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कौन हैं लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय? श्रीनगर को बचाने के लिए हुए शहीद

भारतीय थल सेना हर साल 27 अक्टूबर को ‘इंफेंट्री डे’ (Infantry Day) यानी पैदल सेना दिवस के रूप में बेहद गर्व और सम्मान के साथ मानती है। यह ऐतिहासिक दिन केवल सैन्य परेडों या औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के उस पहले और महान सैन्य पराक्रम की याद दिलाता है जिसने कश्मीर को पाकिस्तान के कब्जे में जाने से बचाया था। 27 अक्टूबर 1947 का दिन देश के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है, जब भारतीय सेना के जांबाज सैनिकों ने श्रीनगर हवाई अड्डे पर कदम रखकर पाकिस्तानी कबाइलियों और सेना के नापाक मंसूबों को मिट्टी में मिला दिया था। इस ऐतिहासिक और साहसिक सैन्य ऑपरेशन के असली नायक थे 1 सिख रेजीमेंट के कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय (Lieutenant Colonel Dewan Ranjit Rai)। वे स्वतंत्र भारत के पहले ऐसे महान जांबाज अफसर बने जिन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार ‘महावीर चक्र’ (Maha Vir Chakra) से मरणोपरांत सम्मानित किया गया था।

15 अगस्त 1947 को देश की आजादी के महज दो महीने बाद ही पाकिस्तान ने धोखेबाजी और नापाक मंसूबों का सहारा लेते हुए जम्मू-कश्मीर पर हमला बोल दिया था। पाकिस्तानी सेना की शह पर हजारों सशस्त्र कबीलाई (लश्कर) बारामूला और पट्टन को तबाह करते हुए सीधे श्रीनगर की ओर बढ़ रहे थे। कश्मीर के महाराजा हरि सिंह द्वारा भारत में विलय पत्र (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर करते ही, भारत सरकार ने बिना एक पल गंवाए सेना को रवाना करने का फैसला किया। 27 अक्टूबर 1947 की तड़के सुबह नई दिल्ली के पालम हवाई अड्डे से भारतीय वायुसेना के डकोटा विमानों में 1 सिख रेजीमेंट की टुकड़ी को लेकर लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय श्रीनगर के लिए रवाना हुए। उस समय श्रीनगर हवाई अड्डे की स्थिति पूरी तरह अनिश्चित थी और यह भी पक्का नहीं था कि हवाई पट्टी भारत के नियंत्रण में है या दुश्मन ने उस पर कब्जा कर लिया है। अपनी जान की परवाह न करते हुए कर्नल राय ने अपनी टुकड़ी के साथ श्रीनगर एयरपोर्ट पर सफल लैंडिंग की और तुरंत कमान संभाली।

श्रीनगर एयरपोर्ट पर उतरते ही लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय ने स्थिति का त्वरित आकलन किया और एक बेहद साहसिक व रणनीतिक फैसला लिया। वे जानते थे कि केवल हवाई अड्डे की सुरक्षा में बैठे रहने से श्रीनगर शहर को नहीं बचाया जा सकता, क्योंकि दुश्मन की विशाल फौज तेजी से आगे बढ़ रही थी। कर्नल राय अपनी बेहद छोटी सैन्य टुकड़ी के साथ तुरंत बारामूला की ओर बढ़े और पट्टन के पास एक सामरिक मोर्चे पर अपनी स्थिति मजबूत कर ली। उनके पास सैनिकों की संख्या और हथियार दुश्मन की तुलना में बेहद कम थे, लेकिन उनका हौसला और देशप्रेम अटूट था। उन्होंने कबाइलियों के भीषण हमलों का मुंहतोड़ जवाब दिया और उन्हें कई घंटों तक रोके रखा। कर्नल राय का यह साहसिक कदम इतिहास में निर्णायक साबित हुआ, क्योंकि इसने नई दिल्ली से भारतीय सेना की और अधिक रीइन्फोर्समेंट (अतिरिक्त सैन्य टुकड़ियों) और रसद सामग्री के श्रीनगर पहुंचने के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय खरीद लिया।

दुश्मन की भारी गोलीबारी और तोपखाने के हमलों के बीच अपने जवानों का हौसला बढ़ाते हुए लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय ने सामने से अपनी टुकड़ी का नेतृत्व किया। बारामूला के पास मोर्चे की रक्षा करते समय दुश्मन की एक गोली कर्नल राय को जा लगी और मातृभूमि की रक्षा करते हुए वे वीरगति को प्राप्त हो गए। उनका यह सर्वोच्च बलिदान व्यर्थ नहीं गया; उनकी शहादत ने भारतीय सेना को वह बहुमूल्य समय दिया जिससे सुचितगढ़ और पट्टन के युद्ध में पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ दिया गया और श्रीनगर पूरी तरह सुरक्षित हो गया। लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय की असाधारण वीरता, उत्कृष्ट नेतृत्व और अद्वितीय देशभक्ति के लिए भारत सरकार ने उन्हें स्वतंत्र भारत के प्रथम ‘महावीर चक्र’ (मरणोपरांत) से अलंकृत किया।

हर साल इंफेंट्री डे के अवसर पर पूरा देश और भारतीय थल सेना का प्रत्येक जवान लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय और उनके साथ शहीद हुए वीर जवानों की शहादत को नमन करता है। कर्नल राय की दूरदर्शिता और निडरता ही थी जिसके कारण आज जम्मू-कश्मीर भारत का मुकुटमणि और अभिन्न अंग बना हुआ है। उनकी यह कहानी केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं है, बल्कि यह हर भारतीय नागरिक और सेना के हर युवा सैनिक के दिल में देशभक्ति का जज्बा पैदा करती है। आज भी जब देश की सीमाओं पर चुनौती आती है, तो 1 सिख रेजीमेंट और भारतीय इंफेंट्री के जवान कर्नल दीवान रंजीत राय के उसी अदम्य साहस को याद कर दुश्मन को धूल चटाने के लिए तत्पर रहते हैं।