जस्टिस उज्ज्वल भुयान का बेबाक बयान: पर्यावरण और छात्रों के प्रदर्शन पर पुलिस की कार्रवाई को बताया दुर्भाग्यपूर्ण

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुयान ने भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति जताने के सिकुड़ते लोकतांत्रिक अधिकारों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। शनिवार को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी (NLIU) में चौथे ‘जस्टिस जी.पी. सिंह स्मृति व्याख्यान’ को संबोधित करते हुए उन्होंने कई ज्वलंत मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखी।

‘चिकन बिरयानी खाना अपराध नहीं है’

अपने संबोधन के दौरान अधिकारियों की असंगत कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए जस्टिस भुयान ने एक हालिया घटना का जिक्र किया। उन्होंने गंगा नदी में नाव पर बैठकर चिकन खाने वाले युवाओं की गिरफ्तारी और उन्हें जमानत न मिलने पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, “गंगा नदी पर नाव में बैठकर चिकन खाने पर रोक लगाने वाला कोई कानून नहीं है। व्रत तोड़ने के दौरान चिकन बिरयानी खाने के लिए युवाओं को गिरफ्तार किया गया। मुझे यकीन है कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है। यह अपराध हो ही नहीं सकता। फिर भी उन्हें गिरफ्तार किया गया और तीन महीने तक जेल में रहना पड़ा।” उन्होंने इस कार्रवाई के कानूनी आधार पर गंभीर सवाल उठाए।

असहमति और छात्रों की गिरफ्तारी पर चिंता

जस्टिस भुयान ने कहा कि भारत में असहमति (Dissent) व्यक्त करने की लोकतांत्रिक जगह लगातार कम होती जा रही है। उन्होंने दुर्भाग्यपूर्ण बताया कि आज सामान्य नागरिक गतिविधियों को भी अपराध की श्रेणी में डाला जा रहा है। उन्होंने कहा कि कैंपस में शांतिपूर्ण तरीके से विरोध-प्रदर्शन करने वाले छात्रों को भी गिरफ्तार किया जा रहा है और उन्हें कई दिनों तक जमानत नहीं मिलती।

पर्यावरण प्रदर्शनकारियों के साथ ‘अपराधियों’ जैसा सुलूक

पर्यावरण के मुद्दों पर प्रदर्शन करने वालों का जिक्र करते हुए जस्टिस भुयान ने कहा, “जो लोग पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर अपनी चिंता और दुख जाहिर करने आते हैं, उन्हें पुलिस ऐसे भगा देती है जैसे वे कोई अपराधी हों।” उन्होंने बताया कि विरोध करने वाले छात्रों को न सिर्फ गिरफ्तार किया जाता है बल्कि उन्हें सस्पेंड भी कर दिया जाता है, जिसके बाद उन्हें अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू करने के लिए कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है।

अदालतों की सख्त जमानत शर्तों पर उठाया सवाल

जस्टिस भुयान ने अदालतों द्वारा जमानत देते समय लगाई जाने वाली सख्त शर्तों पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने सवाल किया, “न्यायालय संवेदनशील हैं और जमानत देते भी हैं, लेकिन कई बार इसमें बहुत देरी हो जाती है। सबसे बड़ी चिंता जमानत की सख्त शर्तें हैं। क्या न्यायालय ऐसे सख्त आदेशों के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकों को असहमति व्यक्त करने से हतोत्साहित कर रहे हैं?” उनका यह बयान लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के संदर्भ में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।