
मानसून और उसके बाद के मौसम में हर साल देश के अलग-अलग राज्यों में डेंगू का प्रकोप तेजी से पैर पसारने लगता है। अब तक आम जनमानस में यह धारणा बनी हुई थी कि डेंगू केवल तेज बुखार, जोड़ों में असहनीय दर्द और खून में प्लेटलेट्स (Platelets) की संख्या घटाने वाली बीमारी है। लेकिन हाल के वर्षों में अस्पतालों के आईसीयू और न्यूरोलॉजी विभागों में ऐसे मामलों में भारी उछाल देखा गया है जहां डेंगू के मरीजों को अचानक ब्रेन स्ट्रोक (Brain Stroke), मिर्गी के दौरे (Seizures), लकवा और कोमा जैसी गंभीर दिमागी जटिलताओं का सामना करना पड़ा है। मेडिकल जगत में इस खतरनाक स्थिति को ‘न्यूरो-डेंगू’ (Neuro-Dengue) के नाम से जाना जा रहा है। शीर्ष न्यूरोलॉजिस्ट्स और क्रिटिकल केयर विशेषज्ञों का कहना है कि डेंगू संक्रमण के दौरान दिमाग पर होने वाले इस खतरे को यदि समय रहते न पहचाना जाए, तो यह मरीज के लिए जानलेवा या स्थायी दिव्यांगता का कारण बन सकता है।
क्या डेंगू वायरस सच में दिमाग तक पहुंच सकता है? ‘न्यूरो-डेंगू’ की कड़वी सच्चाई
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, डेंगू वायरस (DENV-1, DENV-2, DENV-3, DENV-4) मुख्य रूप से संक्रमित एडीज एजिप्टी मच्छर के काटने से फैलता है। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि डेंगू वायरस केवल रक्त कोशिकाओं और लिवर को प्रभावित करता है। हालांकि, आधुनिक न्यूरो-इमेजिंग और मेडिकल रिसर्च ने साबित कर दिया है कि डेंगू का वायरस हमारे शरीर के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले सुरक्षा तंत्र ‘ब्लड-ब्रेन बैरियर’ (Blood-Brain Barrier) को भी भेदने की क्षमता रखता है।
जब मरीज का इम्यून सिस्टम गंभीर रूप से कमजोर होता है या वायरस का लोड अत्यधिक बढ़ जाता है, तो वायरस रक्त प्रवाह के जरिए सीधे मस्तिष्क के ऊतकों (Brain Tissues) और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (Central Nervous System) में प्रवेश कर जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, गंभीर डेंगू से पीड़ित लगभग 1 से 5 प्रतिशत मरीजों में न्यूरोलॉजिकल जटिलताएं विकसित होने का जोखिम होता है, जो पहली नजर में सामान्य डेंगू के लक्षणों के पीछे छिप जाती हैं।
डेंगू में ब्रेन स्ट्रोक का खतरा कैसे पैदा होता है? जानिए दोनों प्रकार के स्ट्रोक का विज्ञान
डेंगू संक्रमण के दौरान मरीज के दिमाग में दो अलग-अलग प्रकार के ब्रेन स्ट्रोक होने का खतरा रहता है:
1. हैमरेजिक स्ट्रोक (मस्तिष्क में रक्तस्राव या ब्लीडिंग): डेंगू का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव थ्रोम्बोसाइटोपेनिया यानी प्लेटलेट्स का तेजी से गिरना होता है। प्लेटलेट्स हमारे खून को जमाने और ब्लीडिंग को रोकने का काम करते हैं। जब किसी मरीज के प्लेटलेट्स 20,000 या 10,000 प्रति माइक्रोलीटर से नीचे चले जाते हैं, और साथ ही वायरस के कारण दिमाग की सूक्ष्म रक्त वाहिकाओं (Capillaries) की दीवारें कमजोर हो जाती हैं, तो दिमाग के भीतर आंतरिक रक्तस्राव (Intracranial Hemorrhage) शुरू हो जाता है। मस्तिष्क की नस फटने से होने वाला यह हैमरेजिक स्ट्रोक बेहद घातक होता है और इसमें मरीज की जान जाने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है।
2. इस्केमिक स्ट्रोक (दिमाग की नसों में खून का थक्का जमना): गंभीर डेंगू में ‘प्लाज्मा लीकेज’ (Plasma Leakage) की समस्या होती है, जिसमें रक्त वाहिकाओं से तरल पदार्थ रिसकर फेफड़ों और पेट में जमा होने लगता है। इसके कारण शरीर में भारी डिहाइड्रेशन होता है और रक्त गाढ़ा (Hypercoagulable State) हो जाता है। जब खून गाढ़ा होकर धमनियों में थक्के (Clots) बनाने लगता है या डेंगू शॉक सिंड्रोम (Dengue Shock Syndrome) के कारण ब्लड प्रेशर अचानक बहुत नीचे गिर जाता है, तो दिमाग के किसी हिस्से तक ऑक्सीजन और खून की आपूर्ति रुक जाती है। इस स्थिति को इस्केमिक स्ट्रोक कहा जाता है, जिसके कारण मरीज के शरीर का एक हिस्सा सुन्न या लकवाग्रस्त हो सकता है।
डेंगू एन्सेफैलोपैथी और एन्सेफलाइटिस: दिमाग पर संक्रमण के अन्य गंभीर रूप
स्ट्रोक के अलावा डेंगू वायरस दिमाग को दो अन्य प्रमुख तरीकों से भी नुकसान पहुंचा सकता है:
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डेंगू एन्सेफलाइटिस (Dengue Encephalitis): यह वह स्थिति है जब डेंगू वायरस सीधे मस्तिष्क की कोशिकाओं में पहुंचकर वहां सूजन (Inflammation) और संक्रमण पैदा कर देता है। इसके चलते मरीज को तेज सिरदर्द, गर्दन में अकड़न, रोशनी से चिढ़ और लगातार दौरे पड़ने लगते हैं।
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डेंगू एन्सेफैलोपैथी (Dengue Encephalopathy): कई बार वायरस सीधे दिमाग में नहीं जाता, लेकिन डेंगू के कारण लिवर फेलियर (Acute Liver Failure), किडनी की विफलता या शरीर में सोडियम का स्तर अचानक खतरनाक रूप से गिर जाने (Severe Hyponatremia) के कारण जहरीले टॉक्सिन्स दिमाग में जमा होने लगते हैं। इसके प्रभाव से मरीज का मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है, वह अपने परिजनों को पहचानना बंद कर देता है और गहरी बेहोशी (Altered Sensorium) में चला जाता है।
इन 6 ‘रेड फ्लैग’ न्यूरोलॉजिकल लक्षणों को भूलकर भी न करें नजरअंदाज
डेंगू के इलाज के दौरान यदि मरीज में सामान्य बुखार और बदन दर्द के अलावा नीचे दिए गए लक्षणों में से कोई भी संकेत दिखे, तो इसे न्यूरोलॉजिकल इमरजेंसी मानकर तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए:
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अत्यधिक और असहनीय सिरदर्द: यदि बुखार उतरने के बाद भी सिर में तेज, फटने जैसा दर्द लगातार बना रहे और सामान्य दवाओं से आराम न मिले।
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मानसिक भ्रम और चिड़चिड़ापन (Confusion): मरीज का अनाप-शनाप बोलना, समय और जगह का भान न रहना, अत्यधिक सुस्ती या परिजनों को पहचानने में असमर्थ होना।
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मिर्गी जैसे झटके या दौरे (Seizures/Convulsions): हाथ-पैरों का कांपना, आंखें ऊपर चढ़ना या अचानक शरीर का अकड़ जाना।
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चेहरे या अंगों का सुन्न पड़ना (F.A.S.T. Signs): चेहरे का एक तरफ लटकना, हाथ या पैर में कमजोरी महसूस होना या शरीर के एक हिस्से का काम करना बंद कर देना।
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बोलने में लड़खड़ाहट और देखने में परेशानी: मरीज की आवाज का स्पष्ट न निकलना, शब्द लड़खड़ाना या आंखों के आगे धुंधलापन व दोहरा दिखाई देना (Double Vision)।
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लगातार उल्टियां और बेहोशी: पेट में कुछ भी न टिकना, बार-बार उल्टी होना और मरीज का लगातार बेहोशी की हालत में चले जाना।
गलती से भी न लें ये दवाएं: प्लेटलेट्स और ब्लीडिंग का जानलेवा खेल
डेंगू के दौरान होने वाली सबसे बड़ी भूल गलत दवाओं का सेवन है। कई लोग सिरदर्द और बदन दर्द से राहत पाने के लिए मेडिकल स्टोर से बिना डॉक्टर के पर्चे के पेनकिलर्स (Painkillers) खरीद कर खा लेते हैं।
डॉक्टरों की सख्त चेतावनी है कि डेंगू के दौरान एस्पिरिन (Aspirin), आइबुप्रोफेन (Ibuprofen), डिक्लोफेनाक (Diclofenac) और मेफेनामिक एसिड (Meftal-Spas) जैसी नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इन्फ्लेमेटरी ड्रग्स (NSAIDs) का सेवन पूरी तरह से वर्जित है। ये दवाएं ब्लड थिनर (खून पतला करने वाली) की तरह काम करती हैं और प्लेटलेट्स के कार्य को रोक देती हैं। इनके सेवन से दिमाग, पेट और आंतों में जानलेवा इंटरनल ब्लीडिंग और हैमरेजिक स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। डेंगू में बुखार और दर्द के लिए केवल और केवल डॉक्टर द्वारा सुझाई गई निश्चित खुराक में ‘पैरासिटामोल’ (Paracetamol) का ही उपयोग सुरक्षित माना जाता है।
दिमाग को सुरक्षित रखने के लिए डॉक्टरों के जरूरी सुझाव और बचाव का प्रोटोकॉल
डेंगू संक्रमण के दौरान न्यूरोलॉजिकल और स्ट्रोक जैसी जानलेवा जटिलताओं से बचने के लिए इन बुनियादी सावधानियों का पालन करना अनिवार्य है:
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भरपूर हाइड्रेशन है सबसे बड़ा सुरक्षा कवच: डेंगू के मरीज को रोजाना कम से कम 3 से 4 लीटर तरल पदार्थ देना चाहिए। ओआरएस (ORS) का घोल, नारियल पानी, नींबू पानी, दाल का पानी और ताजे फलों का जूस पिएं। उचित हाइड्रेशन से खून गाढ़ा नहीं होता और इस्केमिक स्ट्रोक का खतरा टल जाता है।
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हेमेटोक्रिट (Hematocrit) और प्लेटलेट काउंट की नियमित जांच: केवल प्लेटलेट्स ही नहीं, बल्कि सीबीसी (CBC) टेस्ट में ‘हेमेटोक्रिट’ स्तर पर भी नजर रखें। हेमेटोक्रिट का बढ़ना प्लाज्मा लीकेज और खून के गाढ़े होने का सीधा संकेत है।
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इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन: मरीज के ब्लड में सोडियम और पोटैशियम के स्तर की नियमित जांच कराएं ताकि सोडियम की कमी से होने वाले ब्रेन स्वेलिंग (Cerebral Edema) से बचा जा सके।
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समय पर न्यूरोलॉजिस्ट से संपर्क: यदि मरीज के व्यवहार में थोड़ा भी बदलाव दिखे, तो बिना देरी किए एमआरआई (MRI Brain) या सीटी स्कैन (CT Scan) की सुविधा वाले टर्शियरी केयर अस्पताल में भर्ती कराएं।
डेंगू को केवल एक मौसमी बुखार समझकर घर पर लापरवाही बरतना भारी पड़ सकता है। सतर्कता, सही दवाओं का चयन, पर्याप्त तरल पदार्थों का सेवन और शुरुआती न्यूरोलॉजिकल लक्षणों की पहचान ही मरीज को डेंगू के साथ-साथ ब्रेन स्ट्रोक के गंभीर खतरे से पूरी तरह सुरक्षित रख सकती है।
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