गंगोत्री धाम: दो दिन बाद शुरू होंगे मां गंगा के ‘श्रृंगार दर्शन’; गंगा सप्तमी पर 11,000 दीपों से जगमगाएगी भागीरथी

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Prabhat Vaibhav, Digital Desk : विश्व प्रसिद्ध गंगोत्री धाम में सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार, अगले दो दिनों में मां गंगा के ‘निर्वाण दर्शन’ समाप्त होंगे और ‘श्रृंगार दर्शन’ की शुरुआत होगी। अक्षय तृतीया पर कपाट खुलने के बाद से अब तक श्रद्धालु मां गंगा की मूल पाषाण प्रतिमा के दर्शन कर रहे थे, लेकिन गंगा सप्तमी के पावन पर्व से मां का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा।

निर्वाण से श्रृंगार दर्शन तक का सफर

गंगोत्री धाम में अक्षय तृतीया से गंगा सप्तमी के बीच की अवधि बेहद खास मानी जाती है:

निर्वाण दर्शन: कपाट खुलने के शुरुआती दिनों में मां गंगा की मूल पाषाण प्रतिमा के दर्शन होते हैं, जिसे ‘निर्वाण दर्शन’ कहा जाता है। मान्यता है कि इस मूल स्वरूप के दर्शन से सभी दुखों का निवारण होता है।

गंगा सप्तमी (23 अप्रैल): मां गंगा के जन्मोत्सव के दिन ब्रह्ममुहूर्त में पाषाण प्रतिमा की विशेष पूजा-अर्चना होगी। गंगा लहरी और श्री गंगा सहस्रनाम पाठ के बाद मां का भव्य श्रृंगार किया जाएगा।

स्वर्ण विग्रह: पूजा के बाद सोने से निर्मित मां गंगा की ‘चहविग्रह भोग मूर्ति’ को श्रृंगार के साथ मंदिर के मुख्य गर्भगृह में स्थापित कर दिया जाएगा, जिसके बाद भक्त पूरे सीजन मां के श्रृंगार स्वरूप के दर्शन कर सकेंगे।

11,000 दीपों का महा-दान

श्री गंगाजी सेवा ट्रस्ट (मुखवा) की ओर से मां गंगा के शीतकालीन प्रवास मार्कण्डेयपुरी में 23 अप्रैल को भव्य ‘श्री गंगा सप्तमी महापर्व महोत्सव’ आयोजित किया जा रहा है।

दीपदान: मां गंगा की पवित्र धारा में वेद मंत्रों के बीच 11,000 दीपों का दान किया जाएगा, जिससे पूरी भागीरथी घाटी रोशनी से सराबोर हो उठेगी।

धार्मिक अनुष्ठान: महोत्सव के दौरान अखंड रामायण पाठ, श्री गंगोत्पत्ति महात्म्य का मूल पाठ, महाभिषेक, हवन और विशेष आरती का आयोजन होगा।

सांस्कृतिक कार्यक्रम: संस्कृत विभाग की टीम द्वारा सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी जाएंगी और विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वाली विभूतियों को सम्मानित किया जाएगा।

गंगोत्री मंदिर का ऐतिहासिक महत्व

श्री पांच गंगोत्री मंदिर समिति के सचिव सुरेश सेमवाल के अनुसार, वर्तमान मंदिर का निर्माण 18वीं सदी में गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा ने करवाया था। बाद में 20वीं सदी के प्रारंभ में जयपुर के महाराजा माधोसिंह ने इसका जीर्णोद्धार कराया। सदियों से यहां गंगा सप्तमी तक ही मूल पाषाण प्रतिमा के दर्शन की परंपरा जीवित है।