
गुजरात सरकार ने राज्य के लाखों पशुपालकों और किसानों की आर्थिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए व्यापक पशुधन बीमा योजना को धरातल पर उतार दिया है। अक्सर देखा जाता है कि किसी गंभीर बीमारी, महामारी या अचानक दुर्घटना के कारण दुधारू और भारवाहक पशुओं की असामयिक मृत्यु हो जाती है, जिससे छोटे और सीमांत पशुपालक भारी वित्तीय संकट में घिर जाते हैं। इस जोखिम को समाप्त करने के लिए राज्य सरकार ने राष्ट्रीय पशुधन मिशन के सहयोग से एक सुदृढ़ व्यवस्था तैयार की है, जिसके तहत गाय, भैंस और कच्छ-सौराष्ट्र के प्रसिद्ध ऊंटों का व्यापक बीमा किया जा रहा है। इस योजना का सीधा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी पशु की असमय मृत्यु की स्थिति में पशुपालक की नियमित आजीविका प्रभावित न हो और उसे नया पशु खरीदने के लिए किसी साहूकार या कर्ज के जाल में न फंसना पड़े।
राज्य के पशुपालन विभाग ने इस योजना के क्रियान्वयन को बेहद पारदर्शी और किसान-हितैषी बनाया है, ताकि गांव-देहात के अंतिम छोर पर बैठे चरवाहे और दुग्ध उत्पादक भी बिना किसी जटिल कागजी कार्रवाई के इसका लाभ उठा सकें। आधुनिक डिजिटल तकनीकों और स्थानीय पशु चिकित्सा केंद्रों के नेटवर्क के जरिए गांव-गांव कैंप आयोजित करने की रूपरेखा तैयार की गई है, जिससे राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद है।
इस नई पशुधन बीमा योजना की सबसे प्रमुख विशेषता इसमें मिलने वाली वित्तीय छूट है। आमतौर पर वाणिज्यिक बीमा कंपनियों के महंगे प्रीमियम के कारण ग्रामीण पशुपालक अपने मवेशियों का बीमा कराने से कतराते थे, लेकिन सरकार ने इस बाधा को पूरी तरह खत्म कर दिया है। योजना के नियमों के अनुसार, कुल निर्धारित वार्षिक बीमा प्रीमियम का 85 प्रतिशत हिस्सा सरकार वहन करेगी, जबकि लाभार्थी पशुपालक को अपनी जेब से केवल 15 प्रतिशत का मामूली प्रीमियम ही जमा करना होगा। उदाहरण के तौर पर, एक वर्ष के लिए लगभग ₹40,000 के बीमित मूल्य वाले मवेशी के लिए पशुपालक को औसतन मात्र ₹229 से ₹250 के आसपास का खर्च देना पड़ता है, जबकि शेष पूरी धनराशि सब्सिडी के रूप में सीधे बीमा कंपनी को हस्तांतरित कर दी जाती है।
यह व्यवस्था न केवल बड़े डेयरी फार्म मालिकों बल्कि उन भूमिहीन खेतिहर मजदूरों और घुमंतू पशुपालकों के लिए भी वरदान साबित होगी, जिनकी पूरी पारिवारिक आय एक या दो दुधारू मवेशियों अथवा ऊंटों के दूध और ढुलाई पर निर्भर करती है। सरकार द्वारा उठाया गया यह वित्तीय कदम पशुपालकों के जोखिम को न्यूनतम स्तर पर ले आता है, जिससे राज्य में श्वेत क्रांति और डेयरी क्षेत्र के निवेश को भी नई रफ्तार मिलेगी।
गुजरात के भौगोलिक परिदृश्य में जहां उत्तर गुजरात, मध्य गुजरात और सौराष्ट्र के इलाकों में गिर गाय और जाफराबादी/महेसाणी भैंसें डेयरी सेक्टर की रीढ़ मानी जाती हैं, वहीं कच्छ के विशाल रण और सीमावर्ती इलाकों में खराई और कच्ची ऊंट प्रजाति स्थानीय मालधारी समुदाय के जीवन का मुख्य आधार हैं। इस योजना के तहत पहली बार गाय और भैंसों के साथ-साथ ऊंटों को भी प्रमुखता से शामिल किया गया है, जिससे शुष्क क्षेत्रों के ऊंट पालकों में भारी उत्साह है। योजना के प्रावधानों के मुताबिक, पशुओं की नस्ल, उम्र और दुग्ध उत्पादन क्षमता अथवा कार्यक्षमता के आधार पर उनकी बीमित राशि तय की जाती है, जो सामान्यतः ₹40,000 से लेकर ₹60,000 प्रति पशु तक बैठती है।
यदि किसी बीमित पशु की आकाशीय बिजली गिरने, सड़क दुर्घटना, सांप के काटने, आग लगने या किसी संक्रामक बीमारी से मृत्यु हो जाती है, तो निर्धारित क्लेम प्रक्रिया के तहत पूरी बीमित राशि सीधे पशुपालक के बैंक खाते में ट्रांसफर की जाती है। इसके अलावा, कई परिस्थितियों में स्थायी दिव्यांगता के मामलों में भी नियमानुसार 75 प्रतिशत तक की आर्थिक क्षतिपूर्ति का प्रावधान रखा गया है, ताकि पशु के अनुपयोगी होने पर भी परिवार की आर्थिक स्थिति न बिगड़े।
योजना का लाभ लेने के लिए पशु की प्रामाणिक पहचान होना सबसे अनिवार्य शर्त है। इसके लिए पशुपालन विभाग के पंजीकृत पशु चिकित्सकों और प्रसार कार्यकर्ताओं द्वारा पशु के कान में एक विशेष 12 अंकों वाला माइक्रोचिपयुक्त ईयर-टैग (Ear Tag) लगाया जाता है, जिसे राष्ट्रीय ‘भारत पशुधन’ पोर्टल पर डिजिटल रूप से पंजीकृत किया जाता है। यह टैग पशु के पहचान पत्र की तरह कार्य करता है, जिसमें पशु की नस्ल, उम्र, स्वास्थ्य इतिहास और मालिक का पूरा ब्योरा दर्ज होता है। किसी भी अप्रिय घटना या मृत्यु के समय यही टैग क्लेम पास कराने का मुख्य आधार बनता है, इसलिए पशुपालकों को टैग को सुरक्षित रखने की सलाह दी गई है।
आवेदन करने के लिए पशुपालक अपने नजदीकी सरकारी पशु चिकित्सालय, प्रथम उपचार केंद्र, ग्राम पंचायत के ई-ग्राम केंद्र अथवा स्थानीय दुग्ध सहकारी मंडली (डेयरी समिति) से सीधा संपर्क कर सकते हैं। आवेदन के लिए पशुपालक का आधार कार्ड, बैंक पासबुक की प्रतिलिपि, राशन कार्ड और पशु का स्वास्थ्य प्रमाण-पत्र आवश्यक होता है। अधिकारियों का कहना है कि औपचारिकताएं पूरी होते ही पॉलिसी दस्तावेज और बीमा संदर्भ संख्या सीधे पशुपालक के पंजीकृत मोबाइल नंबर पर डिजिटल लिंक के जरिए भेज दी जाती है, जिससे दलालों और बिचौलियों की भूमिका पूरी तरह खत्म हो जाती है।
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