ज़ीरा-अजवाइन से भूल जाइए! उत्तराखंड की पहाड़ी ‘जखिया’ से मिनटों में गायब होगा बुखार

हमारे देश के पहाड़ी इलाकों की गोद में कई ऐसे अनमोल और दुर्लभ मसाले छिपे हैं जो सिर्फ खाने का स्वाद ही नहीं बढ़ाते, बल्कि पारंपरिक आयुर्वेद में अचूक औषधि के रूप में भी जाने जाते हैं। आम तौर पर हर घर की रसोई में जीरा, अजवाइन और राई का इस्तेमाल तड़के के लिए किया जाता है, लेकिन क्या आपने कभी पहाड़ी ‘जखिया’ (Jakhiya) का नाम सुना है? उत्तराखंड के पहाड़ों की आबोहवा में उगने वाला यह छोटा सा काला दाना स्वाद में जितना तीखा और सौंधी खुशबू वाला होता है, सेहत के लिए उससे कहीं ज्यादा वरदान साबित होता है। तड़के की शान बढ़ाने वाले जखिया के अंदर प्रकृति ने कई ऐसे औषधीय गुण समेटे हैं जो गंभीर से गंभीर बीमारियों को चुटकियों में ठीक करने की ताकत रखते हैं। आज के इस विशेष लेख में हम आपको इसी पहाड़ी मसाले ‘जखिया’ के उन जादुई फायदों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनके बारे में जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे और इसे अपनी किचन का हिस्सा बनाने से खुद को रोक नहीं पाएंगे।

उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं मंडल के पहाड़ी क्षेत्रों में जखिया को मसालों का राजा कहा जाता है। इसका वानस्पतिक नाम क्लियोम विस्कोसा (Cleome Viscosa) है और यह जंगली रूप से उगने वाला एक पौधा है जिसके छोटे-छोटे काले या भूरे रंग के दाने होते हैं। जब पहाड़ी दाल, सब्जी, आलू के गुटके या ककड़ी के रायते में जखिया से छौंक लगाया जाता है, तो उसकी खुशबू दूर-दूर तक फैल जाती है। जीरा और राई के मुकाबले जखिया का तड़का अधिक कुरकुरा और सोंधा होता है। आयुर्वेद के जानकारों का मानना है कि पहाड़ी क्षेत्रों के लोग सदियों से इसका इस्तेमाल केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि अपने इम्यून सिस्टम को मजबूत रखने और मौसमी बीमारियों से बचने के लिए एक अचूक औषधि के रूप में करते आए हैं। आधुनिक खानपान की दौड़ में भले ही लोग इसे भूलते जा रहे हों, लेकिन इसके पारंपरिक और औषधीय महत्व को देखते हुए अब देश-विदेश के डायटीशियन और हेल्थ एक्सपर्ट्स ने भी इसे अपनी डाइट में शामिल करने की सलाह देनी शुरू कर दी है।

आयुर्वेद में जखिया के दानों को गर्म प्रकृति का माना गया है जो शरीर से कफ और वात दोष को तुरंत संतुलित करने का काम करते हैं। यदि किसी व्यक्ति को मौसमी बुखार, सर्दी-जुकाम या बदन दर्द की समस्या लगातार परेशान कर रही है, तो जखिया का काढ़ा या इसका अर्क बहुत राहत देता है। इसके अलावा, पहाड़ी इलाकों में आज भी कान के दर्द या कान के संक्रमण जैसी समस्याओं से निजात पाने के लिए जखिया का पारंपरिक रूप से इस्तेमाल किया जाता है। जखिया के बीजों को हल्के गर्म सरसों या तिल के तेल में अच्छी तरह पकाकर उस तेल की कुछ बूंदें कान में डालने से कान का दर्द पलभर में गायब हो जाता है। इसकी यह प्राकृतिक एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी खूबी शरीर के कई प्रकार के बाहरी और अंदरूनी संक्रमणों से लड़ने में मदद करती है, जिससे यह पारंपरिक चिकित्सा का एक बेहद शक्तिशाली और भरोसेमंद हिस्सा बन जाता है।

खराब जीवनशैली और अनियंत्रित खानपान के कारण आज के समय में पेट की समस्याएं जैसे गैस, एसिडिटी, कब्ज, अपच और पेट दर्द आम बात हो गई है। ऐसे में पहाड़ी जखिया आपके पाचन तंत्र के लिए किसी रामबाण औषधि से कम नहीं है। जखिया में प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक फाइबर्स और एसेंशियल ऑयल्स पाए जाते हैं जो पेट की आंतों को साफ करने और भोजन को तेजी से पचाने में मदद करते हैं। अगर खाना खाने के बाद अक्सर पेट में भारीपन या खट्टी डकारें आने की समस्या रहती है, तो जखिया से छौंक लगा हुआ भोजन खाने से हाजमे की शक्ति मजबूत होती है। यह शरीर में मेटाबॉलिज्म को तेज करता है जिससे वजन को नियंत्रित करने में भी मदद मिलती है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों के पारंपरिक खानपान में इसका उपयोग इसीलिए किया जाता था ताकि भारी से भारी या दाल-दलहन जैसी चीजें भी आसानी से पच सकें और पेट हमेशा स्वस्थ रहे।

पहाड़ी जखिया को अपनी दिनचर्या में शामिल करना बेहद आसान है और इसके लिए आपको किसी विशेष मेहनत की जरूरत नहीं है। आप अपने घर में बनने वाली सामान्य दाल, सूखी सब्जी, छोले, राजमा या तड़के वाली कढ़ी में जीरे और राई की जगह इस पहाड़ी जखिया का इस्तेमाल तड़का लगाने के लिए कर सकते हैं। जब आप गरम तेल में जखिया के दाने डालेंगे, तो यह चटककर अपनी सोंधी महक छोड़ देगा जो आपके खाने के स्वाद को कई गुना बढ़ा देगा। यदि आप उत्तर प्रदेश या अन्य मैदानी इलाकों में रहते हैं, तो इसे किसी अच्छी ऑर्गेनिक शॉप या ऑनलाइन माध्यम से आसानी से मंगा सकते हैं। अपने खानपान में इस प्राकृतिक मसाले को जगह देकर आप न केवल पारंपरिक पहाड़ी स्वाद का आनंद ले सकते हैं, बल्कि अपने पूरे परिवार को कई बीमारियों से सुरक्षित रखते हुए एक बेहतरीन और स्वस्थ जीवनशैली अपना सकते हैं।