
पश्चिम एशिया में गहराते भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका-ईरान के बीच जारी गतिरोध के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक बार फिर बड़ा उबाल देखने को मिल रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान की अर्थव्यवस्था और तेल निर्यात को पूरी तरह पंगु बनाने के लिए ‘डॉलर’ और ‘सेकेंडरी सैंक्शन्स’ (द्वितीयक प्रतिबंधों) का सबसे आक्रामक हथियार इस्तेमाल करने की घोषणा के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल दर्ज किया गया है। वैश्विक मानक ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतें 93 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गई हैं, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी 86 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है।
‘इकोनॉमिक डी-डे’: ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे कठोर आर्थिक नाकेबंदी
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर लगाए जा रहे इन नए दंडात्मक वित्तीय कदमों को ‘इकोनॉमिक डी-डे’ (Economic D-Day) का नाम दिया है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट के नेतृत्व में तैयार की गई इस नई नीति के तहत वाशिंगटन ने न केवल ईरान के तेल निर्यात पर नकेल कसी है, बल्कि दुनिया के उन सभी देशों, वित्तीय संस्थानों और रिफाइनरियों को कड़ी चेतावनी दी है जो ईरान के साथ किसी भी प्रकार का व्यापारिक या वित्तीय लेनदेन जारी रखेंगे।
अमेरिकी प्रशासन ने साफ कर दिया है कि यदि कोई विदेशी बैंक या कंपनी ईरानी तेल खरीदती है या उसे वित्तीय लाइफलाइन देती है, तो उसे अमेरिकी बैंकिंग प्रणाली और डॉलर क्लियरिंग नेटवर्क से पूरी तरह बाहर (ब्लैकलिस्ट) कर दिया जाएगा। इस सख्त चेतावनी का असर यह हुआ है कि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) समेत कई खाड़ी देशों ने ईरान के साथ अपने कई वित्तीय लेनदेन निलंबित कर दिए हैं। वहीं, ईरानी सेंट्रल बैंक के अधिकारियों के अनुसार, नौसैनिक नाकेबंदी और वित्तीय पाबंदियों के चलते देश से होने वाला तेल प्रवाह लगभग ठप होने के कगार पर पहुंच गया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और आपूर्ति श्रृंखला पर मंडराया गंभीर संकट
दुनिया के कुल तेल उपभोग का लगभग 20% हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के संकरे समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। अमेरिका द्वारा ईरान के बंदरगाहों की घेराबंदी और बातचीत के विफल होने के बाद इस रणनीतिक मार्ग से टैंकरों की आवाजाही पर गंभीर जोखिम खड़ा हो गया है।
वैश्विक वित्तीय संस्थान गोल्डमैन सैक्स और जेपी मॉर्गन की हालिया रिपोर्टों के अनुसार, यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही में व्यवधान अगले कुछ महीनों तक जारी रहता है, तो ब्रेंट क्रूड की कीमतें 114 डॉलर से लेकर 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। इसके साथ ही, मार्च के बाद से वैश्विक तेल भंडार (Global Oil Inventories) में प्रतिदिन लगभग 3.5 मिलियन बैरल की भारी गिरावट दर्ज की जा रही है, जिसने तेल बाजार में सप्लाई को लेकर चिंताएं और बढ़ा दी हैं।
चीन की रणनीति और भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर दबाव
ईरानी कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार चीन रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों के डर और डिलीवरी में आ रही रुकावटों के कारण चीनी रिफाइनरियों ने अब रियायती रूसी कच्चे तेल (Discounted Russian Crude) की खरीद में तेजी ला दी है।
चीन द्वारा रूसी तेल की भारी खरीदारी करने से भारत के लिए सस्ते रूसी कच्चे तेल की उपलब्धता सीमित होने लगी है। भारत अपनी घरेलू जरूरतों का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। यदि कच्चे तेल की कीमतें 90-95 डॉलर के स्तर पर टिकी रहती हैं, तो भारत के चालू खाता घाटे (CAD), व्यापार घाटे और आयात बिल पर दबाव बढ़ेगा, जिससे घरेलू स्तर पर ईंधन की कीमतों और मुद्रास्फीति (महंगाई) के मोर्चे पर नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
अंतरराष्ट्रीय बाजार की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के इन नए नियमों पर चीन, भारत और यूरोपीय देश क्या रुख अपनाते हैं और तेहरान इस अभूतपूर्व आर्थिक दबाव का जवाब कूटनीति से देता है या सैन्य तनाव बढ़ाकर।
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