डोडा की महिलाओं ने बंजर ढलानों पर खिलाए गेंदे के फूल, मेहनत से बदल डाली अपनी तकदीर और बन गईं आत्मनिर्भर

जम्मू-कश्मीर का पहाड़ी जिला डोडा अपनी दुर्गम घाटियों, ठंडी हवाओं और परंपरागत मक्का व राजमा की खेती के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन पिछले कुछ समय में यहां की वादियों ने एक ऐसा बदलाव देखा है जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। जिन पत्थरीली और सूखी ढलानों को कभी किसान गैर-उपजाऊ मानकर छोड़ दिया करते थे, आज वही बंजर जमीन सुनहरे पीले और नारंगी गेंदे के फूलों से जगमगा रही है। यह बदलाव किसी चमत्कार से कम नहीं है और इस क्रांति की सबसे बड़ी सूत्रधार हैं यहां की ग्रामीण महिलाएं। घर की चारदीवारी और चूल्हे-चौके तक सीमित रहने वाली इन महिलाओं ने मिट्टी की तासीर पहचानी, अपनी मेहनत का पसीना बहाया और आज वे न सिर्फ अपने परिवारों का संबल बन चुकी हैं, बल्कि इलाके की आर्थिक तस्वीर भी पूरी तरह बदल रही हैं।

डोडा जिले के भद्रवाह, थाथरी, अस्सर और भलेसा जैसे पहाड़ी इलाकों में पारंपरिक रूप से किसान मक्का या मौसमी सब्जियों पर निर्भर रहते थे। भौगोलिक कठिनाइयों, आवारा मवेशियों, बंदरों के आतंक और अप्रत्याशित मौसम के चलते इन फसलों से लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता था। कई बार बारिश की कमी या अत्यधिक ठंड की वजह से खड़ी फसलें बर्बाद हो जाती थीं, जिससे परिवारों पर कर्ज का बोझ बढ़ जाता था। ऐसी स्थिति में गांव की महिलाओं ने स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के जरिए संगठित होकर कुछ नया करने का फैसला किया। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (उम्मीद) और जम्मू-कश्मीर कृषि व फ्लोरीकल्चर विभाग ने इन महिलाओं को व्यावसायिक पुष्पकृषि यानी फ्लोरीकल्चर की संभावनाओं से रूबरू कराया। शुरुआत में जब बंजर और असिंचित ढलानों पर गेंदे के पौधे लगाने की बात हुई, तो कई लोगों को संशय था कि क्या इन पत्थरों के बीच फूल खिल पाएंगे। महिलाओं ने इस संशय को अपनी सबसे बड़ी चुनौती के रूप में स्वीकार किया और जमीन की जुताई से लेकर जैविक खाद डालने तक का सारा जिम्मा खुद अपने हाथों में लिया।

फ्लोरीकल्चर विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) के विशेषज्ञों ने डोडा की महिलाओं को आधुनिक कृषि तकनीकों का सघन प्रशिक्षण दिया। उन्हें पूसा नारंगी, पूसा बसंती और कलकत्ता हाइब्रिड जैसी गेंदे की उन्नत किस्मों के बारे में बताया गया, जो कम पानी और पहाड़ी मिट्टी में भी तेजी से पनपती हैं। इन किस्मों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन पर जंगली जानवरों का खतरा लगभग शून्य रहता है, क्योंकि मवेशी और बंदर गेंदे के तीखे स्वाद और गंध की वजह से इसे नुकसान नहीं पहुंचाते। महिलाओं ने नर्सरी तैयार करने, पौध रोपण के सही फासले, जैविक कीटनाशक बनाने और टपक सिंचाई (ड्रिप इरीगेशन) के तौर-तरीके सीखे। बंजर जमीन पर जब पहली बार गेंदे के पौधे लहलहाए और कुछ ही हफ्तों में कलियां खिलने लगीं, तो महिलाओं के चेहरों पर विश्वास की एक नई चमक देखने को मिली। महिलाओं ने रासायनिक खादों का प्रयोग न्यूनतम रखते हुए स्थानीय गोबर की खाद और केंचुआ खाद का उपयोग किया, जिससे फूलों का आकार बड़ा और रंग गहरा चमकदार निकलकर आया।

गेंदे की खेती ने सिर्फ खेतों को ही सुंदर नहीं बनाया, बल्कि डोडा की स्थानीय अर्थव्यवस्था में एक नई जान फूंक दी। पहले जम्मू, उधमपुर और कटरा जैसे धार्मिक पर्यटन स्थलों पर ताजे फूलों की आपूर्ति के लिए बाहरी राज्यों जैसे पंजाब और हिमाचल प्रदेश पर निर्भर रहना पड़ता था। माता वैष्णो देवी धाम, मचैल माता यात्रा और भद्रवाह के प्रसिद्ध वासुकी नाग मंदिर जैसे धार्मिक स्थलों पर सालभर फूलों की भारी मांग रहती है। डोडा की महिलाओं ने इस बाजार की नब्ज को पकड़ा और स्थानीय व्यापारियों के साथ सीधे संपर्क स्थापित किया। सुबह तड़के ओस की बूंदों के बीच फूलों की तुड़ाई की जाती है, उन्हें छांटकर बोरियों और टोकरियों में पैक किया जाता है और कुछ ही घंटों के भीतर ये फूल स्थानीय बाजारों, शादियों, त्योहारों और पूजा-अर्चना के लिए रवाना हो जाते हैं। स्थानीय व्यापारियों को भी बाहरी मंडियों के मुकाबले डोडा से बेहद ताजा और सस्ते दामों पर फूल मिलने लगे, जिससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो गई और महिलाओं को उनकी उपज का पूरा और सही मूल्य सीधे मिलने लगा।

कभी एक-एक पैसे के लिए परिवार के पुरुषों पर आश्रित रहने वाली डोडा की ये ग्रामीण महिलाएं आज हर सीजन में सत्तर हजार से लेकर डेढ़ लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमा रही हैं। त्योहारों के मौसम, खासकर नवरात्रि, दशहरा और दीवाली के समय इन फूलों की मांग आसमान छूने लगती है, जिससे उनकी आय में कई गुना इजाफा होता है। इस आर्थिक स्वतंत्रता ने उनके जीवन स्तर को सीधे तौर पर सुधारा है। महिलाएं अब अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ा रही हैं, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं ले पा रही हैं और अपने पक्के मकान बनाने में योगदान दे रही हैं। कई महिलाओं ने अपनी कमाई से जमीन के नए टुकड़े लीज पर लिए हैं ताकि वे अपने फूलों के कारोबार का विस्तार कर सकें। गांव की चौपालों पर अब उनकी राय को सम्मान दिया जाता है और पारिवारिक निर्णयों में उनकी बात वजन रखती है। यह केवल एक फसल की कामयाबी नहीं है, बल्कि यह उस आत्मविश्वास की जीत है जो किसी भी ग्रामीण समाज की रीढ़ को मजबूत करता है।

डोडा में गेंदे की खेती की यह सफलता केवल एक गांव या ब्लॉक तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने पूरे चिनाब घाटी क्षेत्र को एक नई राह दिखाई है। जिस तरह भद्रवाह ने लैवेंडर की खेती से ‘बैंगनी क्रांति’ (Purple Revolution) के रूप में अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई, ठीक उसी तरह अब गेंदे की पीली चादर डोडा को फ्लोरीकल्चर हब के रूप में स्थापित कर रही है। खेतों में खिले रंग-बिरंगे फूल अब पर्यटकों को भी आकर्षित करने लगे हैं, जिससे ग्रामीण पर्यटन और होमस्टे संस्कृति को भी बढ़ावा मिल रहा है। जम्मू-कश्मीर प्रशासन भी महिलाओं के इन समूहों को आगे बढ़ाने के लिए कोल्ड स्टोरेज, पैकेजिंग यूनिट और फूलों से अगरबत्ती व प्राकृतिक रंग बनाने के प्रसंस्करण संयंत्र लगाने की दिशा में काम कर रहा है, ताकि टूटे हुए या बचे हुए फूलों का भी शत-प्रतिशत उपयोग हो सके। डोडा की महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि अगर सही दिशा, आधुनिक तकनीक और अटूट हौसला हो, तो बंजर पत्थरों से भी समृद्धि की सुगंध बिखेरी जा सकती है।