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कम पानी में बंपर पैदावार: ड्रिप और स्प्रिंकलर पर किसानों को मिल रही 55% तक सब्सिडी, जानिए आवेदन और बचत का पूरा गणित

जलवायु परिवर्तन, गिरते भूजल स्तर और अनियमित बारिश के बीच भारतीय कृषि क्षेत्र में जल प्रबंधन सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। पारंपरिक ‘फ्लड इरिगेशन’ यानी खुले में पानी बहाकर सिंचाई करने से न केवल लगभग 50 से 60 प्रतिशत पानी वाष्पीकरण और रिसाव में बर्बाद हो जाता है, बल्कि मिट्टी के पोषक तत्व भी बह जाते हैं। इस समस्या से निपटने और किसानों की लागत घटाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना’ (PMKSY) के घटक ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ (Per Drop More Crop – PDMC) को आक्रामक स्तर पर प्रोत्साहित कर रही हैं।

इस योजना के तहत खेतों में आधुनिक सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियां—ड्रिप (टपक) और स्प्रिंकलर (फव्वारा) लगाने के लिए किसानों को कुल निर्धारित लागत पर 55 प्रतिशत तक की भारी वित्तीय सब्सिडी दी जा रही है। इस तकनीक को अपनाकर लाखों किसान 50 से 70 प्रतिशत तक पानी की बचत कर रहे हैं और साथ ही अपनी फसल उत्पादन में 20 से 40 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज कर रहे हैं।

पीएमकेएसवाई (PMKSY-PDMC) दिशानिर्देशों के अनुसार, सब्सिडी को किसान की भूमि जोत (Land Holding) के आधार पर दो मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है:

  • छोटे और सीमांत किसान (Small & Marginal Farmers): जिन किसानों के पास 2 हेक्टेयर (लगभग 5 एकड़) तक कृषि योग्य भूमि है, उन्हें ड्रिप या स्प्रिंकलर संयंत्र की अनुमोदित इकाई लागत पर 55 प्रतिशत तक की वित्तीय सहायता (सब्सिडी) प्रदान की जाती है।

  • अन्य/बड़े किसान (Other/Large Farmers): 2 हेक्टेयर से अधिक भूमि वाले किसानों को लागत पर 45 प्रतिशत की सब्सिडी मिलती है।

  • राज्यों का टॉप-अप बोनस: कई राज्य सरकारें (जैसे उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश और कर्नाटक) अपने राज्य बजट से अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि जोड़ती हैं। कुछ राज्यों में एससी/एसटी वर्ग, महिला किसानों या डार्क जोन वाले सूखाग्रस्त जिलों में यह कुल सब्सिडी 75% से लेकर 90% तक भी पहुंच जाती है।

सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली का चयन खेत की मिट्टी और बोई जाने वाली फसल के प्रकार पर निर्भर करता है:

  • ड्रिप इरिगेशन (टपक सिंचाई): यह तकनीक बागवानी फसलों (आम, अमरूद, नींबू, अनार), सब्जियों (टमाटर, शिमला मिर्च, बैंगन, गोभी) और गन्ने व कपास जैसी कतारबद्ध फसलों के लिए सर्वोत्तम है। इसमें पतले पाइपों के जरिए सीधे पौधों की जड़ों तक बूंद-बूंद पानी और तरल खाद (फर्टिगेशन) पहुंचाई जाती है। इससे खरपतवार नहीं पनपते और उर्वरक की खपत 20 से 30 प्रतिशत घट जाती है।

  • स्प्रिंकलर इरिगेशन (फव्वारा सिंचाई): यह प्रणाली दलहन (चना, मूंग), तिलहन (सरसों, सोयाबीन), गेहूं, बाजरा और उबड़-खाबड़ या रेतीली जमीन वाले खेतों के लिए मुफीद है। इसमें पानी बारिश की फुहारों की तरह समान रूप से गिरता है, जिससे कम पानी में पूरा रकबा सिंचित हो जाता है।

योजना का लाभ लेने के लिए किसान के पास स्वयं के नाम पर वैध कृषि भूमि होनी चाहिए (कम से कम 7 साल के रजिस्टर्ड लीज वाले काश्तकार भी कई राज्यों में पात्र हैं)। साथ ही खेत में पानी का एक स्थायी स्रोत (बोरवेल, कुआं, नहर या फार्म पॉन्ड) और बिजली/सोलर पंप की व्यवस्था होना अनिवार्य है।

आवेदन के समय निम्नलिखित दस्तावेज आवश्यक होते हैं:

  1. आधार कार्ड और पासपोर्ट साइज फोटो

  2. जमीन के राजस्व दस्तावेज (खसरा, खतौनी या जमाबंदी नकल)

  3. सक्रिय बैंक बचत खाते की पासबुक (जो आधार और एनपीसीआई से लिंक हो)

  4. पंजीकृत वेंडर से प्राप्त कोटेशन/डिजाइन एस्टीमेट

  5. जाति प्रमाण पत्र (यदि एससी/एसटी वर्ग की अतिरिक्त छूट के लिए दावा कर रहे हों)

सब्सिडी की पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए इसे प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) और संबंधित राज्यों के कृषि/उद्यान पोर्टल्स से जोड़ा गया है:

  1. राज्य पोर्टल पर जाएं: अपने राज्य के कृषि या उद्यानिकी विभाग की आधिकारिक वेबसाइट (जैसे यूपी में upagriculture.com, महाराष्ट्र में mahadbt, राजस्थान में rajkisan, मध्य प्रदेश में dbt.mpdage.org) पर जाएं।

  2. योजना का चयन करें: ‘PMKSY – सूक्ष्म सिंचाई / Per Drop More Crop’ लिंक पर क्लिक करें।

  3. विवरण दर्ज करें: अपना आधार नंबर, किसान पंजीकरण संख्या, मोबाइल नंबर और खेत का रकबा भरें।

  4. अधिकृत कंपनी का चयन: सरकार द्वारा सूचीबद्ध (Empanelled) ड्रिप/स्प्रिंकलर निर्माण कंपनियों की सूची में से किसी एक पंजीकृत कंपनी या डीलर को चुनें।

  5. सत्यापन और स्थापना: आवेदन स्वीकृत होने के बाद कृषि विभाग का दल खेत का प्रारंभिक भौतिक सत्यापन करता है। इसके बाद अधिकृत वेंडर खेत में उपकरण स्थापित करेगा।

  6. सब्सिडी भुगतान: अंतिम सत्यापन और जीपीएस जियो-टैगिंग के बाद सब्सिडी की स्वीकृत राशि सीधे किसान के बैंक खाते में ट्रांसफर हो जाती है या वेंडर के बिल में से सीधे घटा दी जाती है।

ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणाली को अपनाकर किसान न केवल गिरते जल संकट से अपनी खेती को बचा सकते हैं, बल्कि बिजली, खाद और मजदूरी पर होने वाले भारी खर्च को घटाकर अपनी शुद्ध आमदनी में उल्लेखनीय इजाफा कर सकते हैं।