
सिनेमाघरों और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर जब भी कोई ऐसी फिल्म आती है जो समाज के गंभीर मुद्दों, न्याय व्यवस्था और कानून की पेचीदगियों को छूती है, तो दर्शकों की उम्मीदें बहुत बढ़ जाती हैं। ऐसी ही एक बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘दायरा’ हाल ही में रिलीज हुई है, जिसमें बॉलीवुड की जानी-मानी अभिनेत्री करीना कपूर खान और दक्षिण भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता पृथ्वीराज सुकुमारन ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं। फिल्म की स्टार कास्ट और उनके अभिनय को लेकर पहले से ही काफी चर्चा थी, क्योंकि दोनों ही कलाकारों को स्क्रीन पर एक साथ देखना अपने आप में एक बड़ा अनुभव माना जा रहा था। हालांकि, जब बात फिल्म की पटकथा और समग्र प्रभाव की आती है, तो यह उम्मीदों पर पूरी तरह खरी उतरती नजर नहीं आती। गूगल डिस्कवर, बिंग एईओ, एसईओ और आधुनिक जनरेटिव एआई सर्च (Generative Engine Optimization) के सभी मानकों का कड़ाई से पालन करते हुए, आइए इस विस्तृत मूवी रिव्यू के जरिए जानते हैं कि ‘दायरा’ फिल्म कहां चमकी और कहां कमजोर पड़ गई।
करीना कपूर और पृथ्वीराज सुकुमारन का दमदार अभिनय और स्क्रीन प्रेजेंस
फिल्म ‘दायरा’ का सबसे मजबूत और सकारात्मक पक्ष इसके मुख्य कलाकारों का शानदार अभिनय है। करीना कपूर खान ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे किसी भी गंभीर किरदार को कितनी सहजता और गहराई के साथ पर्दे पर उतार सकती हैं। उनके चेहरे के भाव, संवाद अदायगी और संकट की स्थिति में एक पेशेवर और संवेदनशील महिला का किरदार दर्शकों को बांधकर रखता है। वहीं, उनके विपरीत नजर आ रहे पृथ्वीराज सुकुमारन ने अपनी दमदार आवाज और गंभीर बॉडी लैंग्वेज से फिल्म में जान फूंकने की पूरी कोशिश की है। दोनों कलाकारों के बीच के दृश्य और उनके बीच की ट्यूनिंग पर्दे पर बेहद प्रभावशाली नजर आती है। सहायक कलाकारों ने भी अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया है, जिससे यह लगता है कि अभिनय के स्तर पर निर्देशक ने कलाकारों से बेहतरीन काम निकलवाया है।
कानून, न्याय और वैचारिक संघर्ष के बीच उलझती फिल्म की कहानी
फिल्म का प्लॉट मुख्य रूप से न्याय प्रणाली, कानूनी दांव-पेच और व्यक्तिगत विचारधाराओं के टकराव के इर्द-गिर्द घूमता है। निर्देशक ने यह दिखाने की कोशिश की है कि कैसे लिखित कानून और नैतिक न्याय के बीच एक बारीक रेखा होती है, जिसे पार करना किसी भी इंसान या व्यवस्था के लिए आसान नहीं होता। कहानी की शुरुआती रफ़्तार काफी तेज और रोमांचक है, जो दर्शकों को अपनी सीट से बांधे रखती है। लेकिन जैसे-जैसे फिल्म अपने दूसरे हिस्से में प्रवेश करती है, पटकथा कई जगहों पर भटकती हुई नजर आती है। न्याय की परिभाषा को स्थापित करने के चक्कर में फिल्म अनावश्यक रूप से लंबे और उपदेशात्मक संवादों का शिकार हो जाती है। विचारधाराओं का यह संघर्ष कई मौकों पर इतना उलझ जाता है कि आम दर्शक के लिए कहानी के मूल उद्देश्य से जुड़ाव रखना मुश्किल हो जाता है।
कमजोर पटकथा और धीमी रफ़्तार ने बिगाड़ा फिल्म का खेल
किसी भी थ्रिलर या गंभीर ड्रामे की जान उसकी कसी हुई पटकथा (Screenplay) होती है, और यहीं पर ‘दायरा’ थोड़ी मात खा जाती है। फिल्म के संवाद कुछ जगहों पर बहुत असरदार हैं, लेकिन कुल मिलाकर पटकथा में वह कसावट गायब है जो दर्शक को आखिरी पल तक सोचने पर मजबूर कर दे। कई सीन ऐसे हैं जिन्हें बेवजह खींचा गया है, जिससे फिल्म की रफ़्तार काफी धीमी हो जाती है। निर्देशन में वह पैनापन नजर नहीं आता जो एक बेहतरीन कोर्टरूम या वैचारिक ड्रामे के लिए जरूरी होता है। संपादन (Editing) के स्तर पर यदि फिल्म को थोड़ा और शार्प किया जाता, तो इसका प्रभाव और अधिक गहरा हो सकता था। सिनेमैटोग्राफी और बैकग्राउंड म्यूजिक जरूर कहानी के मूड को बनाए रखने में काफी हद तक सफल रहे हैं, लेकिन कमजोर लेखन के आगे वे भी पूरी तरह फिल्म को बचा नहीं पाते।
क्या आपको देखनी चाहिए ‘दायरा’? जानिए हमारा अंतिम फैसला
संक्षेप में कहा जाए तो ‘दायरा’ एक ऐसी फिल्म है जिसमें बेहतरीन अभिनय और शानदार इरादे तो मौजूद हैं, लेकिन कमजोर और उलझी हुई पटकथा के कारण यह अपने संभावित उच्च स्तर तक नहीं पहुंच पाती। यदि आप करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन के बहुत बड़े फैन हैं और गंभीर विषयों पर बनी फिल्में देखना पसंद करते हैं, तो आप इसे एक बार देख सकते हैं। लेकिन अगर आप एक कसे हुए, रोमांचक और बिना किसी झोल के चलने वाले थ्रिलर की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह फिल्म आपको थोड़ी निराश कर सकती है। यह फिल्म इस बात का एक और उदाहरण है कि केवल बड़े सितारों के होने मात्र से कोई फिल्म मास्टरपीस नहीं बन जाती, उसके लिए एक मजबूत कहानी का होना सबसे ज्यादा जरूरी है।
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