
भारतीय खानपान में दाल को प्रोटीन, आवश्यक अमीनो एसिड्स, डाइटरी फाइबर, आयरन और जिंक का सबसे प्रमुख स्रोत माना जाता है। शाकाहारी आहार में मांसपेशियों की मजबूती और शारीरिक ऊर्जा के लिए दालें सबसे अहम भूमिका निभाती हैं। अक्सर लोग स्वाद के आधार पर किसी भी समय कोई भी दाल पकाकर खा लेते हैं, लेकिन मेडिकल न्यूट्रिशन और आयुर्वेद के अनुसार हर दाल की प्रकृति, तासीर और पचने का समय (Digestibility) अलग-अलग होता है। यदि आप भारी दाल रात में खाते हैं, तो इससे पेट में गैस, ब्लोटिंग, खट्टी डकार और अपच जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए यह समझना बेहद जरूरी है कि दोपहर के लंच में कौन सी दाल खानी चाहिए और रात के डिनर में किसका सेवन सबसे उत्तम है।
दोपहर के समय हमारे शरीर की पाचन अग्नि (Digestive Fire) सबसे तेज और सक्रिय होती है। इस समय भारी और कॉम्प्लेक्स प्रोटीन वाली दालों को पचाना शरीर के लिए आसान होता है।
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अरहर (तुअर) दाल: उत्तर और दक्षिण भारत में सबसे ज्यादा खाई जाने वाली अरहर की दाल पोषण से भरपूर होती है, लेकिन इसमें मौजूद कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट को पचने में अधिक समय लगता है। इसे हमेशा दोपहर के भोजन में ही खाना चाहिए।
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चना दाल: चना दाल प्रोटीन और फाइबर से भरपूर होती है और इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स काफी कम होता है। चूंकि यह पचने में भारी होती है, इसलिए इसका सेवन दोपहर के लंच में करना सबसे सही है। यह डायबिटीज के मरीजों के लिए लंबे समय तक पेट भरा रखने में मदद करती है।
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उड़द दाल: उड़द की दाल (चाहे काली हो या धुली) तासीर में भारी और कफ-पित्त को बढ़ाने वाली मानी जाती है। इसका सेवन कभी भी रात के समय नहीं करना चाहिए। इसे दोपहर में ही हींग, अदरक और जीरे के तड़के के साथ खाएं।
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राजमा और छोले: हालांकि ये फलियों (Legumes) की श्रेणी में आते हैं, लेकिन भारी प्रोटीन होने की वजह से इन्हें केवल लंच में ही शामिल करें ताकि दिनभर की शारीरिक गतिविधि में ये आसानी से पच सकें।
रात के समय हमारा मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है और पेट के डाइजेस्टिव एंजाइम्स का स्राव कम होने लगता है। ऐसे में डिनर में हमेशा हल्की, सुपाच्य और वात-शामक दालों का ही चयन करना चाहिए।
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मूंग दाल (पीली धुली या हरी छिलके वाली): मूंग दाल को सभी दालों की ‘रानी’ और सबसे सुपाच्य दाल माना जाता है। इसमें भारीपन नहीं होता और यह आंतों पर बिल्कुल दबाव नहीं डालती। रात के खाने में मूंग दाल या मूंग दाल की पतली खिचड़ी खाना पेट, आंतों और गहरी नींद के लिए सबसे उत्तम विकल्प है।
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लाल मसूर दाल: मसूर दाल बहुत जल्दी गलती है और आसानी से पच जाती है। इसमें आयरन और फोलेट प्रचुर मात्रा में होते हैं। यदि आपको रात में हल्की दाल खानी है, तो मसूर दाल का एक बाउल सूप या पतली दाल रोटी के साथ ले सकते हैं।
बहुत से लोगों को दाल खाते ही पेट फूलने या यूरिक एसिड बढ़ने का डर रहता है। न्यूट्रिशनिस्ट्स के अनुसार दाल बनाने की सही विधि अपनाकर इन समस्याओं से पूरी तरह बचा जा सकता है:
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दाल को पहले भिगोना (Soaking): किसी भी दाल को पकाने से पहले कम से कम 30 मिनट से 2 घंटे तक (चने और राजमा को 6-8 घंटे) पानी में जरूर भिगोएं। भिगोने से दाल में मौजूद फाइटिक एसिड (Phytic Acid) और एंटी-न्यूट्रिएंट्स निकल जाते हैं, जिससे पोषक तत्वों का अवशोषण बढ़ जाता है और गैस नहीं बनती।
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झाग निकालना (Skimming): कुकर या खुले बर्तन में उबालते समय दाल के ऊपर जो सफेद फेन/झाग बनता है, उसे चम्मच से निकालकर फेंक दें। यह प्यूरीन और अतिरिक्त स्टार्च होता है, जो जोड़ों के दर्द और गैस का कारण बनता है।
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पाचक मसालों का तड़का: दाल में हमेशा हींग, जीरा, लहसुन, कद्दूकस किया हुआ अदरक और थोड़ी सी हल्दी का तड़का लगाएं। ये सामग्रियां दाल की वायुवर्धक प्रकृति को शांत करती हैं।
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हाई यूरिक एसिड / गाउट: यदि खून में यूरिक एसिड बढ़ा हुआ है, तो साबुत उड़द, गाढ़ी चना दाल और अत्यधिक राजमा का सेवन सीमित करें। डॉक्टर की सलाह पर हल्की मूंग दाल लें।
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किडनी रोग (CKD): किडनी के मरीजों में पोटैशियम और फास्फोरस का स्तर बढ़ जाता है, इसलिए उन्हें बिना नेफ्रोलॉजिस्ट की सलाह के हाई-प्रोटीन गाढ़ी दालों का सेवन नहीं करना चाहिए।
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आईबीएस (IBS) या कमजोर पाचन: कमजोर पाचन वाले लोगों को रात में केवल छिलके वाली मूंग दाल का पानी या पतली दाल ही लेनी चाहिए।
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