
जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले से एक दिल दहला देने वाली और झकझोर देने वाली घटना सामने आई है, जहां सुरनकोट तहसील के लोअर मुरान गांव में प्रकृति के कहर ने एक हंसते-खेलते परिवार को पलभर में नेस्तनाबूद कर दिया। सऊदी अरब में 27 साल तक कड़ी मेहनत और खून-पसीना एक कर मोहम्मद लतीफ ने बड़े अरमानों से एक शानदार आशियाना बनाया था, जिसे स्थानीय लोग प्यार से ‘ताजमहल’ पुकारते थे। लेकिन एक रात की मूसलाधार बारिश और बादल फटने की घटना ने इस सपनों के महल को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया और लतीफ की झोली में जिंदगी भर का कभी न भरने वाला दर्द छोड़ गया।
आधी रात की वह काली रात और एहतियात का एक फैसला
यह खौफनाक हादसा रविवार को उस वक्त हुआ जब जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती पुंछ और राजौरी जिलों में भारी बारिश ने कहर बरपाना शुरू किया। रात के करीब साढ़े तीन बज रहे थे जब अचानक मूसलाधार बारिश ने विकराल रूप ले लिया। बुजुर्ग मोहम्मद लतीफ ने एहतियात बरतते हुए सोचा कि उनकी एसयूवी कार को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा देना चाहिए। बस यही एक फैसला उनके लिए जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ बन गया। जैसे ही वे कार बाहर निकालने के लिए घर से निकले, कुछ ही मिनटों बाद बादल फटने से आए सैलाब, भारी मलबे और विशाल पत्थरों ने नाले के किनारे बने उनके तीन मंजिला मकान को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर दिया।
सऊदी की 27 साल की कमाई और परिवार के 8 सदस्यों का उजड़ना
महज एक इत्तेफाक था कि मोहम्मद लतीफ कार बाहर निकालने की वजह से इस जानलेवा हादसे की चपेट में आने से बच गए। उनका बड़ा बेटा उस समय पढ़ाई के सिलसिले में जम्मू में था, इसलिए उसकी भी जान सुरक्षित बच गई। लेकिन घर के अंदर सो रहे परिवार के बाकी आठ सदस्यों को बचने का मौका तक नहीं मिला। इस भीषण त्रासदी में लतीफ ने अपनी 59 वर्षीय पत्नी नूर सफिया, बेटे सज्जाद अहमद (16), हकनवाज़ अहमद (11), शाहनवाज़ अहमद (11), बेटी खालिदा कौसर, यासर इकबाल की पत्नी और दो साल के मासूम पोते सोफियान को हमेशा के लिए खो दिया। इसके अलावा उनके रिश्तेदार बानो बी और मोहम्मद अकरम भी इस मलबे की भेंट चढ़ गए। लतीफ का कहना है कि उन्होंने सऊदी अरब में 27 साल तक मजदूरी करके एक-एक पाई जोड़ी थी ताकि बच्चों का भविष्य संवर सके और वे अच्छी शिक्षा पा सकें।
अपनों के शवों के लिए मदद की गुहार लगाता बेबस पिता
इस समय सब कुछ गंवा चुके मोहम्मद लतीफ पूरी तरह टूट चुके हैं। उनका दर्द सिर्फ घर टूटने का नहीं, बल्कि अपने परिवार के उन सदस्यों के शवों को आखिरी बार देखने का है जो अभी भी मुर्रा-बुफलियाज गांव में भारी मलबे के नीचे दबे हुए हैं। अब तक केवल तीन शव ही निकाले जा सके हैं, जबकि पांच सदस्यों के शव अभी भी मलबे में दबे हैं। लतीफ रुंधे गले से प्रशासन और सरकार से गुहार लगा रहे हैं कि इलाके में तुरंत बड़ी जेसीबी मशीनें पहुंचाई जाएं ताकि विशाल पत्थरों को हटाया जा सके। अकेले ग्रामीणों के लिए इन चट्टानों को हटाना नामुमकिन है। उनका कहना है कि अगर उनके किसी भी अपने का एक शव भी सुरक्षित मिल जाए, तो यह उनके लिए दुनिया की सबसे बड़ी नेमत होगी।
बचाव कार्य में आ रही भारी बाधाएं
प्रशासन और विभिन्न राहत एजेंसियां लगातार बचाव अभियान चलाने में जुटी हुई हैं, लेकिन प्राकृतिक आपदा के कारण रास्ते पूरी तरह अवरुद्ध हो चुके हैं। भूस्खलन की वजह से मुर्रा गांव तक जाने वाली संपर्क सड़कें कई जगहों पर बंद पड़ी हैं, जिससे भारी खुदाई वाली मशीनें और जेसीबी एक्सकेवेटर समय पर घटनास्थल तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। हालांकि प्रशासनिक अधिकारी लगातार रास्ता साफ करने और मलबे के नीचे दबे लापता लोगों को ढूंढने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं, लेकिन वक्त बीतने के साथ अपनों के जिंदा या सही सलामत मिलने की उम्मीदें अब धूमिल पड़ती जा रही हैं।
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