चीनी की कीमतों पर केंद्र का बड़ा एक्शन: गन्ने से एथेनॉल बनाने पर लगाई रोक, तेल कंपनियों को मिला नया फरमान

देश में त्योहारों और आगामी मांग के बीच चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक बड़ा नीतिगत फैसला लिया है। केंद्र सरकार ने घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने और खुदरा कीमतों पर नकेल कसने के लिए चीनी और गन्ने के रस (Sugarcane Juice) से एथेनॉल उत्पादन पर तत्काल प्रभाव से सख्त निर्देश जारी किए हैं। इसके तहत सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों (OMCs)—इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम—को गन्ने के रस, चीनी सिरप और बी-हैवी शीरे (B-Heavy Molasses) से एथेनॉल खरीद पर कड़े अंकुश लगाने को कहा गया है। सरकार का सीधा मकसद यह सुनिश्चित करना है कि देश के मिलों में मौजूद गन्ने का अधिकतम इस्तेमाल बायोफ्यूल बनाने के बजाय आम नागरिकों के लिए चीनी उत्पादन में हो सके।

देश के खुदरा बाजारों में चीनी की बढ़ती कीमतों और प्रमुख उत्पादक राज्यों में मौसमी अनिश्चितताओं के कारण सरकार ने यह कदम उठाया है। पिछले कुछ समय से महाराष्ट्र, कर्नाटक और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख गन्ना बेल्ट में वर्षा के उतार-चढ़ाव और संभावित पैदावार को लेकर चिंताएं जताई जा रही थीं। अगर गन्ने के रस और हाई-ग्रेड शीरे को भारी मात्रा में एथेनॉल बनाने के लिए डाइवर्ट कर दिया जाता, तो मिलों में तैयार चीनी का उत्पादन घट सकता था, जिससे आने वाले महीनों में कीमतें आसमान छूने लगतीं। खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने स्पष्ट संदेश दिया है कि आम उपभोक्ता की रसोई का बजट और खाद्य सुरक्षा सरकार की पहली प्राथमिकता है, जिसके चलते एथेनॉल आपूर्ति चक्र में गन्ने के उपयोग पर यह अस्थायी पाबंदी लगाना आवश्यक हो गया था।

सरकार ने 20 प्रतिशत एथेनॉल सम्मिश्रण (Ethanol Blending) के राष्ट्रीय लक्ष्य को धीमा किए बिना रणनीति में बदलाव किया है। सरकारी तेल कंपनियों को निर्देश दिया गया है कि वे गन्ने की जगह अन्य वैकल्पिक स्रोतों से एथेनॉल की आपूर्ति बढ़ाएं। इसके लिए तेल कंपनियों ने 11 अरब लीटर से अधिक एथेनॉल खरीद के टेंडर में मक्का (Corn), क्षतिग्रस्त खाद्यान्न और टूटे हुए चावल (Broken Rice) से बने एथेनॉल को प्राथमिकता दी है। इस कदम से डिस्टिलरीज को खाद्यान्न आधारित एथेनॉल उत्पादन की ओर शिफ्ट होना पड़ेगा, जबकि चीनी मिलें केवल सी-हैवी शीरे (C-Heavy Molasses)—जो चीनी निकालने के बाद बचा हुआ उप-उत्पाद है—का सीमित उपयोग ही एथेनॉल के लिए कर सकेंगी। इससे पेट्रो-ब्लेंडिंग का काम भी जारी रहेगा और चीनी का स्टॉक भी सुरक्षित रहेगा।

इस फैसले का सीधा असर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक की चीनी मिलों पर पड़ेगा। बीते कुछ वर्षों में मिलों ने एथेनॉल उत्पादन से मिलने वाले त्वरित भुगतान के सहारे किसानों के गन्ना बकाये का तेजी से निपटान किया था। गन्ने के रस से सीधे एथेनॉल बनाने पर रोक लगने से मिलों की नकदी तरलता (Liquidity) पर हल्का दबाव पड़ सकता है, हालांकि बाजार में चीनी की मजबूत मांग से उनके राजस्व का संतुलन बना रहेगा। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी, मुजफ्फरनगर, शामली और मेरठ जैसे क्षेत्रों के किसानों के लिए राहत की बात यह है कि पेराई सत्र के दौरान मिलों को चीनी उत्पादन के लिए अधिक गन्ने की जरूरत होगी, जिससे उनके गन्ने की शत-प्रतिशत खरीद सुनिश्चित रहेगी।

केंद्र सरकार के इस कड़े कदम का सबसे बड़ा फायदा सीधे तौर पर आम मध्यमवर्गीय परिवार और थोक उपभोक्ताओं को मिलने वाला है। मिठाई उद्योग, बेकरी कारोबार, कोल्ड ड्रिंक्स निर्माताओं और आम परिवारों के लिए चीनी के भाव में संभावित उछाल अब पूरी तरह थम जाएगा। बाजार में चीनी का पर्याप्त बफर स्टॉक उपलब्ध रहने से सट्टेबाजी और कृत्रिम जमाखोरी पर भी रोक लगेगी। खाद्य मंत्रालय राज्य सरकारों और जिला प्रशासनों के साथ मिलकर खुदरा कीमतों की साप्ताहिक निगरानी कर रहा है, ताकि मिलों से लेकर खुदरा दुकानों तक उपभोक्ताओं को उचित दर पर चीनी मिलती रहे।