
भारतीय राजनीति के इतिहास में एक ऐसा मोड़ आने वाला है जो देश की पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था और सियासी समीकरण को हमेशा के लिए बदल कर रख देगा. केंद्र की मोदी सरकार एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक कानून अमली जामा पहनाकर देश की सत्ता व्यवस्था को नए सिरे से परिभाषित करने की पूरी तैयारी में है. अंदरूनी सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के मुताबिक, आगामी 20 जुलाई से शुरू होने जा रहे संसद के मानसून सत्र में सरकार बहुप्रतीक्षित 130वां संविधान संशोधन विधेयक, 2025 पेश करने जा रही है. इस कानून के सियासी गलियारों में आते ही हड़कंप मच गया है क्योंकि यह सीधे तौर पर देश के मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और खुद प्रधानमंत्री की कुर्सी की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है.
क्या है इस बिल का सबसे चौंकाने वाला प्रावधान?
इस प्रस्तावित कानून की सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इसके लागू होने के बाद यदि कोई भी मंत्री, मुख्यमंत्री (CM) या प्रधानमंत्री (PM) किसी गंभीर अपराध के आरोप में लगातार 30 दिनों तक जेल या न्यायिक हिरासत में रहता है, तो उसकी कुर्सी स्वतः यानी अपने आप चली जाएगी. इस बेहद कड़े कानून की बारीकी से जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) आगामी 17 julho को अपनी अंतिम रिपोर्ट को मंजूरी देकर सरकार को सौंपने वाली है, जिसके बाद इसे संसद के पटल पर रखा जाएगा.
गृह मंत्री अमित शाह ने तैयार की है रूपरेखा, जानिए कड़े नियम
इस ऐतिहासिक विधेयक की रूपरेखा पिछले साल अगस्त में ही गृह मंत्री अमित शाह द्वारा संसद में पेश की गई थी. इस कानून के तहत मुख्य रूप से तीन बड़े और कड़े नियम तय किए गए हैं. पहला नियम यह है कि यह कानून उन जन प्रतिनिधियों पर लागू होगा जिन पर ऐसे गंभीर अपराधों के आरोप हैं जिसमें 5 साल या उससे अधिक की जेल की सजा का प्रावधान है. दूसरा नियम 30 दिनों की हिरासत की समय सीमा तय करता है. इसके मुताबिक यदि आरोपी नेता लगातार 30 दिनों तक पुलिस या न्यायिक हिरासत में बंद रहता है, तो हिरासत के ठीक 31वें दिन वह नेता अपने पद से स्वतः ही निष्कासित माना जाएगा. ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति या राज्यपाल के निर्देश पर उसे तुरंत अपनी कुर्सी छोड़नी होगी. ओडिशा से भाजपा सांसद अपराजिता सारंगी की अध्यक्षता वाली 31 सदस्यीय JPC इस कड़े प्रावधान को पूरी तरह से बिल में बनाए रखने के पक्ष में है, हालांकि इसके राजनीतिक दुरुपयोग को रोकने के लिए कुछ जरूरी सावधानियां यानी सेफगार्ड्स भी जोड़े जा रहे हैं.
विपक्ष की चिंता और सत्तापक्ष का पलटवार
इस कानून के प्रावधानों को देखते हुए सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जबरदस्त सियासी घमासान छिड़ गया है. कांग्रेस समेत ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के अधिकांश सदस्यों ने इस JPC की बैठकों का पूरी तरह से बहिष्कार कर दिया है. विपक्ष का सीधा आरोप है कि यह समिति सिर्फ सरकार की ‘रबर स्टैम्प’ की तरह काम कर रही है. विपक्षी दलों का तर्क है कि यह कानून पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है और भारत के संघीय ढांचे पर एक बड़ा हमला है. उनका कहना है कि किसी भी नेता को कोर्ट द्वारा दोषी साबित किए जाने से पहले, सिर्फ पुलिस या न्यायिक हिरासत के आधार पर पद से हटाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है. विपक्ष को सबसे बड़ा डर इस बात का है कि केंद्रीय जांच एजेंसियों के दम पर विपक्षी सरकारों को गिराने और नेताओं को परेशान करने के लिए इस कानून का गलत इस्तेमाल हो सकता है. वहीं दूसरी तरफ, सत्ताधारी गठबंधन (NDA) का साफ कहना है कि 30 दिन का समय बहुत लंबा होता है और इस दौरान कोई भी आरोपी कम से कम तीन बार अदालत में अपनी जमानत (Bail) की अर्जी लगा सकता है. अगर देश की अदालतों से भी उस नेता को कोई राहत नहीं मिलती है, तभी उसकी कुर्सी जाएगी, इसलिए यह कानून हर मायने में सही और भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति के लिए जरूरी है.
संसद का पूरा नंबर गेम: लोकसभा और राज्यसभा का समीकरण
चूंकि यह सामान्य बिल नहीं बल्कि एक बड़ा संविधान संशोधन विधेयक है, इसलिए इसे संसद से पास कराने के लिए सरकार को लोकसभा और राज्यसभा दोनों ही सदनों में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई (2/3) बहुमत जुटाना होगा. पिछले कुछ समय में देश के भीतर हुए बड़े राजनीतिक दलबदल और उलटफेर के कारण एनडीए (NDA) की स्थिति मजबूत तो हुई है, लेकिन राह अब भी बहुत आसान नहीं दिखती.
संसद के दोनों सदनों में सीटों का मौजूदा गणित कुछ इस प्रकार है:
| सदन | एनडीए (NDA) की मौजूदा ताकत | दो-तिहाई बहुमत के लिए जरूरी आंकड़े | कितने वोटों की कमी |
| लोकसभा | 330 सांसद | 362 सांसद | 32 वोट कम हैं |
| राज्यसभा | 151 सांसद (141 + 10 मनोनीत/निर्दलीय) | 162 सांसद | 11 वोट कम हैं |
लोकसभा के समीकरणों में हाल ही में बड़ा बदलाव तब आया जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 लोकसभा सांसद पाला बदलकर नेशनलिस्ट सिटिजन पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में शामिल हो गए, जो एनडीए समर्थक है. इसके साथ ही उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना के 6 सांसद भी एकनाथ शिंदे गुट (NDA) के साथ आ चुके हैं. वहीं राज्यसभा की बात करें तो वहां भी आम आदमी पार्टी (AAP) के 7 सांसद पाला बदलकर भाजपा में शामिल हो चुके हैं, जिससे विपक्षी खेमे को बड़ा झटका लगा है.
किंगमेकर की भूमिका में नवीन पटनायक और जगन मोहन रेड्डी
भले ही आधिकारिक आंकड़ों में सरकार अभी भी दो-तिहाई के जादुई आंकड़े से थोड़ी दूर नजर आ रही हो, लेकिन राजनीति के जानकारों का मानना है कि इस ऐतिहासिक बिल को पास कराने के लिए बैकडोर चैनल पूरी तरह से एक्टिव हो चुके हैं. नवीन पटनायक की बीजू जनता दल (BJD) और वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी की YSR कांग्रेस पार्टी (YSRCP) एक बार फिर इस महासंग्राम में किंगमेकर की भूमिका में आ सकती हैं. ये दोनों ही क्षेत्रीय दल पहले भी कई बड़े और विवादित विधेयकों (जैसे दिल्ली ऑर्डिनेंस बिल) पर संकट के समय सरकार का साथ दे चुके हैं. यदि इस बार भी इन दोनों दलों ने मतदान के दौरान सदन से वॉकआउट किया या सरकार के पक्ष में वोट डाल दिया, तो मोदी सरकार इस ‘PM/CM रिमूवल बिल’ को आसानी से कानून बनाकर इतिहास रच देगी. 20 जुलाई से शुरू हो रहा यह मानसून सत्र देश की राजनीति की नई दिशा तय करने वाला है.
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