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दवाओं के मनमाने प्रचार पर लगेगा ब्रेक! केंद्र सरकार ला रही नए नियम, फार्मा कंपनियों और रिटेलर्स की बढ़ेंगी मुश्किलें

देशभर में दवाओं, जादुई इलाजों और स्वास्थ्य उत्पादों के भ्रामक विज्ञापनों (Misleading Medical Advertisements) के जरिए आम जनता को गुमराह करने के बढ़ते मामलों पर केंद्र सरकार ने निर्णायक प्रहार करने की तैयारी कर ली है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने ड्रग्स रूल्स 1945 (Drugs Rules, 1945) में संशोधन के लिए एक नया ड्राफ्ट गजट नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। इसके तहत अब दवा निर्माताओं, थोक विक्रेताओं, डिस्ट्रीब्यूटर्स और मेडिकल रिटेलर्स द्वारा प्रिस्क्रिप्शन दवाओं (Prescription Drugs) के विज्ञापनों और आक्रामक प्रचार-प्रसार पर कड़ा कानूनी शिकंजा कसा जाएगा। प्रस्तावित नियमों के मुताबिक, शेड्यूल एच (Schedule H), शेड्यूल एच-1 (Schedule H1) और नशीली व मनोदैहिक असर वाली शेड्यूल एक्स (Schedule X) श्रेणी में आने वाली दवाओं के किसी भी प्रकार के सार्वजनिक या कमर्शियल प्रचार के लिए केंद्र सरकार से ‘पूर्व प्रशासनिक अनुमति’ (Prior Central Government Approval) लेना अनिवार्य होगा। बिना मंजूरी किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म, अखबार, टीवी, सोशल मीडिया या मेडिकल ब्रोशर पर प्रचार करने वाली कंपनियों और दवा विक्रेताओं के लाइसेंस रद्द करने के साथ-साथ उनके खिलाफ आपराधिक धाराओं में मुकदमा दर्ज किया जाएगा।

ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (DTAB) के साथ गहन विचार-विमर्श के बाद तैयार किए गए इस नए नियम का मुख्य उद्देश्य देश में ‘सेल्फ-मेडिकेशन’ (बिना डॉक्टर के पर्चे के खुद दवा खाना) और गंभीर एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस (AMR) के खतरे पर लगाम लगाना है। वर्तमान में पेनकिलर्स, पावरफुल एंटीबायोटिक्स, डिप्रेशन और नींद की गोलियों समेत कई गंभीर बीमारियों की दवाओं को फार्मा कंपनियां और ऑनलाइन ई-फार्मेसी प्लेटफॉर्म्स घुमावदार दावों, आकर्षक ऑफर्स और छूट के जरिए प्रमोट करते रहे हैं। आम मरीज बिना डॉक्टर की सलाह के विज्ञापनों से प्रभावित होकर इन शेड्यूल दवाओं की ओवरडोज लेने लगते हैं, जिससे लिवर, किडनी फेलियर और दवाओं के बेअसर होने की घातक समस्याएं पैदा हो रही हैं। नए ड्राफ्ट के अनुसार, अब किसी भी लाइसेंसी संस्था (दुकानदार या डिस्ट्रीब्यूटर) को ऐसी दवाओं की खूबियों, ब्रांड नेम या उपयोगिता को खुलेआम प्रचारित करने की इजाजत नहीं होगी, जब तक कि स्वास्थ्य मंत्रालय की एक्सपर्ट कमेटी द्वारा उस विज्ञापन के वैज्ञानिक तथ्यों की गहन जांच न कर ली जाए।

दवाओं और मेडिकल प्रचार पर केंद्र सरकार की यह सख्त कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख और राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC) की हालिया गाइडलाइंस की निरंतरता में आई है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने फार्मास्युटिकल कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग प्रथाओं (Unethical Drug Promotion), डॉक्टरों को महंगे उपहार-विदेश यात्राएं देकर अपनी दवाएं लिखवाने के खेल पर केंद्र को उच्चस्तरीय समिति गठित करने का निर्देश दिया था। वहीं एनएमसी ने भी डॉक्टरों और निजी अस्पतालों के विज्ञापनों में ‘नंबर-1 स्पेशलिस्ट’, ‘100% सफल इलाज’, ‘चमत्कारी परिणाम’ और मरीजों के स्पॉन्सर्ड रिव्यू-टेस्टिमोनियल्स के इस्तेमाल पर पूर्ण पाबंदी लगा दी है। अब स्वास्थ्य मंत्रालय ने आपूर्ति श्रृंखला के दूसरे छोर यानी दवा निर्माताओं, डिस्ट्रीब्यूटर्स और केमिस्ट्स पर नकेल कसकर पूरे हेल्थकेयर इकोसिस्टम में भ्रामक प्रचार की गुंजाइश को पूरी तरह समाप्त करने का खाका खींचा है।

सरकार के इस कदम से फार्मा उद्योग और तेजी से उभरते ई-फार्मेसी (Online Pharmacy) पोर्टल्स के मार्केटिंग मॉडल पर गहरा असर पड़ना तय है। अब तक कई कंपनियां सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, डिजिटल सर्च एड्स और हेल्थ ब्लॉग्स के जरिए इनडायरेक्ट ‘सरोगेट प्रमोशन’ का सहारा लेती थीं। नए नियम लागू होने के बाद:

  1. हर प्रचार सामग्री की प्री-स्क्रीनिंग: दवा कंपनियों को विज्ञापनों की हर स्क्रिप्ट, क्रिएटिव और पर्चे को मंजूरी के लिए केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) के पास जमा करना होगा, जिससे अप्रूवल प्रोसेस लंबा और जटिल हो जाएगा।

  2. ऑनलाइन दवाओं पर डिस्काउंट विज्ञापनों पर रोक: ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर शेड्यूल दवाओं के ब्रांड्स को प्रमोट करने और उन पर ‘फ्लैश सेल’ या भारी छूट वाले विज्ञापनों पर सीधे रोक लगेगी।

  3. पेनल्टी और जेल का प्रावधान: नियमों का उल्लंघन करने पर ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट और ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम के तहत भारी जुर्माना और पहली बार अपराध पर 6 महीने से लेकर दूसरी बार में 1 साल तक की जेल की सजा का प्रावधान रहेगा।

इस ड्राफ्ट नोटिफिकेशन के सार्वजनिक होते ही देश की बड़ी थोक दवा मंडियों—दिल्ली की भागीरथ पैलेस, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की अमीनाबाद दवा मंडी, कानपुर की नयागंज मार्केट और पटना की गोविंद मित्रा रोड के थोक व खुदरा दवा विक्रेताओं में हलचल तेज हो गई है। ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स (AIOCD) के प्रतिनिधियों का कहना है कि सरकार को असली दवा कंपनियों और छोटे खुदरा दुकानदारों के बीच फर्क समझना चाहिए। कई बार दुकानदार जनहित और जन-जागरूकता के लिए बीमारियों और टीकों से जुड़े पोस्टर लगाते हैं, जिन पर नई पाबंदियों से भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। हालांकि, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, मेडिकल काउंसिल और वरिष्ठ चिकित्सकों ने सरकार के इस कदम का पुरजोर स्वागत किया है। उनका मानना है कि जब तक शेड्यूल दवाओं के मनमाने विज्ञापनों पर ताला नहीं लगेगा, तब तक मरीजों को मेडिकल लूट और जानलेवा साइड-इफेक्ट्स से बचाना संभव नहीं होगा। सरकार ने इस मसौदे पर सभी हितधारकों से सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं, जिसके बाद इसे आधिकारिक राजपत्र में अंतिम रूप से अधिसूचित कर पूरे देश में लागू कर दिया जाएगा।