
सनातन धर्म और हिंदू पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का विशेष महत्व है। इस पावन तिथि को न सिर्फ निर्जला एकादशी का महापर्व मनाया जाता है, बल्कि इसी दिन वेद माता गायत्री की उत्पत्ति भी हुई थी, जिसे देश भर में गायत्री जयंती (Gayatri Jayanti 2026) के रूप में बेहद श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस साल की गायत्री जयंती ज्योतिषीय दृष्टिकोण से बेहद अनूठी और फलदायी होने जा रही है, क्योंकि इस दिन एक साथ 3 बड़े और दुर्लभ शुभ योगों का निर्माण हो रहा है। हालांकि, इस पावन अवसर पर सुबह से ही भद्रा का साया रहने के कारण श्रद्धालुओं के बीच पूजा के सही समय को लेकर थोड़ा संशय बना हुआ है। आइए ज्योतिषियों और पंचांग गणना की नजर से जानते हैं कि इस बार गायत्री जयंती किस तारीख को है और बप्पा व वेद माता की पूजा का सबसे उत्तम समय क्या रहेगा।
इस साल गायत्री जयंती पर बनने वाले 3 महासंयोगों का गणित
वर्ष 2026 की गायत्री जयंती को धार्मिक लिहाज से बहुत ही पुण्य फल देने वाला माना जा रहा है। ज्योतिषविदों के मुताबिक, इस दिन ग्रहों की विशेष चाल के कारण अमृत सिद्धि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग का एक साथ त्रिवेणी संगम होने जा रहा है। शास्त्रों में माना गया है कि इन योगों के दौरान की गई किसी भी प्रकार की आध्यात्मिक साधना, मंत्र जाप या दान-पुण्य का फल कई हजार गुना अधिक बढ़कर मिलता है। यदि आप लंबे समय से किसी विशेष मंत्र की सिद्धि या मानसिक शांति के लिए अनुष्ठान शुरू करने की सोच रहे हैं, तो इन 3 शुभ योगों की मौजूदगी आपके संकल्प को सीधे पूर्णता की ओर ले जाएगी।
सुबह से ही रहेगा भद्रा का साया, इस समय भूलकर भी न करें शुभ कार्य
इस साल की गायत्री जयंती पर जहां एक तरफ शुभ योगों की भरमार है, वहीं दूसरी तरफ पंचांग में भद्रा का वास भी दिखाई दे रहा है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, भद्रा काल के दौरान कोई भी मांगलिक कार्य, नया संकल्प या पूजा की मुख्य आहुतियां देना वर्जित माना जाता है। पंचांग गणना के मुताबिक, एकादशी तिथि शुरू होने के साथ ही सुबह के समय भद्रा का प्रवेश हो जाएगा, जो दिन के एक बड़े हिस्से तक प्रभावी रहेगा। ऐसी स्थिति में श्रद्धालुओं को सलाह दी जाती है कि वे सुबह के इस समय में केवल मानसिक रूप से गायत्री मंत्र का जाप करें और कोई भी भारी पूजा या अनुष्ठान भद्रा समाप्त होने के बाद ही संपन्न करें, ताकि व्रत और पूजा का पूर्ण और सकारात्मक फल प्राप्त हो सके।
गायत्री जयंती की सटीक तारीख, पूजा विधि और महामुहूर्त का समय
पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी तिथि की शुरुआत और उदयातिथि के गणित को देखते हुए इस साल गायत्री जयंती का महापर्व बेहद खास मुहूर्त में मनाया जाएगा। भद्रा के साये को ध्यान में रखते हुए पूजा का सबसे श्रेष्ठ और अभिजीत मुहूर्त दोपहर के समय और भद्रा समाप्ति के तुरंत बाद शुरू होगा। इस दिन सुबह जल्दी उठकर पवित्र स्नान करें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। इसके बाद अपने घर के ईशान कोण में वेद माता गायत्री और भगवान ब्रह्मा की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। माता गायत्री को पीले फूल, अक्षत, धूप और चंदन अर्पित करें। इसके बाद पूरे विधि-विधान से गायत्री महामंत्र “ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्” का कम से कम तीन माला या 108 बार जाप अवश्य करें। शाम के समय दीपदान करने और सात्विक फलाहार ग्रहण करने से मां गायत्री की असीम कृपा आपके पूरे परिवार पर साल भर बनी रहेगी।
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