जब मुख्य चुनाव आयुक्त से भिड़ गए थे पीएम राजीव गांधी, पर कतरने के लिए रातों-रात बदले नियम और फिर आए टीएन शेषन

भारतीय राजनीति के इतिहास में सरकारों और संवैधानिक संस्थाओं के बीच टकराव के कई किस्से दर्ज हैं, लेकिन देश के चुनाव आयोग (Election Commission of India) और सत्ता के बीच की एक ऐसी लड़ाई भी है जिसने हमेशा के लिए भारत की चुनावी व्यवस्था का चेहरा बदल दिया। यह कहानी है तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उस समय के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के बीच उपजे उस ऐतिहासिक विवाद की, जिसके चलते एकतरफा फैसले लेने वाले आयोग को रातों-रात बहु-सदस्यीय संस्था में तब्दील कर दिया गया था। इसके बाद भारतीय लोकतंत्र के पन्नों में एक ऐसे नाम की एंट्री हुई जिसने नेताओं के पसीने छुड़ा दिए—वो नाम था टीएन शेषन।

जब मुख्य चुनाव आयुक्त के फैसलों से नाराज हुई राजीव गांधी सरकार

बात उस दौर की है जब देश में चुनावी सुधारों को लेकर बहस चल रही थी और तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त आरवीएस पेरिशास्त्री अपने संवैधानिक अधिकारों का पूरी दृढ़ता से इस्तेमाल कर रहे थे। सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त के बीच कई प्रशासनिक मुद्दों और चुनाव की तारीखों को लेकर अंदरूनी खींचतान चल रही थी। राजीव गांधी सरकार को लगने लगा था कि चुनाव आयोग के पास असीमित शक्तियां हैं और एक अकेला व्यक्ति पूरे देश की लोकतांत्रिक मशीनरी को अपने हिसाब से चला रहा है। इस टकराव का नतीजा यह हुआ कि सरकार ने आयोग के एकछत्र दबदबे को नियंत्रित करने की पूरी योजना तैयार कर ली।

पर कतरने के लिए रातों-रात आए दो नए चुनाव आयुक्त

चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्तियों को संतुलित या यूं कहें कि कम करने के लिए राजीव गांधी सरकार ने साल 1989 में एक बड़ा और चौंकाने वाला कदम उठाया। एक अध्यादेश के जरिए चुनाव आयोग को एक-सदस्यीय से बढ़ाकर तीन-सदस्यीय बना दिया गया। रातों-रात दो नए चुनाव आयुक्तों—एसएस धनोआ और वीएस सहगल की नियुक्ति कर दी गई। इस कदम के पीछे का मुख्य उद्देश्य यह था कि अब मुख्य चुनाव आयुक्त कोई भी फैसला अकेले नहीं ले पाएंगे और हर बड़े फैसले पर तीनों सदस्यों की सहमति जरूरी होगी। हालांकि, यह व्यवस्था ज्यादा दिनों तक नहीं चली और सरकार बदलने के बाद आयोग फिर से एक-सदस्यीय हो गया, लेकिन इस कदम ने भविष्य के बड़े टकराव की नींव रख दी थी।

और फिर हुई इतिहास बदलने वाले ‘सख्त’ टीएन शेषन की एंट्री

इस पूरे राजनीतिक ड्रामे और संस्थागत बदलावों के बीच साल 1990 में देश के 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में टीएन शेषन ने कार्यभार संभाला। टीएन शेषन ने आते ही साफ कर दिया कि चुनाव आयोग किसी भी सरकार के दबाव में काम नहीं करेगा। उन्होंने भारतीय चुनाव प्रणाली को पूरी तरह से रीबूट कर दिया। उन्होंने नेताओं द्वारा की जाने वाली चुनावी धांधलियों, बूथ कैप्चरिंग और धन बल के इस्तेमाल पर इतनी सख्ती से रोक लगाई कि पूरे देश की राजनीति में हड़कंप मच गया। शेषन के इसी कड़े रुख के बाद 1993 में सरकार को एक बार फिर चुनाव आयोग को स्थायी रूप से बहु-सदस्यीय संस्था बनाना पड़ा, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहराया।

भारतीय लोकतंत्र पर इस ऐतिहासिक टकराव का दीर्घकालिक असर

दिल्ली के सत्ता गलियारों से शुरू हुई यह ऐतिहासिक जंग आज के आधुनिक भारत की मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव बन चुकी है। आज जब हम वोटर आईडी कार्ड, आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) का सख्ती से पालन और पारदर्शी चुनाव देखते हैं, तो इसके पीछे राजीव गांधी सरकार के दौर में शुरू हुआ वह विवाद और उसके बाद टीएन शेषन द्वारा किए गए कड़े सुधार ही हैं। यह इतिहास आज भी यह साबित करता है कि भारत में संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता किसी भी राजनीतिक ताकत से कहीं अधिक मजबूत और जरूरी है।