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घरेलू शेयर बाजार में भारी उतार-चढ़ाव जारी, जानिए एशियाई बाजारों की चाल

भारतीय घरेलू शेयर बाजार में पिछले कुछ दिनों से लगातार उठापटक का दौर देखने को मिल रहा है। वैश्विक बाजारों से मिल रहे मिले-जुले संकेतों और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की बिकوال के बीच भारतीय शेयर बाजार कभी मंदी के गहरे पानी में उतरता है तो कभी खरीदारों के समर्थन से संभलने की कोशिश करता है। शेयर बाजार के निवेशकों के लिए यह समय बेहद सावधानी से ट्रेडिंग और निवेश करने का है। सेंसेक्स और निफ्टी की चाल इस बात की गवाही दे रही है कि बाजार में निवेशकों का भरोसा और अनिश्चितता दोनों एक साथ हावी हैं। ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि घरेलू बाजार के साथ-साथ एशियाई बाजारों का रुख कैसा रहा और आज के कारोबार में किन शेयरों ने शानदार मुनाफा कमाया तथा किनको भारी नुकसान का सामना करना पड़ा।

घरेलू शेयर बाजार में पिछले सत्रों में जहां भारी बिकवाली के कारण सूचकांकों में जोरदार गिरावट दर्ज की गई थी, वहीं निचले स्तरों पर हुई वैल्यू बाइंग (Value Buying) के चलते बाजार ने कुछ हद तक रिकवरी करने की भी कोशिश की। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 50 कभी हरे निशान में तो कभी लाल निशान के बीच झूलते नजर आ रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि घरेलू बाजार में यह अस्थिरता इस बात का संकेत है कि निवेशक हर छोटी से छोटी वैश्विक खबर और आर्थिक आंकड़ों पर पैनी नजर बनाए हुए हैं। जब बाजार में बड़ी गिरावट आती है, तो चुनिंदा दिग्गज शेयरों में खरीदारी का मौका तलाशने वाले निवेशकों की सक्रियता बढ़ जाती है, जिससे बाजार को कुछ समय के लिए सहारा मिलता है। हालांकि, इसके बावजूद ऊपरी स्तरों पर मुनाफावसूली (Profit Booking) हावी हो जाती है, जो सूचकांकों को और अधिक ऊपर जाने से रोकती है। जानकारों का कहना है कि निवेशकों को इस समय अपनी पोर्टफोलियो रणनीति को बेहद संतुलित रखने की जरूरत है क्योंकि तकनीकी तौर पर बाजार एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है।

भारतीय शेयर बाजार की दिशा तय करने में एशियाई बाजारों की चाल हमेशा से एक अहम भूमिका निभाती रही है। ताज़ा कारोबारी सत्र में एशियाई बाजारों का हाल मिला-जुला और कुछ हद तक दबाव वाला देखने को मिला है। जापान के निक्केई (Nikkei 225) और टॉपिक्स (Topix) सूचकांकों में जहां कुछ खरीदारी का रुख देखा गया, वहीं हांगकांग का हैंग सेंग (Hang Seng) और शंघाई कंपोजिट (Shanghai Composite) सूचकांक कमजोरी के साथ कारोबार करते नजर आए। वैश्विक स्तर पर अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) की नीतियों, ब्याज दरों में बदलाव की संभावनाओं और कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने वैश्विक निवेशकों की चिंताएं बढ़ा रखी हैं। ब्रेंट क्रूड के दाम ऊंचे बने रहने के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है, जिसका सीधा असर उभरते हुए बाजारों जैसे कि भारत पर भी पड़ता है। विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय इक्विटी मार्केट से लगातार पैसा निकाले जाने के पीछे भी यही वैश्विक आर्थिक कारण मुख्य रूप से जिम्मेदार माने जा रहे हैं। जब तक वैश्विक बाजारों में स्थिरता नहीं आती, तब तक भारतीय शेयर बाजार में भी इस तरह की उठापटक और सांसें रोक देने वाली चाल जारी रहने की पूरी संभावना है।

शेयर बाजार के रोजाना के कारोबार में शेयरों का ऊपर-नीचे होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन आज के सत्र में कुछ चुनिंदा शेयरों ने निवेशकों को मालामाल कर दिया तो कुछ ने भारी निराशा हाथ लगने दी। ऑटोमोबाइल, एफएमसीजी, चुनिंदा बैंकिंग और चुनिंदा रियल्टी शेयरों में खरीदारी का जोर देखने को मिला, जिससे कई कंपनियों के शेयर टॉप गेनर्स की सूची में शामिल रहे। दूसरी ओर, मेटल, चुनिंदा आईटी सेक्टर और एनर्जी सेगमेंट के शेयरों में बिकवाली का दबाव साफ तौर पर महसूस किया गया। पेट्रोनेट, चुनिंदा फाइनेंशियल सर्विसेज और मिडकैप-स्मॉलकैप सेगमेंट के कुछ शेयरों में शानदार उछाल दर्ज किया गया, जबकि टाटा इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन, प्रीमियर Energies, और कुछ प्रमुख फार्मा व रिटेल कंपनियों के शेयरों को मुनाफावसूली का शिकार होना पड़ा और वे टॉप लूजर्स की सूची में लुढ़क गए। बाजार के जानकारों का कहना है कि निवेशकों को किसी भी शेयर में पैसा लगाने से पहले उसकी फंडामेंटल स्ट्रेंथ यानी बुनियादी मजबूती को जरूर परख लेना चाहिए, क्योंकि इस तरह के अस्थिर बाजार में कमजोर शेयरों में भारी नुकसान का जोखिम बहुत ज्यादा होता है।

भारतीय शेयर बाजार की मौजूदा स्थिति का विश्लेषण करते समय विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) और घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) के आंकड़ों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। पिछले कुछ सत्रों से लगातार देखने में आया है कि विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से बिकوال बनकर निकल रहे हैं और भारतीय शेयरों में लगातार बिकवाली का दबाव बना रहे हैं। इसके विपरीत, हमारे देश के घरेलू संस्थागत निवेशक यानी DIIs और म्यूचुअल फंड्स बाजार में एक बड़े सपोर्ट सिस्टम के रूप में उभर कर सामने आए हैं। जब भी विदेशी निवेशक भारी मात्रा में शेयर बेचते हैं, घरेलू निवेशकों की तरफ से आने वाला मजबूत निवेश बाजार को एक तगड़ा सुरक्षा कवच प्रदान करता है। यही कारण है कि बाजार में बड़ी गिरावट आने के बावजूद भारतीय बाजार पूरी तरह से धराशायी नहीं होते और समय-समय पर संभलने का मौका ढूंढ लेते हैं। देश के खुदरा निवेशकों (Retail Investors) का शेयर बाजार और सिप (SIP) के प्रति बढ़ता रुझान भी इस बात का प्रमाण है कि भारतीय पूंजी बाजार की नींव अब पहले से कहीं अधिक मजबूत हो चुकी है और यह बाहरी झटकों को झेलने की बेहतर क्षमता रखता है।

शेयर बाजार के इस दौर में तमाम वित्तीय विशेषज्ञों और मार्केट गुरुओं की यही सलाह है कि निवेशकों को किसी भी तरह की घबराहट (Panic) में आकर अपने शेयर नहीं बेचने चाहिए। बाजार में जब भी गिरावट आती है, वह लॉन्ग टर्म के निवेशकों के लिए अच्छे और मजबूत फंडामेंटल वाले शेयरों को सस्ते दामों पर खरीदने का एक बेहतरीन अवसर लेकर आती है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि निवेशकों को अपना पैसा किसी एक सेक्टर में लगाने के बजाय इसे अलग-अलग सेक्टरों जैसे कि बैंकिंग, फार्मा, ऑटो और एफएमसीजी में डायवर्सिफाइड करना चाहिए। इसके अलावा, एकमुश्त पैसा लगाने (Lumpsum) के बजाय सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान यानी एसआईपी (SIP) के जरिए धीरे-धीरे निवेश करना मौजूदा अस्थिर बाजार में सबसे सुरक्षित तरीका माना जाता है। निवेशकों को हमेशा अपने जोखिम उठाने की क्षमता (Risk Appetite) को ध्यान में रखकर ही पोर्टफोलियो तैयार करना चाहिए और शॉर्ट-मार्ट के उतार-चढ़ाव से डरने के बजाय लंबी अवधि के वित्तीय लक्ष्यों पर फोकस करना चाहिए ताकि बाजार की इस चाल का पूरा फायदा उठाया जा सके।