Thursday , October 15 2026

जिंदगी की कीमत पर मुनाफाखोरी का खौफनाक सच: सुप्रीम कोर्ट में खुली अस्पताल-फार्मा सिंडिकेट की पोल

अस्पताल के आईसीयू या कीमोथेरेपी वार्ड के बाहर बैठा परिवार जब डॉक्टर के हाथ से दवाओं का पर्चा लेता है, तो उसकी आंखों में अपनों की जान बचाने की उम्मीद के साथ एक अनजाना खौफ भी तैर रहा होता है। यह खौफ बीमारी से ज्यादा उस बिल का होता है, जो हर चक्र के साथ लाखों रुपये का आंकड़ा पार कर जाता है। देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट में जब हाल ही में कैंसर की जीवनरक्षक दवाओं की वास्तविक लागत और उनकी बिक्री मूल्य का कच्चा-चिट्ठा खुला, तो यह केवल कानूनी दलीलों का मसला नहीं रहा, बल्कि भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था की उस सड़ांध को सामने ले आया जहां सांसे बेचने का धंधा चल रहा है। जनहित याचिकाओं और नियामक एजेंसियों की रिपोर्टों के हवाले से शीर्ष अदालत के समक्ष यह चौंकाने वाला तथ्य रखा गया कि कैंसर के कई अहम इंजेक्शन और टैबलेट्स पर 500 से 700 फीसदी और कई मामलों में तो 900 फीसदी तक का अंधाधुंध ट्रेड मार्जिन वसूला जा रहा है। इसका सीधा अर्थ यह है कि जिस दवा को तैयार करने और सप्लायर तक पहुंचाने में महज 1,000 रुपये का खर्च आता है, उसे लाचार मरीजों को 8,000 से 10,000 रुपये की भारी-भरकम एमआरपी छापकर बेचा जा रहा है।

भारत में दवाइयों पर मुद्रित ‘अधिकतम खुदरा मूल्य’ यानी एमआरपी मरीजों की सुरक्षा के लिए तय किया गया था, ताकि कोई विक्रेता मनमाना दाम न वसूल सके, लेकिन आज यही एमआरपी संस्थागत लूट का सबसे बड़ा कानूनी हथियार बन चुका है। फार्मास्युटिकल कंपनियां जानबूझकर अपनी दवाओं पर कई गुना अधिक एमआरपी अंकित करती हैं। इसके पीछे का असली खेल अस्पतालों और डिस्ट्रीब्यूटरों को आकर्षित करना होता है। अस्पताल उन्हीं कंपनियों की दवाओं को अपनी इन-हाउस फार्मेसी में रखना पसंद करते हैं, जिनमें उन्हें सबसे मोटा कमीशन या ट्रेड मार्जिन मिलता है। एक ऑन्कोलॉजिस्ट जब किसी विशेष ब्रांड की दवा लिखता है, तो बाहर खुले बाजार में विकल्प होने के बावजूद मरीज को अस्पताल के अंदर बने काउंटर से ही महंगी दवा खरीदने को मजबूर किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल आंकड़ों ने यह साफ कर दिया कि दवा निर्माता से लेकर रिटेलर तक पहुंचने के दौरान असली मुनाफा न तो वैज्ञानिक को मिलता है और न ही रिसर्च एंड डेवलपमेंट में जाता है, बल्कि यह बीच का भारी मार्जिन सीधे तौर पर अस्पतालों और सप्लायर्स की तिजोरियों में चला जाता है।

भारत में कैंसर केवल एक जानलेवा बीमारी नहीं है, बल्कि यह एक पूरे परिवार की आर्थिक रीढ़ तोड़ देने वाली त्रासदी है। विभिन्न स्वास्थ्य अध्ययनों और नीति आयोग के संकेतकों के अनुसार, भारत में लगभग 60 से 70 प्रतिशत स्वास्थ्य खर्च लोग अपनी जेब से (आउट ऑफ पॉकेट) करते हैं। जब किसी मध्यमवर्गीय या निम्न आय वाले परिवार में कैंसर का पता चलता है, तो पहले छह महीनों के भीतर ही जमा-पूंजी खत्म हो जाती है। इसके बाद शुरू होता है पुश्तैनी जमीन बेचने, घर के जेवर गिरवी रखने और भारी ब्याज पर कर्ज लेने का अंतहीन सिलसिला। लखनऊ के एसजीपीजीआई, दिल्ली के एम्स या मुंबई के टाटा मेमोरियल जैसे बड़े सरकारी संस्थानों के बाहर फुटपाथों पर रात गुजारते तीमारदारों की कहानियां इस व्यवस्था की विफलता का जीवंत प्रमाण हैं। कई बार परिवार के मुखिया केवल इसलिए इलाज बीच में रोक देते हैं क्योंकि दवाइयों के एक-एक इंजेक्शन का खर्च 50 हजार से डेढ़ लाख रुपये तक होता है। सवाल यह उठता है कि जब उत्पादन लागत इतनी कम है, तो किस नैतिक और संवैधानिक अधिकार के तहत इन जीवनरक्षक अणुओं पर 700 फीसदी का मुनाफा कमाने की छूट दी जा रही है?

सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले में केंद्र सरकार, नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) और स्वास्थ्य मंत्रालय के रुख पर बेहद गंभीर टिप्पणियां की हैं। अदालत ने साफ लफ्जों में पूछा है कि जब संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक को ‘जीने का अधिकार’ मिला हुआ है, और स्वास्थ्य उस अधिकार का अभिन्न हिस्सा है, तो फिर जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों पर कड़ा सरकारी नियंत्रण क्यों नहीं है? नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स (एनएलईएम) के तहत सरकार कुछ दवाओं की अधिकतम कीमत (सीलिंग प्राइस) तय करती है, लेकिन कैंसर की दर्जनों नई इम्यूनोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी और एडवांस्ड कीमोथेरेपी दवाएं अब भी इस सूची से बाहर हैं। ट्रेड मार्जिन रेशनलाइजेशन (टीएमआर) की जिस नीति की बात वर्षों से की जा रही है, उसे अब तक सभी आवश्यक दवाओं पर सख्ती से लागू क्यों नहीं किया गया? सरकार ने 2019 में कुछ चुनिंदा दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को पहले पॉइंट ऑफ सेल पर 30 फीसदी तक सीमित करने की पायलट योजना शुरू की थी, जिससे मरीजों को करोड़ों रुपये की सीधी राहत मिली थी, मगर उस दायरे को व्यापक स्तर पर पूरे ऑन्कोलॉजी सेगमेंट में लागू करने में नीतिगत हिचकिचाहट साफ दिखाई दे रही है।

सरकार की तरफ से अक्सर यह दलील दी जाती है कि प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना और अमृत (AMRIT) स्टोर्स के जरिए सस्ती जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। यह पहल सराहनीय जरूर है, लेकिन जमीनी स्तर पर कैंसर मरीजों की जरूरतें इससे पूरी तरह पूरी नहीं हो पा रही हैं। आधुनिक कैंसर उपचार में इस्तेमाल होने वाले एडवांस्ड बायोसिमिलर्स और मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज अक्सर स्थानीय जन औषधि केंद्रों पर अनुपलब्ध रहते हैं। इसके अलावा, कई निजी अस्पतालों में बाहरी दवाओं के इस्तेमाल पर अप्रत्यक्ष प्रतिबंध या डॉक्टरों द्वारा विशेष ब्रांडेड दवाओं की अनिवार्यता मरीजों को जन औषधि का लाभ लेने से रोकती है। जब तक डॉक्टर जेनेरिक नाम से साल्ट लिखना अनिवार्य नहीं करेंगे और अस्पताल प्रशासन की फार्मेसी मोनोपॉली पर सख्त विधिक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक इन कल्याणकारी योजनाओं का पूरा लाभ अंतिम मरीज तक नहीं पहुंच सकता।

कैंसर जैसी घातक बीमारी के सामने खड़ा मरीज और उसका परिवार मानसिक रूप से सबसे कमजोर स्थिति में होता है। ऐसे नाजुक वक्त में उनसे 700 प्रतिशत तक का ट्रेड मार्जिन वसूलना विशुद्ध रूप से मानवीय संवेदनाओं का कत्ल है। सुप्रीम कोर्ट की यह सख्त निगरानी स्वास्थ्य नीति निर्माताओं के लिए एक निर्णायक चेतावनी है। विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्र सरकार को बिना किसी कॉरपोरेट दबाव के सभी गैर-अनुसूचित जीवनरक्षक दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को तत्काल प्रभाव से 20 से 30 फीसदी पर सीमित कर देना चाहिए। इसके साथ ही आयातित दवाओं पर सीमा शुल्क में छूट, स्थानीय बायोसिमिलर निर्माण को प्रोत्साहन और अस्पतालों की बिलिंग प्रणाली में पारदर्शिता लाना अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंची यह गुहार देश के करोड़ों कैंसर मरीजों की जीने की अंतिम उम्मीद है, और अब यह देखना बाकी है कि व्यवस्था मुनाफाखोरों के सिंडिकेट को तोड़ती है या फिर मरीज यूं ही महंगे इलाज के दलदल में दम तोड़ते रहेंगे।