
देश की शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने आपराधिक न्याय प्रणाली और डिफॉल्ट बेल (Default Bail) के नियमों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा कानूनी फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि यदि जांच एजेंसी ने तय कानूनी समय सीमा के भीतर अदालत में चार्जशीट (आरोप पत्र) दाखिल कर दी है, तो सिर्फ इस आधार पर आरोपी को डिफॉल्ट बेल का अधिकार नहीं मिल जाता कि उसे चार्जशीट की कॉपी समय पर नहीं सौंपी गई। इस ऐतिहासिक फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के पुराने आदेश को पूरी तरह से सही ठहराया है।
जानिए सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी प्रावधानों पर क्या दी व्यवस्था
न्यायपालिका के सामने आए इस बेहद संवेदनशील कानूनी सवाल पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और नई नागरिक सुरक्षा संहिता के प्रावधानों की बारीकी से व्याख्या की। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानूनन जांच पूरी होने और तय समय सीमा (जैसे 60 या 90 दिन) के भीतर कोर्ट के समक्ष चार्जशीट पेश करने से ही जांच एजेंसी की जिम्मेदारी का एक बड़ा हिस्सा पूरा हो जाता है। आरोपी को चार्जशीट की प्रति (Copy) मिलने में हुई किसी भी तरह की प्रशासनिक या तकनीकी देरी को आधार बनाकर ‘डिफॉल्ट बेल’ का दावा नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह आरोपी का पूर्ण और मौलिक अधिकार नहीं बनता है।
हाईकोर्ट के फैसले पर लगी मुहर और निचली अदालतों को कड़ा संदेश
सुप्रीम कोर्ट की इस व्यवस्था से हाईकोर्ट के उस आदेश को कानूनी मजबूती मिली है, जिसमें आरोपी की जमानत याचिका को इसी तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि आरोपी को चार्जशीट की कॉपी मुहैया कराना एक प्रक्रियात्मक अधिकार है, जो अदालत की संज्ञान प्रक्रिया (Cognizance) के दौरान सुनिश्चित किया जाता है। लेकिन इसे जांच एजेंसी की विफलता नहीं माना जा सकता। इस फैसले से अब देश भर की निचली अदालतों और आपराधिक मामलों की पैरवी करने वाले वकीलों के बीच डिफॉल्ट बेल के दुरुपयोग को लेकर चल रही कई तरह की कानूनी उलझनें पूरी तरह समाप्त हो जाएंगी।
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