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जब लालू यादव के सामने रामविलास पासवान ने रख दी थी मुस्लिम मुख्यमंत्री वाली बड़ी शर्त

भारतीय राजनीति के पन्नों में बिहार के सियासी उतार-चढ़ाव और जोड़-तोड़ की कहानियां हमेशा से बेहद दिलचस्प और रोमांचक रही हैं, जिनमें कई ऐसे अनसुने किस्से दबे हैं जो आज भी लोगों को हैरान कर देते हैं। बात उस दौर की है जब राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और दलित राजनीति के मसीहा कहे जाने वाले लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के संस्थापक रामविलास पासवान के बीच राजनीतिक समीकरणों का एक नया दौर चल रहा था। बिहार की सत्ता के गलियारों में एक ऐसा मौका आया था जब राबड़ी देवी को दोबारा मुख्यमंत्री पद की कमान सौंपने या सरकार बनाने की कवायद चल रही थी, लेकिन ठीक उसी वक्त रामविलास पासवान ने लालू प्रसाद यादव के सामने एक ऐसी ‘मुस्लिम मुख्यमंत्री’ वाली बड़ी शर्त रख दी, जिसके चलते समीकरण पूरी तरह से उलझ गए और राबड़ी देवी चाहकर भी उस वक्त सत्ता में वापसी नहीं कर सकी थीं। बिहार की राजनीति के इतिहास का यह वह पन्ना है जिसने राज्य की सामाजिक और सियासी दिशा को लंबे समय के लिए प्रभावित कर दिया था।

नब्बे के दशक के आखिरी सालों और दो हजार के शुरुआती दशक में बिहार की राजनीति जातीय समीकरणों और सामाजिक न्याय के नारों के इर्द-गिर्द घूमती थी, जहां लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान दोनों ही पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों के सबसे बड़े पैरोकार माने जाते थे। उस समय राजनीतिक परिस्थितियों कुछ ऐसी बनी थीं कि जब राज्य में राष्ट्रपति शासन हटाने या नई सरकार के गठन की बात चल रही थी, तो मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर तमाम तरह के कयास लगाए जाने लगे थे। लालू यादव यह चाहते थे कि राबड़ी देवी के नेतृत्व में ही पार्टी आगे बढ़े और सरकार की बागडोर उनके हाथ में रहे, ताकि पार्टी संगठन और सत्ता दोनों पर एकछत्र नियंत्रण बना रहे। हालांकि, उसी समय जनता दल (यूनाइटेड) और अन्य दलों के साथ गठबंधन और समर्थन की चल रही उठापटक के बीच रामविलास पासवान ने एक ऐसा तुरुप का पत्ता फेंका जिसने आरजेडी के खेमे में भारी खलबली मचा दी और दोनों दिग्गजों के बीच दूरियां बढ़ने लगीं।

राजनीतिक गलियारों के जानकारों के मुताबिक, जब सत्ता के समीकरणों पर मंथन चल रहा था, तब रामविलास पासवान ने एक कड़ा राजनीतिक दांव चलते हुए यह शर्त रख दी कि यदि राज्य में नई सरकार का गठन करना है और समाज के सबसे कमजोर तबके व अल्पसंख्यकों को उनका वास्तविक हक देना है, तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर किसी मुस्लिम नेता को बैठाया जाना चाहिए। पासवान का यह तर्क था कि इससे राज्य में एक बहुत बड़ा सकारात्मक संदेश जाएगा और सेकुलर ताकतों का दायरा और अधिक मजबूत होगा। लेकिन लालू प्रसाद यादव इस शर्त के लिए कतई तैयार नहीं थे, क्योंकि वे अपने परिवार या अपने बेहद भरोसेमंद दायरे से बाहर सत्ता की कमान सौंपने का जोखिम मोल नहीं लेना चाहते थे। इस वैचारिक और राजनीतिक गतिरोध के कारण दोनों नेताओं के बीच बातचीत का सिलसिला टूट गया और आखिरकार उस वक्त राबड़ी देवी के नेतृत्व में सरकार की वापसी का वह सपना अधूरा रह गया, जिसकी रूपरेखा तैयार की जा रही थी।

रामविलास पासवान द्वारा रखी गई उस ‘मुस्लिम मुख्यमंत्री’ वाली शर्त और लालू यादव के इनकार ने आने वाले समय में बिहार की राजनीति की पूरी रूपरेखा ही बदलकर रख दी। इस घटना के बाद से दलित और मुस्लिम वोट बैंक के समीकरणों में जो खटास और बिखराव शुरू हुआ, उसने आने वाले चुनावों में नए राजनीतिक दलों और गठबंधनों के उभरने की जमीन तैयार कर दी, जिसका फायदा धीरे-धीरे अन्य विरोधी दलों को मिलने लगा। राजनीति के जानकारों का यह मानना है कि उस वक्त यदि दोनों नेता थोड़ी और लचीली कूटनीति का परिचय देते, तो बिहार का राजनीतिक इतिहास कुछ और ही होता। आज भले ही वे दोनों दिग्गज नेता इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा खेले गए वे सियासी दांव और समझौते आज भी बिहार के पुराने राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चा का सबसे बड़ा विषय बने रहते हैं, जो यह सिखाते हैं कि सत्ता के गलियारों में एक शर्त कैसे पूरे राज्य का भविष्य बदल सकती है।