उमर अब्दुल्ला और पायल अब्दुल्ला का 31 साल पुराना रिश्ता खत्म, सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत तलाक को दी हरी झंडी; दोनों ने अपनाई ‘आजादी’

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उनकी अलग रह रही पत्नी पायल अब्दुल्ला के बीच बीते कई वर्षों से चला आ रहा वैवाहिक विवाद आखिरकार कानूनी तौर पर समाप्त हो गया है। देश की शीर्ष अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच हुए सौहार्दपूर्ण समझौते को रिकॉर्ड पर लेते हुए विवाह को भंग करने की सहमति दे दी है। अदालत में सुनवाई के दौरान यह बात स्पष्ट रूप से सामने आई कि दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से अपने तमाम मतभेदों और कानूनी विवादों को सुलझा लिया है और अब दोनों ही अपनी-अपनी जिंदगी में स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने का फैसला कर चुके हैं।

‘दोनों ने आजादी अपना ली है’ – सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने रखी बात

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ के समक्ष इस मामले की सुनवाई हुई। नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला की ओर से पेश हुए देश के जाने-माने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को सूचित किया कि दोनों पक्षों ने आपसी सहमति और समझबूझ के साथ अपने रिश्ते को समाप्त करने का निर्णय लिया है। कपिल सिब्बल ने पीठ के समक्ष बेहद संयमित शब्दों में कहा कि दोनों पक्षों ने ‘आजादी अपना ली है’ और सभी लंबित विवादों को सुलझा लिया गया है। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए इस विवाह को आधिकारिक तौर पर समाप्त घोषित किया जाए।

22 जुलाई को दाखिल किया गया था संयुक्त आवेदन, वापस लिए जाएंगे सभी मुकदमे

अदालत की कार्यवाही के दौरान जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने जब पूछा कि यह आवेदन कब दाखिल किया गया था, तो उन्हें बताया गया कि 22 जुलाई को दोनों पक्षों की ओर से संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत संयुक्त याचिका दायर की गई थी। इसके साथ ही वरिष्ठ वकील ने पीठ को यह भी जानकारी दी कि उमर अब्दुल्ला और पायल अब्दुल्ला एक-दूसरे के खिलाफ दर्ज कराए गए सभी दीवानी और आपराधिक मामलों को वापस लेने पर सहमत हो गए हैं। इस पर जस्टिस नरसिम्हा की पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह एक सकारात्मक विकास है और अदालत इस पूरे समझौते को अपने औपचारिक आदेश का हिस्सा बनाते हुए याचिका का निपटारा करेगी।

फैमिली कोर्ट से दिल्ली हाईकोर्ट तक: जानिए कैसे सुप्रीम कोर्ट पहुंचा यह हाई-प्रोफाइल मामला

उमर अब्दुल्ला और पायल अब्दुल्ला का विवाह 1 सितंबर 1994 को हुआ था। शादी के कुछ वर्षों बाद दोनों के रिश्तों में कड़वाहट आ गई और वर्ष 2009 से दोनों अलग-अलग रहने लगे थे। वर्ष 2011 में उमर अब्दुल्ला ने सार्वजनिक रूप से अलग होने की घोषणा की थी। इसके बाद, उमर अब्दुल्ला ने दिल्ली की फैमिली कोर्ट में क्रूरता (Cruelty) और परित्याग (Desertion) के आधार पर तलाक की अर्जी दाखिल की थी। हालांकि, 30 अगस्त 2016 को फैमिली कोर्ट ने याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि उमर अब्दुल्ला अपने आरोपों को साबित करने में विफल रहे हैं। इसके बाद उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया, जहां दिसंबर 2023 में हाईकोर्ट की दो जजों की पीठ ने भी फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी थी।

सुप्रीम कोर्ट मध्यस्थता केंद्र की पहल से बना समझौते का रास्ता

दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर उमर अब्दुल्ला ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की संवेदनशीलता और दोनों पक्षों के लंबे समय से अलग रहने की स्थिति को देखते हुए इसे सुप्रीम कोर्ट मेडिएशन सेंटर (मध्यस्थता केंद्र) भेजा था। शीर्ष अदालत ने पूर्व में यह भी टिप्पणी की थी कि दोनों पक्ष पिछले 16 वर्षों से अधिक समय से अलग रह रहे हैं, इसलिए इस वैवाहिक संबंध में अब कुछ शेष नहीं बचा है। मध्यस्थता प्रक्रिया के दौरान दोनों पक्षों के वकीलों और मध्यस्थों की लगातार कोशिशों के बाद आखिरकार दोनों पक्ष आपसी सहमति से अलग होने और सभी पुराने मुकदमों को वापस लेने पर रजामंद हुए।

संविधान के अनुच्छेद 142 का महत्व और मेंटेनेंस केस का अंत

सुप्रीम कोर्ट का संविधान का अनुच्छेद 142 अदालत को ‘पूर्ण न्याय’ (Complete Justice) प्रदान करने के लिए विशेष शक्ति देता है। जब अदालत को लगता है कि कोई विवाह पूरी तरह से टूट चुका है और उसमें सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची है, तो वह इस अनुच्छेद के तहत आपसी सहमति से तलाक की मंजूरी दे सकती है। इस समझौते के साथ ही पायल अब्दुल्ला और उनके बेटों के भरण-पोषण (Maintenance) से जुड़े मुकदमे भी अब समाप्त हो जाएंगे। पूर्व में दिल्ली हाईकोर्ट ने उमर अब्दुल्ला को पायल अब्दुल्ला को 1.5 लाख रुपये प्रति माह और बेटों की पढ़ाई के लिए अलग से वित्तीय सहायता देने का निर्देश दिया था। अब दोनों पक्षों के बीच बनी अंतिम सहमति के साथ ही सभी कानूनी लड़ाइयों पर पूर्ण विराम लग गया है।