
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से प्रारंभ हुआ दस दिवसीय गणेश जन्मोत्सव अपने अंतिम और सबसे भावुक पड़ाव पर पहुंच चुका है। अनंत चतुर्दशी का पावन दिन विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश की विदाई और उनके पवित्र विसर्जन का साक्षी बनता है। दस दिनों तक घरों, सोसायटियों और विशाल पंडालों में परिवार के सदस्य और परम पूज्य अतिथि की भांति विराजमान रहने के बाद बप्पा अब अपने दिव्य धाम लौटने की तैयारी में हैं। अनंत चतुर्दशी का धार्मिक महत्व इसलिए भी दोगुना हो जाता है क्योंकि इसी दिन सृष्टि के पालनकर्ता भगवान श्री हरि विष्णु के अनंत स्वरूप की आराधना की जाती है और भक्त अपनी भुजा पर चौदह गांठों वाला रक्षासूत्र यानी अनंता धारण करते हैं। एस्ट्रोपत्री के जाने-माने वैदिक ज्योतिषाचार्य चंद्रेश शर्मा के अनुसार, इस दिन एक साथ दो बड़े धार्मिक पर्व होने के कारण श्रद्धालुओं को समय प्रबंधन और शास्त्रीय मुहूर्त का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है, ताकि पूजा-अर्चना और विसर्जन दोनों कार्य पूर्ण निष्ठा और विधि-विधान से संपन्न हो सकें।
ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर अनंत चतुर्दशी यानी शुक्रवार, 25 सितंबर 2026 को गणपति विसर्जन के लिए दिन और रात में चार बेहद कल्याणकारी चौघड़िया मुहूर्त प्राप्त हो रहे हैं। श्रद्धालु अपनी सुविधानुसार इनमें से किसी भी अनुकूल समय का चयन कर सकते हैं।
प्रातः कालीन मुहूर्त (चर, लाभ और अमृत चौघड़िया): सुबह 06 बजकर 11 मिनट से लेकर सुबह 10 बजकर 42 मिनट तक का समय विसर्जन के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। इस समय चर, लाभ और अमृत की अमृतमयी त्रिवेणी सक्रिय रहेगी, जो पारिवारिक सुख, व्यापारिक वृद्धि और आरोग्य के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है।
मध्याह्न कालीन मुहूर्त (शुभ चौघड़िया): दोपहर 12 बजकर 13 मिनट से दोपहर 01 बजकर 44 मिनट तक शुभ का चौघड़िया रहेगा। जो भक्त दोपहर के समय बप्पा की भव्य शोभायात्रा निकालकर विसर्जन करना चाहते हैं, उनके लिए यह समय मंगलकारी परिणाम देने वाला है।
सायंकालीन मुहूर्त (चर चौघड़िया): शाम 04 बजकर 45 मिनट से शाम 06 बजकर 15 मिनट तक चर चौघड़िया रहेगा। गोधूलि वेला से ठीक पहले का यह समय उन परिवारों और सार्वजनिक समितियों के लिए अत्यंत शुभ है जो ढोल-नगाड़ों और गुलाल के साथ शाम को विसर्जन यात्रा पूर्ण करते हैं।
रात्रि कालीन मुहूर्त (लाभ चौघड़िया): रात 09 बजकर 14 मिनट से रात 10 बजकर 44 मिनट तक लाभ का चौघड़िया रहेगा। रात के समय विसर्जन करने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह कालखंड समृद्धि और मनोवांछित फल प्रदान करने वाला सिद्ध होगा।
गणपति प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जाने से पहले घर के मंदिर और पूजा स्थल की गंगाजल से पवित्रता सुनिश्चित करें। विसर्जन से पूर्व भगवान गणेश की षोडशोपचार या पंचोपचार विधि से अंतिम पूजा संपन्न की जानी चाहिए। सबसे पहले बप्पा को रोली, चंदन, अक्षत और सिंदूर का तिलक लगाएं। इसके पश्चात उन्हें अत्यंत प्रिय 21 दूर्वा दल, लाल गुड़हल या गेंदे के ताजे पुष्प और सुगंधित इत्र अर्पित करें। भोग के रूप में मोदक, बेसन के लड्डू, पंचमेवा और ताजे मौसमी फल जैसे केला व अनार निवेदित करें। धूप और दीप प्रज्वलित कर पूरे परिवार के साथ भगवान गणेश की पारंपरिक आरती गाएं। पूजा के समापन पर दोनों हाथ जोड़कर जाने-अनजाने में हुई किसी भी प्रकार की भूल, त्रुटि या अनादर के लिए विनम्रतापूर्वक ‘क्षमा याचना’ मंत्र या प्रार्थना पढ़ें, ताकि दस दिनों के आतिथ्य में यदि कोई कमी रह गई हो तो भगवान गणेश उसे क्षमा कर अपनी असीम कृपा परिवार पर बनाए रखें।
गणेश पुराण और सनातन मान्यताओं के अनुसार गणपति बप्पा केवल एक प्रतिमा नहीं बल्कि साक्षात घर आए देव अतिथि होते हैं। जिस प्रकार किसी प्रिय अतिथि को विदा करते समय यात्रा के लिए भोजन और आवश्यक सामग्री सम्मानपूर्वक दी जाती है, उसी परंपरा के अनुसार बप्पा के विसर्जन से पूर्व ‘पाथेय’ यानी यात्रा भोजन की एक विशेष पोटली तैयार की जाती है। एक साफ पीले या लाल सूती कपड़े में थोड़े अक्षत, दुर्वा, एक सुपारी, हल्दी की गांठ, कुछ दक्षिणा (सिक्के) और मोदक या लड्डू बांधकर उस पोटली को बप्पा की प्रतिमा के साथ सुरक्षित बांधा जाता है, ताकि उनकी यात्रा मंगलमय हो। विसर्जन यात्रा आरंभ करने से ठीक पहले प्रतिमा को उसके स्थापित स्थान से उत्तर दिशा की ओर थोड़ा सा खिसका दिया जाता है, जिसे ‘स्थान परिवर्तन’ कहा जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि पूजा पूर्ण हो चुकी है और अब विसर्जन की यात्रा प्रारंभ हो रही है।
आधुनिक समय में धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्रकृति और जलस्रोतों की स्वच्छता का ध्यान रखना भी प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। यदि आपने घर पर मिट्टी के ईको-फ्रेंडली बप्पा स्थापित किए हैं, तो घर की बालकनी या आंगन में किसी बड़े पवित्र जलपात्र अथवा गमले में विसर्जन संपन्न करना सबसे उत्तम माना गया है। बाद में उस पवित्र जल और मिट्टी को घर के तुलसी या अन्य पौधों में समाहित किया जा सकता है। यदि विसर्जन किसी नदी, नहर या सार्वजनिक तालाब में किया जा रहा है, तो प्रतिमा को जल में फेंकने के बजाय दोनों हाथों से धीरे-धीरे और आदरपूर्वक जल के प्रवाह में विसर्जित करें। विसर्जन के समय ‘गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ’ के मंगल उद्घोष के साथ बप्पा से प्रार्थना करें कि वे घर के सारे कष्ट, विघ्न और नकारात्मकता अपने साथ ले जाएं और परिवार को सुख, शांति व अक्षय समृद्धि का वरदान दें।
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