कार में कूलेंट कम होने पर भी चलाते रहे गाड़ी तो इंजन हो सकता है पूरी तरह सीज; लाखों के भारी नुकसान से बचने के लिए जानिए ये बड़े संकेत और बचाव के उपाय

ऑटो डेस्क ग्राउंड रिपोर्ट:  गर्मियों के मौसम में या लंबी दूरी के सफर पर निकलते वक्त अक्सर लोग कार के टायर, ब्रेक और पेट्रोल-डीजल की जांच तो कर लेते हैं, लेकिन इंजन कम्पार्टमेंट में मौजूद कूलेंट (Coolant) के स्तर पर ध्यान देना भूल जाते हैं। ऑटोमोबाइल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इंजन ऑयल की तरह ही कूलेंट कार के इंजन की लाइफलाइन होता है। जब कार चलती है, तो इंजन के कंबशन चैंबर में ईंधन के जलने से अत्यधिक तापमान पैदा होता है। यदि कूलिंग सिस्टम में कूलेंट का स्तर न्यूनतम निशान (Min Mark) से नीचे चला जाए, तो इंजन का तापमान अनियंत्रित रूप से बढ़ जाता है। लगातार ऐसी स्थिति में गाड़ी चलाने से न केवल माइलेज गिरता है, बल्कि इंजन पूरी तरह डेड होकर लाखों रुपये की चपत लगा सकता है।

कार में कूलेंट का असली काम: सिर्फ पानी क्यों नहीं है इसका विकल्प? कई कार चालक यह गलती करते हैं कि कूलेंट कम होने पर उसमें सादा नल का पानी भर देते हैं। कूलेंट मुख्य रूप से एथिलीन ग्लाइकॉल या प्रोपलीन ग्लाइकॉल और डिस्टिल्ड वॉटर का एक विशेष रासायनिक मिश्रण होता है। इसके मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं:

  • तापमान नियंत्रण: यह सामान्य पानी की तुलना में काफी ऊंचे तापमान (100°C से अधिक) पर भी उबलता नहीं है और इंजन की अत्यधिक गर्मी को सोखकर रेडिएटर के जरिए बाहर निकालता है।

  • एंटी-फ्रीज गुण: अत्यधिक ठंड या पहाड़ी इलाकों में यह माइनस तापमान पर भी इंजन के कूलिंग चैंबर में जमता नहीं है।

  • जंग और स्केलिंग से बचाव: कूलेंट में मौजूद जंग-रोधी (Anti-corrosion) तत्व रेडिएटर, वाटर पंप और इंजन ब्लॉक के आंतरिक हिस्सों में जंग लगने और कैल्शियम जमने से रोकते हैं।

कूलेंट कम होने पर इंजन के साथ क्या होता है? यदि कूलेंट का स्तर कम है और आप गाड़ी चलाते जा रहे हैं, तो इंजन पर सिलसिलेवार तरीके से गंभीर प्रभाव पड़ते हैं:

  • इंजन ओवरहीटिंग (Overheating): कूलिंग सिस्टम इंजन की गर्मी को नियंत्रित नहीं कर पाता, जिससे डैशबोर्ड पर टेम्परेचर गेज ‘H’ (High) मार्क को छूने लगता है।

  • हेड गैस्केट का फटना (Blown Head Gasket): अत्यधिक गर्मी के कारण इंजन ब्लॉक और सिलेंडर हेड के बीच लगी हेड गैस्केट पिघल या फट जाती है। इसके फटने से कूलेंट और इंजन ऑयल आपस में मिल जाते हैं, जिससे इंजन का पूरा इंटरनल लुब्रिकेशन सिस्टम बर्बाद हो जाता है।

  • सिलेंडर हेड का मुड़ना (Warped Cylinder Head): धातु से बना इंजन का ऊपरी हिस्सा (सिलेंडर हेड) अत्यधिक तापमान के दबाव में झुक या विकृत हो जाता है, जिसे ठीक करने के लिए पूरे इंजन को खोलना पड़ता है।

  • इंजन सीज होना (Engine Seizure): जब तापमान चरम सीमा पार कर जाता है, तो पिस्टन फैलकर सिलेंडर की दीवारों के साथ लॉक हो जाते हैं। इसे ‘इंजन सीज’ होना कहते हैं, जिसके बाद इंजन को पूरी तरह रीबिल्ड या बदलना पड़ता है।

कार में कूलेंट कम होने के प्रमुख संकेत और लक्षण ड्राइविंग के दौरान इन संकेतों पर ध्यान देकर बड़े नुकसान से समय रहते बचा जा सकता है:

  • डैशबोर्ड पर टेम्परेचर वॉर्निंग लाइट: मीटर कंसोल में थर्मामीटर या रेडिएटर जैसा लाल/पीला सिंबल जलने लगना।

  • एसी (AC) का सही काम न करना: जब इंजन ओवरहीट होता है, तो सिस्टम खुद को बचाने के लिए एसी कंप्रेसर को कट-ऑफ कर देता है, जिससे ब्लोअर से केवल गर्म हवा आने लगती है।

  • बोनट से भाप या धुआं निकलना: रेडिएटर या कूलेंट टैंक से अत्यधिक दबाव के कारण उबलते कूलेंट की भाप बाहर आना।

  • कार के नीचे मीठी गंध या रंगीन रिसाव: कार के नीचे जमीन पर हरा, गुलाबी या नीला तरल टपकना, जिसकी हल्की मीठी सी गंध होती है।

सफर के दौरान कूलेंट कम हो जाए तो क्या करें और क्या न करें? अगर ड्राइविंग के दौरान अचानक ओवरहीटिंग का संकेत दिखे, तो इन बातों का विशेष ध्यान रखें:

  • गाड़ी को तुरंत सुरक्षित स्थान पर साइड में खड़ा करें और इंजन बंद कर दें।

  • गर्म इंजन पर रेडिएटर कैप कभी न खोलें: उबलता हुआ कूलेंट फव्वारे की तरह बाहर निकलकर चेहरे और हाथों को गंभीर रूप से जला सकता है। इंजन को कम से कम 30 से 45 मिनट ठंडा होने दें।

  • इंजन ठंडा होने के बाद ही ट्रांसपेरेंट कूलेंट रिजर्वायर टैंक का ढक्कन खोलें।

  • आपात स्थिति में यदि कूलेंट उपलब्ध न हो, तो केवल डिस्टिल्ड वॉटर या सामान्य पीने का साफ पानी डालकर नजदीकी वर्कशॉप तक गाड़ी धीरे-धीरे ले जाएं और वहां तुरंत प्रॉपर कूलेंट फ्लश व रीफिल करवाएं।

नियमित अंतराल पर अपनी कार के कूलेंट लेवल और होज पाइप्स में होने वाले लीकेज की जांच करना एक समझदार कार मालिक की पहचान है, जो आपको किसी बड़े वित्तीय नुकसान और बीच रास्ते में फंसने से बचाता है।