
अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी मार्केट से इस वक्त एक बड़ी और अहम खबर सामने आ रही है, जहां दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं की दिशा तय करने वाले कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में एक बार फिर जोरदार गिरावट दर्ज की गई है. पिछले कुछ हफ्तों से लगातार जारी उतार-चढ़ाव के बीच ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) का भाव एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक स्तर को तोड़ते हुए लुढ़क गया है और यह 87 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से भी नीचे आ गया है. वैश्विक स्तर पर ऊर्जा की मांग को लेकर बनी अनिश्चितताओं, प्रमुख उत्पादक देशों द्वारा उत्पादन के मोर्चे पर लिए जा रहे फैसलों और दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से मिल रहे सुस्त आर्थिक आंकड़ों के कारण तेल की कीमतों पर लगातार दबाव बना हुआ है. बाजार के जानकारों का कहना है कि क्रूड ऑयल की कीमतों में आई इस नरमी से भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद बंध गई है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है और वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता की जेब पर पड़ता है.
ब्रेंट क्रूड के 87 डॉलर के नीचे जाने के पीछे मुख्य वजहें
कच्चे तेल की कीमतों में आई इस सुस्ती और गिरावट के पीछे कई बड़े वैश्विक कारण जिम्मेदार बताए जा रहे हैं. सबसे पहले, दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं यानी अमेरिका और चीन से आ रहे औद्योगिक उत्पादन और विनिर्माण क्षेत्र के आंकड़े उम्मीद से कुछ कमजोर रहे हैं, जिसके चलते यह आशंका जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में ईंधन की वैश्विक मांग में सुस्ती देखने को मिल सकती है. इसके अलावा, ओपेक प्लस (OPEC+) देशों के हालिया बयानों और उत्पादन बढ़ाने या घटाने की नीतियों को लेकर निवेशकों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है. अमेरिकी कच्चे तेल के भंडार (US Crude Inventories) में उम्मीद से ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज किए जाने के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिकवाली का दौर हावी हो गया था. इन तमाम भू-राजनीतिक और आर्थिक कारकों के मिलेजुले प्रभाव के चलते ब्रेंट क्रूड का दाम फिसलकर 87 डॉलर प्रति बैरल के नीचे जा पहुंचा है, जिससे कमोडिटी ट्रेडर्स सतर्क रुख अपनाए हुए हैं.
भारत पर कच्चे तेल की गिरती कीमतों का क्या होगा सीधा असर
भारत के नजरिए से देखें तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव का कम होना हमेशा से एक सकारात्मक संकेत माना जाता है. भारत अपनी कुल तेल खपत का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, ऐसे में ब्रेंट क्रूड के 87 डॉलर से नीचे आने पर देश के आयात बिल में भारी कमी आने की पूरी संभावना है. आयात सस्ता होने से देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ने वाला दबाव कम होता है और चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) को नियंत्रित रखने में भी मदद मिलती है. इसके साथ ही, देश की सरकारी तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के मुनाफे के मार्जिन में सुधार होने की उम्मीद जगती है, जिससे आने वाले समय में घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में किसी बड़ी राहत या स्थिरता की उम्मीद को बल मिलता है. हालांकि, घरेलू ईंधन के दाम अंतरराष्ट्रीय कीमतों के औसत और विदेशी विनिमय दरों यानी रुपये और डॉलर के मुकाबले उसकी स्थिति पर भी निर्भर करते हैं, फिर भी क्रूड की यह गिरावट भारतीय उपभोक्ताओं और नीति निर्माताओं दोनों के लिए राहत भरी खबर है.
वैश्विक ऊर्जा बाजार और आगे का आउटलुक
आने वाले दिनों में कच्चे तेल की चाल किस दिशा में जाएगी, इसको लेकर ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञ अलग-अलग अनुमान लगा रहे हैं. वैश्विक स्तर पर चल रहे विभिन्न भू-राजनीतिक तनावों और सप्लाई चेन से जुड़ी बाधाओं के बावजूद मांग पक्ष की कमजोरी फिलहाल कीमतों पर हावी नजर आ रही है. जानकारों का मानना है कि जब तक प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में औद्योगिक गतिविधियों में तेजी और उपभोक्ता मांग में स्थायी सुधार देखने को नहीं मिलता, तब तक कच्चे तेल के दाम एक सीमित दायरे में ही बने रह सकते हैं या इनमें और अधिक उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है. निवेशकों और कमोडिटी मार्केट के ट्रेडिर्स की नजरें अब आगामी ओपेक बैठकों और अमेरिका के साप्ताहिक इन्वेंट्री डेटा पर टिकी हुई हैं, जो यह तय करेंगे कि ब्रेंट क्रूड अपने मौजूदा 87 डॉलर से नीचे के स्तर पर टिक पाता है या फिर इसमें एक बार फिर से रिकवरी देखने को मिलती है.
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