
मुंबई। बॉलीवुड में अपनी पहली ही फिल्म से दर्शकों और समीक्षकों के दिलों पर छाप छोड़ने वाली प्रतिभाशाली अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा ने हाल ही में अपने करियर को लेकर बेहद चौंकाने वाले और बेबाक खुलासे किए हैं। लगभग 15 साल से हिंदी सिनेमा में सक्रिय परिणीति ने इंडस्ट्री के उस स्याह और कड़वे सच से पर्दा उठाया है, जिससे हर कोई रूबरू नहीं हो पाता। एक इंटरव्यू के दौरान परिणीति का दर्द साफ छलका जब उन्होंने स्वीकार किया कि करियर के एक दौर में जब उन्हें अच्छा काम मिलना बंद हो गया, तो वह चुपचाप घर बैठ गईं और सालों तक सही अवसर की प्रतीक्षा करती रहीं। उन्होंने बिना किसी झिझक के यह भी स्वीकार किया कि उनकी कुछ रणनीतिक गलतियों, गलत फिल्म चयन और बॉलीवुड की पीआर संस्कृति में न ढल पाने का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा।
‘लेडीज वर्सेस रिक्की बहल’ और ‘इश्कजादे’ जैसी फिल्मों से अपने अभिनय का लोहा मनवाने वाली परिणीति ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (स्पेशल मेंशन) तक अपने नाम किया। एक समय उन्हें बॉलीवुड की अगली सुपरस्टार माना जा रहा था। ‘शुद्ध देसी रोमांस’ और ‘हंसी तो फंसी’ जैसी हिट फिल्मों के बाद उनका करियर अचानक धीमी गति पर आ गया और कई फ्लॉप फिल्मों की कतार लग गई। परिणीति ने बताया कि उस दौर ने उन्हें मानसिक और पेशेवर दोनों स्तरों पर बुरी तरह झकझोरा, लेकिन उन्होंने समझौतावादी भूमिकाएं स्वीकार करने के बजाय खाली बैठना बेहतर समझा।
परिणीति ने अपने संघर्ष के दौर का विश्लेषण करते हुए बताया कि शुरुआती अपार सफलता के बाद उन्हें इंडस्ट्री के कई वरिष्ठों और सलाहकारों ने यह समझाना शुरू कर दिया कि उन्हें पारंपरिक कमर्शियल और ग्लैमरस भूमिकाएं करनी चाहिए। परिणीति के मुताबिक, उन्होंने अपनी आंतरिक कलात्मक समझ और स्वाभाविक सहजता को नजरअंदाज करके दूसरों की सलाह पर कई ऐसी फिल्में साइन कर लीं, जिनकी स्क्रिप्ट्स पर उन्हें खुद पूरा भरोसा नहीं था।
इनमें से कई बड़े बजट की व्यावसायिक फिल्में बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरीं। परिणीति का कहना है कि जब कोई फिल्म फ्लॉप होती है, तो उसका सारा ठीकरा अभिनेत्री के सिर फोड़ दिया जाता है। उस दौर में उन्होंने अपने आत्मविश्वास को टूटते देखा। परिणीति ने माना कि वह दूसरों के बताए फॉर्मूले के पीछे भागने लगी थीं, जिससे उनकी पहचान पर गहरा असर पड़ा और उन्हें यह समझने में काफी वक्त लगा कि उनका मजबूत पक्ष कंटेंट-ड्रिवन और मजबूत किरदारों वाली कहानियां थीं।
बॉलीवुड के काम करने के तौर-तरीकों पर प्रकाश डालते हुए परिणीति ने एक और कड़वी सच्चाई साझा की। उन्होंने बताया कि वह कभी भी ‘बॉलीवुड इनर सर्कल’, देर रात की पार्टियों या दिखावे वाले पीआर (Public Relations) गेम का हिस्सा नहीं बन सकीं। वह काम खत्म करके सीधे घर जाने और अपने निजी जीवन में सीमित रहने वाली इंसान रही हैं।
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कैंप और गुटबाजी से दूरी: परिणीति के अनुसार, इंडस्ट्री में बहुत सा काम पार्टियों में मिलने, निर्देशकों के लगातार संपर्क में रहने और खास गुटों का हिस्सा बनने से तय होता है। वह कभी काम मांगने के लिए निर्देशकों के पास बार-बार कॉल करने या ऑफिसों के चक्कर लगाने में सहज महसूस नहीं करती थीं।
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दिखावे की संस्कृति: उन्होंने कहा कि जब वह परदे पर नहीं दिख रही थीं, तब भी मीडिया में बने रहने के लिए फर्जी रिलेशनशिप की खबरें या एयरपोर्ट लुक्स जैसे पीआर हथकंडे अपनाना उनके स्वभाव के खिलाफ था। उनकी यह स्वाभाविकता धीरे-धीरे उनके लिए नुकसानदेह साबित हुई क्योंकि इंडस्ट्री में ‘आउट ऑफ साइट, आउट ऑफ माइंड’ का नियम चलता है।
एक लंबे अंतराल और संघर्ष के बाद जब इम्तियाज अली की फिल्म ‘अमर सिंह चमकीला’ में परिणीति को ‘अमरजोत कौर’ का किरदार निभाने का मौका मिला, तो उन्होंने साबित कर दिया कि उनका हुनर कभी कम नहीं हुआ था। दिलजीत दोसांझ के साथ उनकी अदाकारी और लाइव गायकी की देशभर में जबर्दस्त सराहना हुई।
परिणीति ने कहा कि ‘चमकीला’ उनके लिए केवल एक फिल्म नहीं थी, बल्कि यह उनके अभिनय के प्रति प्रेम की पुनर्खोज थी। इस फिल्म ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि दर्शक आज भी केवल सच्ची अदाकारी और प्रामाणिक किरदारों को सलाम करते हैं। अब वह फिल्मों की संख्या बढ़ाने के बजाय केवल उन प्रोजेक्ट्स को चुन रही हैं जो उनके दिल को छूते हैं और जिनमें उन्हें अपनी पूरी कलात्मक ऊर्जा झोंकने का अवसर मिलता है।
अपने करियर के इस 15 साल के सफर को परिणीति एक बेहतरीन शिक्षक मानती हैं। उनका मानना है कि गिरकर संभलना ही जीवन की सबसे बड़ी सीख है। युवा अभिनेताओं और कलाकारों को संदेश देते हुए उन्होंने कहा:
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कभी भी अपनी आंतरिक आवाज और स्वाभाविक पहचान को दूसरों के बनाए खांचे में फिट करने के लिए न खोएं।
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असफलताएं करियर का अंत नहीं होतीं; जब बुरा दौर आए, तो आत्ममंथन करें, अपनी गलतियों को स्वीकारें और खुद को बेहतर बनाने पर काम करें।
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काम न होने पर घबराकर गलत प्रोजेक्ट्स चुनने के बजाय सही वक्त और सही स्क्रिप्ट का इंतजार करने का धैर्य रखें।
परिणीति चोपड़ा का यह सफरनामा इस बात का गवाह है कि फिल्मी चकाचौंध के पीछे भारी अनिश्चितता और अकेलापन छिपा होता है, लेकिन सच्ची प्रतिभा और आत्मसम्मान के बल पर हर मुश्किल दौर को पार किया जा सकता है।
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