भरपूर नींद पूरी करने के बाद भी दिनभर शरीर में भारी थकान और सुस्ती बनी रहती है, तो इसे बिल्कुल भी हल्के में न लें। मेदांता अस्पताल, नोएडा में रेस्पिरेटरी और स्लीप मेडिसिन विभाग के डायरेक्टर डॉ. मृणाल सिरकार के अनुसार, दिन में बार-बार आने वाली यह अत्यधिक नींद आपकी बॉडी के भीतर पनप रहे किसी बड़े मेडिकल क्राइसिस का शुरुआती अलार्म हो सकती है।
कितनी देर की झपकी है सेहत के लिए वरदान? एक्सपर्ट से समझिए सही टाइमिंग
स्लीप मेडिसिन स्पेशलिस्ट डॉ. मृणाल सिरकार के मुताबिक, मानव शरीर और मस्तिष्क को रीचार्ज करने के लिए केवल 10 से 30 मिनट की छोटी झपकी ही सबसे आदर्श और वैज्ञानिक रूप से हेल्दी मानी जाती है। इस समयावधि की झपकी आपके नर्वस सिस्टम को शांत करती है, रचनात्मकता को बढ़ाती है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह आपके रात के प्राकृतिक स्लीप साइकिल (नींद के चक्र) में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं करती है। लेकिन जैसे ही यह झपकी घंटों लंबी होने लगती है, यह फायदे के बजाय शरीर को सुस्त बनाने लगती है और स्वास्थ्य से जुड़े कई गंभीर खतरों को न्योता देती है।
बुजुर्गों के लिए मूक चेतावनी: लंबी और असमय झपकी बढ़ा सकती है मृत्यु का जोखिम
हालिया वैश्विक वैज्ञानिक शोधों और केस स्टडीज का हवाला देते हुए डॉ. सिरकार ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि विशेष रूप से वृद्ध वयस्कों (बुजुर्गों) में दिन के समय बार-बार, बेवक्त और बहुत लंबी झपकियां लेने की आदत सीधे तौर पर उनके गिरते स्वास्थ्य से जुड़ी होती है। यह प्रवृत्ति न केवल उनकी शारीरिक सक्रियता को कम करती है, बल्कि आंतरिक अंगों के सुचारू रूप से काम न करने के कारण असमय मृत्यु के जोखिम को भी काफी हद तक बढ़ा देती है। चिकित्सा विज्ञान में दिन में आने वाली अत्यधिक नींद को एक स्वतंत्र समस्या नहीं, बल्कि शरीर के भीतर छुपे किसी隐 (मूक) रोग का एक प्रमुख लक्षण माना जाता है।
इन 5 गंभीर बीमारियों के कारण दिन में बार-बार टूटती है इंसानी आंख
यदि आपका शरीर दिन में बार-बार बिस्तर की ओर भाग रहा है, तो इसके पीछे निम्नलिखित न्यूरोलॉजिकल और क्रोनिक बीमारियां जिम्मेदार हो सकती हैं:
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ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया (OSA): इस गंभीर बीमारी में सोते समय मरीज की सांस की नली में बार-बार आंशिक या पूर्ण रुकावट आती है, जिससे रक्त में ऑक्सीजन का स्तर गिर जाता है और रात में बार-बार नींद टूटती है। नतीजतन, मरीज रातभर बिस्तर पर बिताने के बाद भी सुबह बेहद थका हुआ उठता है।
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क्रोनिक इंसोम्निया (अल्सर/अनिद्रा): देर रात तक नींद न आना, बार-बार आंख खुल जाना या सुबह बहुत जल्दी जाग जाने की समस्या के कारण शरीर का हीलिंग प्रोसेस रुक जाता है, जिससे दिन में भयंकर सुस्ती छाई रहती है।
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रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम (RLS): यह एक जटिल न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है जिसमें शाम या रात के समय पैरों में अजीब सी बेचैनी, झनझनाहट और उन्हें लगातार हिलाने की तीव्र इच्छा होती है, जो गहरी नींद (डीप स्लीप) को पूरी तरह बाधित कर देती है।
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मेटाबॉलिक और क्रोनिक बीमारियां: शरीर में हार्मोनल असंतुलन जैसे हाइपोथायरायडिज्म, अनियंत्रित डायबिटीज (मधुमेह), दिल की कमजोरी (कार्डियक डिजीज) और शरीर में लंबे समय से बना हुआ कोई गुप्त इन्फेक्शन भी दिन की थकान का मुख्य कारण होते हैं।
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मानसिक स्वास्थ्य विकार: अत्यधिक डिप्रेशन (अवसाद) और लंबे समय से चला आ रहा क्रोनिक स्ट्रेस भी मस्तिष्क की ऊर्जा को पूरी तरह सोख लेता है, जिससे व्यक्ति दिनभर केवल सोते रहना चाहता है।
स्लीप स्पेशलिस्ट की फाइनल सलाह: कब तुरंत क्लीनिकल डायग्नोसिस की है जरूरत?
डॉ. मृणाल सिरकार के अनुसार, यदि आपकी दोपहर की झपकियां इतनी लंबी और अनियंत्रित हो चुकी हैं कि वे आपके दैनिक काम-काज, ऑफिस की प्रोडक्टिविटी या सामाजिक जीवन को प्रभावित करने लगी हैं, तो यह घरेलू नुस्खे अपनाने का नहीं बल्कि तुरंत एक प्रमाणित स्लीप मेडिसिन स्पेशलिस्ट से मिलकर ‘स्लीप स्टडी’ कराने का समय है। इस समस्या की सही जड़ (रूट कॉज) की पहचान करके और समय पर उचित उपचार प्राप्त करके आप न केवल अपनी स्लीप क्वालिटी को सुधार सकते हैं, बल्कि भविष्य में होने वाले कार्डियक अरेस्ट और ऑर्गन फेलियर जैसी जानलेवा जटिलताओं से भी अपनी पूरी सेहत को सुरक्षित रख सकते हैं।
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