
आज के इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा और ‘हसल कल्चर’ (Hustle Culture) के दौर में जहां हर युवा लाखों-करोड़ों के पैकेज और बड़े शहरों की चकाचौंध के पीछे भाग रहा है, वहीं एक 28 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने बिल्कुल उल्टी राह चुनकर सोशल मीडिया पर सनसनी मचा दी है। मेट्रो शहर के ट्रैफिक, अंतहीन काम के घंटों और डिप्रेशन भरे माहौल को अलविदा कहकर इस इंजीनियर ने अपने छोटे से गृहनगर में अपेक्षाकृत कम वेतन वाली रिमोट/लोकल जॉब को प्राथमिकता दी। उनका यह फैसला आज लाखों ऐसे कॉरपोरेट प्रोफेशनल्स के लिए एक बड़ा सबक बन गया है जो भारी बैंक बैलेंस होने के बावजूद मानसिक शांति और सुकून के लिए तरस रहे हैं।
लाखों का पैकेज और मेट्रो सिटी का खोखलापन
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म (रेडिट और लिंक्डइन) पर साझा किए गए अपने विस्तृत अनुभव में इंजीनियर ने बताया कि करियर के शुरुआती 4-5 साल उन्होंने बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे टेक हब्स में बिताए। वहां उन्हें सालाना ₹25 से ₹30 लाख का आकर्षक पैकेज मिल रहा था। बैंक खाते में पैसे तो आ रहे थे, लेकिन जीवन से चैन, अच्छी नींद और परिवार के साथ बिताए जाने वाले खूबसूरत लम्हे पूरी तरह गायब हो चुके थे।
रोजाना 3 से 4 घंटे का भीषण ट्रैफिक जाम, 12-14 घंटे की लगातार शिफ्ट्स, वीकेंड पर भी कॉल्स का तनाव और महंगे फ्लैट्स का भारी भरकम किराया उनकी मानसिक और शारीरिक सेहत को भीतर से खोखला कर रहा था। उन्हें एहसास हुआ कि इस तरह की जिंदगी में वह पैसा तो कमा रहे हैं, लेकिन उस पैसे का आनंद लेने का समय और मानसिक सुकून उनके पास बिल्कुल नहीं है।
‘डाउनशिफ्टिंग’ का साहसिक फैसला: कम वेतन, लेकिन 100% सुकून
गंभीर बर्नआउट और स्वास्थ्य समस्याओं से जूझने के बाद इंजीनियर ने एक बड़ा और साहसिक कदम उठाया, जिसे आधुनिक जीवनशैली में ‘डाउनशिफ्टिंग’ (Downshifting) या ‘स्लो लिविंग’ (Slow Living) कहा जाता है। उन्होंने अपनी हाई-पेइंग कॉरपोरेट नौकरी को छोड़कर एक ऐसी कंपनी में कम वेतन (लगभग आधी सैलरी) पर काम करना स्वीकार किया जहां काम का समय तय था और वर्क-लाइफ बैलेंस को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती थी। इसके बाद वे अपने टियर-3 गृहनगर (Home Town) लौट आए।
साधारण जीवन और बेहतर स्वास्थ्य का मिला उपहार
इंजीनियर ने बताया कि छोटे शहर में लौटने के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया:
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प्रदूषण और ट्रैफिक से मुक्ति: कंक्रीट के जंगलों और जहरीली हवा के बजाय उन्हें ताजी हवा, खुला वातावरण और प्राकृतिक परिवेश मिला।
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बचत और कम खर्च: बड़े शहरों में जहां सैलरी का 60% हिस्सा घर के किराए, कैब और महंगे रेस्टोरेंट्स में खर्च हो जाता था, वहीं छोटे शहर में खर्च बेहद कम होने से आधी सैलरी में भी पहले से अधिक वास्तविक बचत होने लगी।
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परिवार के साथ गुणवत्तापूर्ण समय: शाम 6 बजे काम खत्म करने के बाद वे माता-पिता के साथ समय बिताते हैं, अपनी पुरानी हॉबीज (किताबें पढ़ना, बागवानी और वॉक) को पूरा करते हैं।
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मानसिक तनाव से आजादी: लगातार होने वाले सिरदर्द, एंग्जायटी और नींद की गोलियों से उन्हें हमेशा के लिए मुक्ति मिल गई।
करोड़पति भी क्यों तरसते हैं ऐसे जीवन के लिए?
इंजीनियर की यह पोस्ट वायरल होते ही कॉर्पोरेट जगत के कई वरिष्ठ अधिकारियों, आंत्रप्रेन्योर्स और युवा प्रोफेशनल्स ने इस पर सहमति जताई। कई लोगों ने कमेंट करते हुए लिखा कि करोड़ों रुपये का नेटवर्थ, लग्जरी कारें और पेंटहाउस होने के बाद भी लोग रात को सुकून की नींद नहीं सो पाते और हाई ब्लड प्रेशर व तनाव की बीमारियों से जूझते हैं। इंजीनियर ने यह साबित कर दिया कि असली दौलत केवल बैंक खाते का अंक नहीं, बल्कि आपका स्वास्थ्य, मानसिक शांति और परिवार के साथ बिताए गए सुखद पल हैं।
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