
देश में आर्थिक विकास दरों और जीडीपी (GDP) के ताजा आंकड़ों को लेकर राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। कांग्रेस पार्टी ने केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों और महंगाई के मोर्चे पर नाकामी को लेकर जोरदार हमला बोला है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और संचार विभाग के प्रभारी जयराम रमेश ने आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा है कि सरकार जीडीपी के आंकड़ों के जरिए वास्तविक जमीनी हकीकत को छुपाने की कोशिश कर रही है, जबकि देश में महंगाई तेजी से बढ़ रही है और आम आदमी का जीवन मुश्किल होता जा रहा है। विपक्षी दल लगातार यह आरोप लगा रहा है कि आर्थिक तरक्की के जो दावे सरकार की ओर से किए जा रहे हैं, उनका फायदा आम जनता या मध्यम वर्ग तक नहीं पहुंच रहा है, बल्कि आम आदमी रोजमर्रा की चीजों के महंगे होने से बुरी तरह पिस रहा है। इस राजनीतिक बयानबाजी के बाद देश की अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों के बजट को लेकर एक नई राष्ट्रीय बहस छिड़ गई है, जिसमें अर्थशास्त्रियों और राजनीतिक विश्लेषकों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। आइए इस पूरे विवाद, कांग्रेस के आरोपों और देश के आर्थिक हालातों को विस्तार से समझते हैं।
कांग्रेस पार्टी के प्रमुख प्रवक्ता जयराम रमेश ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकारी स्तर पर पेश किए जाने वाले जीडीपी के आंकड़े आम नागरिकों की असल जिंदगी की बानगी पेश नहीं करते हैं। उनका कहना था कि जब तक देश के हर नागरिक के हाथ में रोजगार और आय में वृद्धि नहीं होगी, तब तक केवल मैक्रो-इकोनॉमिक्स के बड़े आंकड़ों से देश की खुशहाली का दावा करना पूरी तरह भ्रामक है। कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि देश के अंदर घरेलू खपत में लगातार कमी आ रही है और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के साथ-साथ असंगठित क्षेत्र को वे अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे हैं, जिनकी देश को जरूरत थी। जयराम रमेश ने अपने आधिकारिक बयानों में इस बात पर जोर दिया कि सरकार को बेरोजगारी और आसमान छूती महंगाई पर ध्यान देना चाहिए, बजाय इसके कि वह आंकड़ों की जादूगरी से अपनी पीठ थपथपाती रहे। विपक्षी दल का यह हमला ऐसे समय में आया है जब देश के विभिन्न हिस्सों से आर्थिक दबाव और व्यापारिक सुस्ती की खबरें लगातार सामने आ रही हैं।
देश में खुदरा महंगाई और खाद्य पदार्थों के बढ़ते दामों ने आम परिवारों के किचन का बजट पूरी तरह बिगाड़ दिया है। कांग्रेस पार्टी का मुख्य तर्क यही है कि यदि जीडीपी की विकास दर सचमुच इतनी ही तेजी से बढ़ रही है, तो आम आदमी की थाली से दाल-सब्जी और रसोई गैस जैसी बुनियादी चीजें महंगी क्यों होती जा रही हैं। मध्यम वर्ग और गरीब तबके के लोगों के लिए अपने बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य सेवाओं और घर के खर्चों को संभालना दिन-प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है। अर्थशास्त्रियों का भी एक वर्ग मानता है कि आर्थिक विकास के आंकड़ों और जमीनी महंगाई के बीच एक बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। जब तक रोजगार के नए अवसर सृजित नहीं होते और वेतन वृद्धि महंगाई की रफ्तार के मुकाबले पीछे रहती है, तब तक आम जनता के लिए आर्थिक विकास के ये बड़े आंकड़े केवल एक कागजी शिगूफा बनकर रह जाते हैं। सरकार विरोधी दलों का यह भी कहना है कि जरूरी वस्तुओं पर लगातार बढ़ते टैक्स और ईंधन की ऊंची कीमतों ने आम आदमी की क्रय शक्ति यानी परचेसिंग पावर को भारी नुकसान पहुंचाया है।
दूसरी तरफ, केंद्र सरकार और सत्ताधारी पार्टी के नेताओं का हमेशा से यह पक्ष रहा है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है और सरकार की राजकोषीय नीतियां पूरी तरह सही दिशा में काम कर रही हैं। सरकार का यह दावा रहता है कि बुनियादी ढांचे (Infrastructure) पर किए जा रहे भारी-भरकम पूंजीगत खर्च से देश में दीर्घकालिक रोजगार और विकास के रास्ते खुल रहे हैं। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दे चुनावी और सामाजिक मंचों पर और ज्यादा गरमा सकते हैं। कांग्रेस पार्टी और अन्य विपक्षी दल जिस आक्रामक रुख के साथ सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं, उससे यह साफ है कि आर्थिक मोर्चे पर सरकार को आगे भी तीखे सवालों का सामना करना पड़ेगा। कुल मिलाकर, जीडीपी के आंकड़ों की चमक और आम आदमी की जेब के बीच की यह रस्साकशी भारतीय राजनीति और अर्थनीति के केंद्र में बनी हुई है, जिस पर देश भर के नागरिकों की पैनी नजर टिकी हुई है।
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